सोमवार, 26 जुलाई 2021

श्रावण मास में करें शिवोपासना

    भोले बाबा,भोले नाथ, शिवशंकर, त्रिपुरारी, कैलाशपति, महाकाल, महेश आदि नामों से पुकारे जाने वाले भगवान शिव की आराधना अन्य देवताओं की तुलना में बड़ी ही आसान मानी गई है। कहते हैं कि शिवलिंग पर पूर्ण भक्ति भाव से जल, बेलपत्र, धतूरा, आक पुष्प, चंदन आदि अर्पित करने से ही भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं और अपने समस्त भक्तों की मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं। यूं तो भगवान शिव की आराधना हर महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मासिक शिवरात्रि के रूप में की जाती है। लेकिन श्रावण मास और फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए विशेष महत्व रखती हैं। 

भक्ति भावना के लिए है शिवोपासना

   त्रिनेत्रधारी भगवान शिव तंत्र-मंत्र, संहार शक्ति और तमोगुण के देवता माने गए हैं। इसलिए श्रावण मास में प्रतिदिन भगवान शिव की भक्ति करना, शिव मंत्रों का जाप करना, महामृत्युंजय मंत्र को सिद्ध करना, ध्यान, भजन, कीर्तन आदि करना विशेष रूप से शुभ फलदायी माना गया है। श्रावण मास में पड़ने वाले सोमवार को शिवलिंग पर गंगा जल, शहद, दूध, घी, गन्ने का रस, दही, तेल आदि से मंत्रोच्चारण के साथ अभिषेक किया जा सकता है। लेकिन इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि शिवलिंग पर हल्दी केतकी, केवड़ा, जूही, कपास गाजर, अनार आदि कभी भी न चढ़ाएं। शास्त्रों में इन्हें निषिद्ध माना गया है। इसके अलावा पूरे श्रावण मास में भक्तों को बाह्य एवं आंतरिक पवित्रता बनाए रखते हुए क्रोध, अंहकार, गलत आचरण, हिंसा जैसे कृत्यों का भी त्याग करना चाहिए, तभी शिवोपासना का उचित फल मिलता है। 

श्रावण मास में ऐसे करें शिव आराधना

 श्रावण मास क सोमवार को भगवान शिव के मंदिर में जाकर शिवलिंग पर तांबे के बर्तन से शुद्ध व स्वच्छ जल, गंगाजल, गाय का कच्चा दूध, गन्ने का रस, शहद, शुद्ध घी, दही, सफेद चंदन, बेल पत्र, शमी पत्र, बेर, धतूरा, भांग, आक या कनेर के पुष्प, कपूर, धूप, दीप, पांच तरह के फल, पांच तरह की मिठाई, पंच मेवा, इत्र, रोली, मौली आदि अर्पित करते हुए 'ऊं नम: शिवाय' का उद्घोष करना चाहिए। श्रावण मास में पवित्र नदियों से गंगा जल भरकर कांवड़ यात्रा करके जल को शिवलिंग पर अर्पित करने की परंपरा है, लेकिन कोरोना संक्रमण के मद्देनजर भक्तों को अपने घर के नजदीक के किसी भी शिव मंदिर में शिवलिंग पर गंगा जल मिश्रित स्वच्छ जल अर्पित करके शिव जी की आराधना करनी चाहिए। शिवलिंग पर शमी पत्र भी चढ़ा सकते हैं। शमी पत्र चढ़ाते समय 'अमंगलानां च शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च। दु:खप्रनाशिनीं धन्यां प्रपद्येतं शमीं शुभाम्।। ' का जाप अवश्य करना चाहिए। 

शिवोपासना से मिलते हैं अनंत लाभ

  श्रावण मास में पूर्ण श्रृद्धाभाव बनाए रखते हुए भगवान शिव की आराधना करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, मानसिक शांति मिलती है, दांपत्य जीवन में परेशानी, गंभीर बीमारी, दुर्घटना और कालसर्प योग से मुक्ति मिलती है। इस मास में प्रत्येक सोमवार को महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस मंत्र के जाप से जीवन में सुख-शांति, बुद्धि, विद्या, सम्मान, धन, संतान आदि की प्राप्ति होती है। जिस कन्या के विवाह किसी भी कारण से देरी हो रही हो या अड़चन आ रही हो, उसे सोमवार के दिन शिव परिवार की आराधना करनी चाहिए और माता पार्वती पर सुहाग सामग्री चढ़ाते हुए शीघ्र विवाह के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। वहीं जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प योग है तो उन्हें श्रावण मास के किसी भी सोमवार को एक जोड़ी तांबे का सर्प और एक जोड़ी चांदी का सर्प एक साथ गंगा या यमुना नदी के बहते हुए जल में प्रवाहित करना चाहिए। अगर पास में नदी न हो तो इन्हें शिवलिंग पर चढ़ाकर जलाभिषेक करते हुए भगवान शिव से कष्टों से मुक्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

बुधवार, 21 जुलाई 2021

अनबूझ मुहूर्त

पूनम की पड़वा भली अर अमावस की बीज। 

अणु बूझ्या मुहरत भला कै तैरस के तीज।। 

      राजस्थान के एक कवि द्वारा रचित इस दोहे में किसी भी कार्य को करने के लिए अनबूझ (अनसूझ) मुहूर्त के बारे में बताया गया है। जिसके अनुसार पूर्णमासी के बाद आने वाली प्रतिपदा तिथि (पड़वा), त्रयोदशी तिथि (तेरस) एवं तृतीया तिथि (तीज) और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की द्वितिया तिथि (दौज) अनबूझ मुहूर्त होती हैं। इन तिथियों में किसी भी काम को करने के लिए मुहूर्त नहीं देखा जाता है और काम में भी सफलता मिलती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

वास्तु के अनुसार लगाएं पौधे

   वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार यदि घर के अन्दर और आसपास पेड़-पोधे लगाये जाएं तो उसके शुभ परिणाम मिलते हैं। घर की पूर्व दिशा में पीपल, दक्षिण दिशा में पलाश, पश्चिम दिशा में वट और उत्तर दिशा में उदुम्बर के पेड़ कभी नहीं लगाने चाहिए अन्यथा गृह स्वामी को सदैव समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। पश्चिम दिशा में लगाया गया पीपल का पेड़ धन-धान्य की प्राप्ति कराता है।

    नैऋत्य कोण और आग्नेय कोण में उद्यान और बगीचा नहीं लगाना चाहिए। घर के अन्दर बने बगीचे में नीलिमा एवं हरिद्रा लिए हुए पौधे लगाने से धन व संतान की हानि होने की आशंका बनी रहती है। इसी प्रकार घर के पास फलदार, कांटेदार और दूधवाले पौधे भी नहीं लगाने चाहिए।

    घर के अन्दर बेर, केला, अनार, अरण्डी तथा कांटेदार पेड़ लगाने से उस घर की संतानों का विकास बाधित होने के साथ-साथ गृह स्वामी को शत्रुभय बना रहता है तथा आर्थिक तंगी भी बनी रहती है। जिस पौधे में फल,दूध और कांटे तीनों ही मौजूद हों, उसे भूलकर भी घर के अन्दर नहीं लगाना चाहिए अन्यथा घर के सदस्यों को मृृत्युु का भय बना रहता है।-प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

मंगलवार, 20 जुलाई 2021

श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता का छठा अध्याय ध्यान योग से संबंधित है। इस अध्याय में कुल 47 श्लोक दिए गए हैं, जिसमें बताया गया है कि मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए अष्टांगयोग करना चाहिए तथा अपने ध्यान को परमात्मा पर केंद्रित करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य समाधि अवस्था को प्राप्त होता है। 

   भगवान कहते हैं कि कर्म फल के प्रति अनासक्त भाव से कर्म करने वाले मनुष्य ही योगी और सन्यासी हैं। मन पर विजय प्राप्त करने वाला, समस्त जीवों को समान दृष्टि से देखने वाला, आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने वाला, विधि पूर्वक योगाभ्यास करने वाला, उचित आहार-विहार व दैनिक कार्य कलापों में नियमित रहने वाला मनुष्य ध्यान योगी कहलाता है। 

   भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि योगाभ्यास के द्वारा मनुष्य अपने मन और समस्त भौतिक मानसिक क्रियाओं से पूर्ण रूप से संयमित हो जाता है। इसे सिद्धि या समाधि अवस्था कहते हैं। ध्यान योग में लगने वाले मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह अपने शरीर, मन व आत्मा को परमात्मा में लगाए, समान मत वाले लोगों के साथ एकांत में रहे, सावधानी पूर्वक सभी इच्छाओं का अंत करे, विश्वास के साथ बुद्धि द्वारा योग करे और मन की चंचलता व अस्थिरता को हटाकर भगवान के चरणों में समर्पित हो जाए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता का पांचवा अध्याय कर्म योग से संबंधित है, जिसमें कृष्णभावनाभावित कर्म की विवेचना की गई है। इस अध्याय में दिए गए 29 श्लोकों के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण ने भगवान को समर्पित कर्मों को ज्ञान से श्रेष्ठ बताया है। भगवान कहते हैं कि मनुष्य कर्म फल का त्याग करते हुए जब कर्मों में तल्लीन रहता है तो वह शांति, सहिष्णुता, आनंद, आध्यात्मिक दृष्टि और विरक्ति प्राप्त करता है। 

   भगवान श्री कृष्ण का कहना है कि मनुष्य को सदैव अपने धर्म के अनुसार कर्म करने चाहिए और यदि वह भक्ति युक्त कर्म करता रहे तो सबसे उत्तम है। अपनी इंद्रियों व मन को वश में करके भक्ति भाव के साथ कर्म करने वाले मनुष्य ही विशुद्ध आत्मा हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन में जो भी कर्म करे, यह मानकर करे कि वास्तव में उन कर्मों को करने में उसकी कोई भूमिका नहीं है। 

   भगवान की शुद्ध भक्ति और ज्ञान से परिपूर्ण मनुष्य समस्त जीवों को समान भाव से देखता है, हर्ष, व्याकुलता, इंद्रिय सुख, संशय, क्रोध, भौतिक इच्छा,भय आदि से मुक्त रहता है। भगवान श्री कृष्ण ने इस अध्याय के माध्यम से मनुष्य को निर्देशित किया है कि वह कृष्णभावनाभक्ति कर्म, तत्पदार्थ ज्ञान और समतामूलक भावना के द्वारा जीवन में पूर्ण शांति प्राप्त कर सकता है।--प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

सोमवार, 19 जुलाई 2021

कर्मों के अनुसार दंड देते हैं शनि देव

 ज्योतिष में शनि ग्रह को दण्डनायक माना गया है। शनि ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जो संसार के सभी प्राणियों को भेदभाव किए बिना उनके कर्मों के अनुसार दण्ड देता है। यह धारणा कि शनि हमेशा बुरा ही करते हैं, गलत है। सच्चाई यह है कि पूर्व जन्म में अच्छे कर्म करने वाले मनुष्यों की जन्मकुंडली में अपनी स्वयं की राशि या उच्च राशि में बैठ कर शनि उन्हें सभी तरह के लाभ देते हैं। मकर व कुंभ राशि, शनि ग्रह की अपनी राशि हैं। शनि, तुला राशि में उच्च के और मेष राशि में नीच के माने जाते हैं। 

   यदि किसी भी कारण से मनुष्य के जीवन में शनि के अशुभ प्रभाव की वजह से कष्ट, रोग, धन की कमी, गलत मार्ग पर जाना, आकस्मिक दुर्घटना आदि समस्याएं आ रही हैं तो समाधान के लिए प्रतिदिन हनुमान जी की उपासना, सूर्य देव की उपासना, शनि चालीसा व शनि अष्टक का पाठ करना चाहिए। संभव हो तो योग्य ज्योतिषविद् से सलाह लेकर काले घोड़े के नाल या नाव की पुरानी कील की अंगूठी अथवा नीलम या जमुनिया रत्न धारण करना चाहिए। 

    शनि ग्रह से पीड़ित मनुष्यों को शराब, नशीली वस्तुओं, मांसाहारी भोजन से परहेज करना आवश्यक है। इसके अलावा जिन मनुष्यों पर शनि की साढ़े साती चल रही है,उन्हें भी इनसे बचना चाहिए, अपने घरेलू व कार्यस्थल पर काम करने वाले नौकरों या मजदूरों के साथ कभी भी बुरा व्यवहार नहीं करना चाहिए और न ही उनकी बेईमानी से उनका वेतन, मजदूरी, जमीन-जायदाद आदि हड़पनी चाहिए।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

वास्तु के अनुसार रखें भगवान का पूजन-स्थल

   जीवन में सुख, शांति, संपन्नता और रोगों से छुटकारा पाने के लिए हम सभी अपने-अपने तरीके से पूजा-पाठ, जप, तप, मंत्र जप, यज्ञ, दान आदि द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करके उनकी कृपा पाने की कोशिश करते हैं, परंतु कई बार निरंतर प्रयासों के बाद भी अपेक्षित लाभ नहीं मिलता, तब जीवन में निराशा और नकारात्मकता हावी होने लगती है तथा ईश्वर भक्ति से मन विचलित होने लगता है। इसका कारण भगवान के पूजा स्थल का उचित दिशा में अर्थात वास्तु के अनुरूप न होना भी हो सकता है।

     कहा ये जाता है कि ईश्वर सर्वत्र विद्यमान हैं, लेकिन वास्तु शास्त्र में भगवान की पूजा के लिए अलग-अलग दिशाओं को महत्व दिया गया है। वहीं धार्मिक कार्यों के निष्पादन में सदैव पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना ही उचित माना गया है। वास्तु नियमों के अनुसार अगर हम भगवान के पूजा स्थल के उद्देश्य से दिशाओं पर चर्चा करें तो पूर्व दिशा में सूर्योदय होने से यह दिशा सूर्य देव तथा सूर्यवंशी प्रभु श्री राम की पूजा के लिए उत्तम है। इस दिशा में श्री राम दरबार का चित्र लगाकर पूजा की जा सकती है। पश्चिम दिशा का संबंध बृहस्पति यानि गुरु से होता है, इसलिए यहां अपने आराध्य एवं आध्यात्मिक, धार्मिक अथवा शैक्षिक गुरु की पूजा का स्थल बनाया जा सकता है।

   उत्तर दिशा को कुबेर की दिशा कहा गया है। इस दिशा में धन की देवी महालक्ष्मी और बुद्धि प्रदाता श्री गणेश जी का पूजा स्थल शुभ फलदायी होता है। उत्तर दिशा के महत्व को देखते हुए ही धन वृद्धि के लिए धन रखने वाली अलमारी या तिजोरी का मुख उत्तर दिशा में ही खुलने को उचित माना जाता है। दक्षिण दिशा में महाकाली या पवन पुत्र हनुमान जी की पूजा के लिए स्थल बनाया जा सकता है। माना जाता है कि दक्षिणमुखी हनुमान जी की आराधना करने से सभी प्रकार के रोग, समस्याओं और कष्टों से छुटकारा मिलने लगता है।

    उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण को घर या व्यापारिक स्थल पर मंदिर या पूजा स्थल बनाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान माना जाता है। यह दिशा भगवान शिव और पंच देवों की पूजा के लिए श्रेष्ठ है। कुलदेवी की पूजा के लिए उत्तर-पश्चिम दिशा अर्थात वायव्य कोण निर्धारित किया गया है। यहां अपने कुल की देवी की स्थापना करके उनकी पूजा-अर्चना की जा सकती है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

रविवार, 18 जुलाई 2021

श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय में मनुष्य को दिव्य ज्ञान का बोध कराया गया है। इस अध्याय में कुल 42 श्लोक हैं। इनके माध्यम से कहा गया है कि आत्मा व भगवान से संबंधित दिव्य ज्ञान होने से मनुष्य की अंतश्चेतना शुद्ध हो जाती है। जिसके प्रभाव से भगवान की भक्ति करते हुए अंत काल में मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। 

   भगवान श्री कृष्ण ने इस अध्याय में स्पष्ट रूप से कहा है कि वे अजन्मा, अविनाशी व समस्त जीवों के स्वामी हैं। धर्म की हानि होने से जब अधर्म का बोलबाला होने लगता है, तब वे अवतार लेकर दुष्टों का नाश करके पुनः धर्म की स्थापना करते हैं। आसक्ति, भय एवं क्रोध का परित्याग करके उनकी (श्री कृष्ण) शरण में आने वाले मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्कर से छुटकारा मिल जाता है। 

   संसार के भौतिक बंधन से मुक्त होने के लिए भगवान कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को सात्विक, राजसिक व तामसिक प्रकृति के गुणों के प्रति अनासक्त भाव से भगवान के दिव्य ज्ञान में लीन होकर कर्म करने चाहिए। यदि मनुष्य के ह्रदय में अज्ञानता की वजह से किसी प्रकार का कोई संशय रहता है तो उसे दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण के सिद्धांत रुपी ज्ञान यज्ञ का सहारा लेना चाहिए।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

शनिवार, 17 जुलाई 2021

श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग से संबंधित है। इस अध्याय में कहा गया है कि इस भौतिक संसार में प्रत्येक मनुष्य को कोई न कोई कर्म करना ही पड़ता है, जिससे वह संसार के बंधनों में बंध जाता है। मनुष्य के ये कर्म सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक प्रकृति के हो सकते हैं। लेकिन, अगर मनुष्य निष्काम भावना के साथ भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करे तो निश्चित ही वह कर्म करने के बंधन से मुक्त होकर आत्मा और परमात्मा के दिव्य ज्ञान को प्राप्त करने के योग्य हो जाता है। 

   श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में कुल 43 श्लोक दिए गए हैं। इन श्लोकों का सार यही है कि मनुष्य अपने-अपने वर्ण (क्षत्रिय, वैश्य, ब्राह्मण व शूद्र) के अनुसार कर्म फल में आसक्त हुए बिना भगवान विष्णु के निमित्त कर्म करे, लाभ की इच्छा कदापि न करे, आलस्य व स्वामित्व की भावना का त्याग करे और हमेशा दूसरे मनुष्यों को सही रास्ते पर लाने के लिए अनासक्त होकर अपने कर्म पथ पर दृढ़ निश्चय के साथ चलता रहे। 

   इसी अध्याय में भगवान कृष्ण कहते हैं कि कर्मेंद्रियों से मन, मन से बुद्धि और बुद्धि से आत्मा श्रेष्ठ है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी समस्त इंद्रियों और इच्छाओं को ज्ञान के द्वारा वश में करे, जिससे कि काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का दमन हो सके। भगवान ये भी कहते हैं कि मनुष्य स्वयं को भगवान का सेवक समझे, अपने भीतर आध्यात्मिक ज्ञान व शक्ति का विकास करे, पाप कर्मों से दूर रहकर सद्कर्म करते हुए भगवान की भक्ति व सेवा में तल्लीन रहे। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 


श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता का दूसरा अध्याय गीता के सार के रूप में जाना जाता है। इस अध्याय में दिए गए 72 श्लोकों में आत्मा व परमात्मा, मुक्त मनुष्य के लक्षण, बुद्धि योग और विषय भोग से मुक्त होने के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है। इस अध्याय को सांख्य योग भी कहा जाता है। इसमें भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को ह्रदय की कमजोरी, मोह, शोक आदि को त्याग कर अपने धर्म के अनुसार योग में स्थित होकर अपनी समस्त इंद्रियों को वश में करते हुए निष्काम कर्म करते रहना चाहिए। 

    भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि इस संसार में कोई भी अमर नहीं है। जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है। मृत्यु के बाद कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म भी निश्चित है। मनुष्य का शरीर नाशवान है, लेकिन उसके शरीर में रहने वाली आत्मा अविनाशी, अजन्मा, शाश्वत, अव्यय, अकल्पनीय, अखंडित, अपरिवर्तनीय, अवध्य, अविकारी, स्थिर, सर्वव्यापी, एक समान रहने वाली आदि अद्भुत रूप वाली है। शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। 

   श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने यह भी कहा है कि जिस मनुष्य के अंदर इंद्रिय तृप्ति की कामना न हो, दैहिक, दैविक व भौतिक तापों में मन अविचलित रहे, दुख, सुख व कष्ट आने पर कोई असर न हो, आसक्ति, क्रोध, भय व घृणा की भावना न हो, मन और इच्छाओं पर पूरा नियंत्रण हो तथा पूर्ण ज्ञान व चेतना में दृढ़ स्थिरता हो, वही मनुष्य वास्तव में सांसारिक विषयों से मुक्त माना जाता है। सच्चे ह्रदय से भगवान के शरणागत होकर मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति, ज्ञान और मुक्ति का अधिकारी हो सकता है। - प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय का सार

  भगवान श्री कृष्ण जी के मुखारविंद से अर्जुन को दिए गए उपदेश रुपी ज्ञान का अनुपम भंडार है श्रीमद्भगवद्गीता। मनुष्यों को भौतिक संसार के मायाजाल से निकाल कर भगवान के प्रति समर्पित होने का संदेश देने वाली इस अद्भुत कृति में कुल अठारह अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय अपने आप में विशिष्ट ज्ञान को समेटे हुए है। भक्तिभाव के साथ श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन करने से मनुष्य की समस्त जिज्ञासाओं व चिंताओं का सहज ही समाधान हो जाता है और वह सात्विक जीवन जीते हुए अंत में विष्णु लोक को गमन करता है। 

  श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय के अंतर्गत कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल में सैन्य निरीक्षण की चर्चा की गई है। इस अध्याय में कुल 46 श्लोक हैं। इसमें शक्तिशाली अर्जुन युद्ध भूमि में सामने खड़ी विपक्षी सेना में अपने नाते-रिश्तेदार, गुरुजनों एवं मित्रों को देख कर व्यथित हो जाता है और शोक व मोह के वशीभूत होकर भगवान श्री कृष्ण से युद्ध न करने की बात कहता है। इसलिए यह अध्याय अर्जुन विषाद योग के नाम से भी जाना जाता है। 

    श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य को शोक और मोह से छुटकारा पाने के लिए भगवान की शरण लेनी चाहिए। क्योंकि वे ही मनुष्य को सही रास्ता दिखा सकते हैं और मन के विषाद को दूर कर सकते हैं। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण को ह्रषीकेश, अच्युत, कृष्ण, गोविंद, मधुसूदन, जनार्दन और प्रजापालक नामों से पुकारा गया है। वहीं अर्जुन को पार्थ और कुंती पुत्र कहा गया है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

   

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

अशुभ केतु ग्रह से होने वाले रोग और निदान

 ज्योतिष में केतु ग्रह को भी छाया ग्रह माना गया है। केतु ग्रह के अशुभ प्रभाव के कारण मनुष्य में खून की कमी, कैंसर, निमोनिया, बवासीर, पित्त, मूत्र व त्वचा रोग, अस्थमा, छूत के रोग, हैजा, जलने या चोट लगने का भय जोडों में दर्द आदि समस्याएं देखने को मिलती हैं। 

  केतु ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचाव के लिए मनुष्य को 'ऊं कें केतवे नम:' और 'ऊं ह्रीं ऐं केतवे नम:' मंत्र का जप करना शुभ माना जाता है। केतु ग्रह को प्रसन्न करने लिए श्रीगणेश स्तवराज का पाठ करना भी शुभ प्रभावकारी हो सकता है। - प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ राहु से होने वाले रोग और निदान

 राहु ग्रह को छाया ग्रह माना जाता है। राहु के अशुभ प्रभाव के कारण मनुष्य में मस्तिष्क, त्वचा व ह्रदय रोग, कब्ज, अतिसार, भूत-प्रेत बाधा, कैंसर, गठिया, वायु विकार, कुष्ठ रोग, प्रोस्टेट ग्रंथि वृद्धि, रीढ़ की हड्डी से संबंधित चोट व रोग होने की संभावना रहती है। 

  राहु ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए मनुष्य को पूर्ण श्रृद्धा भाव के साथ नियम से 'ऊं रां राहवे नम:', 'ऊं ह्रीं राहवे नम:', ऊं भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:' मंत्रों का जप करना चाहिए। नीले रंग के धागे में चंदन की लकड़ी का मोती या टुकड़ा गले में धारण करने से भी लाभ मिलता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ शनि से होने वाले रोग और निदान

 शनि ग्रह को कर्मों का दंडाधिकारी माना गया है। शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव से मनुष्य में पैरालाइसिस, मिर्गी, हाथ, पैर व शरीर में कंपन, गठिया, कमर दर्द, कैंसर, वातोदर, पेट दर्द व पेट में कीड़े, टीबी, शरीर में सूजन, कुष्ठ रोग, त्वचा में फोड़ा, फुंसी व घाव, विष बाधा, मानसिक या स्नायु संबंधी रोग हो सकते हैं। 

  शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए 'ऊं ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चराय नमः' या 'ऊं शं शनिश्चराये नमः' मंत्र के साथ सूर्य देव के मंत्र 'ऊं ह्रीं घृणि: सूर्य आदित्य श्रीं' मंत्र का जप व ध्यान करना चाहिए। मिर्गी के रोगी को सूर्य की होरा में जायफल में सूराख करके लाल डोरा डालकर गले में पहनाने से लाभ मिलता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ शुक्र ग्रह से होने वाले रोग और निदान

 शुक्र ग्रह के नीच राशि में होने, शत्रु राशि या शत्रु ग्रह से युति होने पर मनुष्य डायबिटीज, नेत्र रोग, हिस्टीरिया, कुंठित बुद्धि, गुप्त रोग, गर्भाशय के रोग, नपुंसकता, नासूर, नकसीर, मूत्र रोग, दांतों में दर्द, टिटनेस, प्रदर रोग आदि से पीड़ित हो सकता है। 

   शुक्र ग्रह जनित रोगों से बचाव के लिए शुक्ल पक्ष के शुक्रवार से आरंभ करते हुए 'ऊं ह्रीं श्रीं शुक्राय नम:' अथवा 'ऊं द्रां द्रीं द्रौं शुक्राय नम:' मंत्र का जप प्रतिदिन करना चाहिए। साथ ही स्नान करते समय पानी में केसर या जायफल डाल लेना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ बृहस्पति ग्रह से होने वाले रोग और निदान

 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बृहस्पति ग्रह के शत्रु राशि में होने या शत्रु ग्रहों से युति करने अथवा मंगल या शनि ग्रह से दृष्ट होने पर गला, कान, सांस व यकृत संबंधी रोग, कफ, अतिसार, बवासीर, कंठमाला, अनिद्रा, पैरालाइसिस, आमवात, गठिया आदि रोग हो सकते हैं। 

     बृहस्पति ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचाव के लिए भगवान विष्णु की पूजा करना, तुलसी जी पर दीपक प्रज्ज्वलित करना, गाय को बृहस्पतिवार के दिन गुड़ व चने की भीगी दाल खिलाना और 'ऊं बृं बृहस्पतये नम:' या 'ऊं ऐं क्लीं बृहस्पतये नम:'मंत्र का जप प्रतिदिन करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ बुध ग्रह से होने वाले रोग एवं निदान

  बुध ग्रह जब अशुभ होता है तो मनुष्य में ब्लडप्रेशर, अस्थमा, वात रोग, चक्कर आना, सिर दर्द, जी मिचलाना, नपुंसकता, कमजोरी, नासिका रोग, वमन होना, उन्माद, मिर्गी, अजीर्ण, आमाशय के रोग, ह्रदय गति रुकना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। 

  बुध के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए भगवान गणेश जी की आराधना करने के साथ-साथ 'ऊं बुं बुधाय नम:', 'ऊं ऐं श्रीं श्रीं बुधाय नम:' या 'ऊं ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:' मंत्र का जप प्रतिदिन करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ मंगल ग्रह से होने वाले रोग और निदान

 मंगल ग्रह के नीच में होने, शत्रु राशि में होने अथवा पाप ग्रह से संबंधित होने पर मनुष्य में हाई ब्लडप्रेशर, एक्सीडेंट, त्वचा रोग, पाइल्स, पित्तजन्य विकार, रक्तविकार, जल जाना, कुष्ठ, लकवा, एसिडिटी, यकृत एवं प्लीहा से जुड़े आदि रोग हो सकते हैं। 

   मंगल ग्रह के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए मनुष्य को प्रतिदिन दक्षिण मुखी हनुमान जी के सामने लाल आसन पर बैठकर  'ऊं अं अंगारकाय नम:', ऊं स: भौमाय नम:' अथवा 'ऊं भौं भौमाय नम:' मंत्र का जप करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

मंगलवार, 13 जुलाई 2021

अशुभ चन्द्र ग्रह से होने वाले रोग व निदान

  ज्योतिष के अनुसार चंद्र ग्रह के नीच राशि का होने, शत्रु राशि या पाप ग्रहों के साथ संबंध स्थापित करने या चंद्र की महादशा में शनि का अंतर होने पर मनुष्य के शरीर में कई रोग हो सकते हैं। जिनमें मुख्य हैं, डायबिटीज, पीलिया, खांसी, अस्थमा, सर्दी-जुकाम, श्वांस रोग, पित्ताशय की पथरी, मासिक धर्म में अनियमितता, मानसिक थकान, शीत ज्वर, पागलपन या अन्य मानसिक रोग, अतिसार, मूत्र, पेट व नेत्र संबधी रोग आदि। 

   चंद्र के अशुभ प्रभाव से होने वाले रोगों से बचने के लिए जातक को प्रत्येक पूर्णमासी को उपवास रखते हुए रात में चंद्र को जल अर्पित कर घी का दीप प्रज्ज्वलित करना चाहिए। साथ ही पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ 'ऊं सों सोमाय नम:', 'ऊं नम: शिवाय' और 'एं क्लीं सोमाय नम:' मंत्रों का जप करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ सूर्य ग्रह से होने वाले रोग व निदान

 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य ग्रह के नीच का होने, पाप ग्रह से संबंध बनाने या शत्रु राशि में होने से जातक में अनेक रोग होने की संभावना बन जाती है। सूर्य ग्रह के रोग कारक प्रभाव से सिर, मस्तिष्क, ह्रदय, नेत्र, यकृत, त्वचा से संबंधित रोग, अपस्मार, पित्त ज्वर, पीलिया, शरीर में जलन, अस्थि भंग आदि हो सकते हैं। 

   उपाय: सूर्य के रोग कारक प्रभाव से बचने के लिए योग्य डॉक्टर की सलाह के अनुसार औषधि सेवन के साथ-साथ नियमित रूप से 'ऊं सूर्याय नम:' या 'ऊं घृणि सूर्याय नम:' मंत्र का जप करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।


नवग्रहों की विंशोत्तरी महादशा की अवधि

    ज्योतिष शास्त्र में नौ ग्रहों का वर्णन किया गया है। मनुष्य के जीवन काल में सभी ग्रह एक निश्चित क्रम से अपने-अपने समय का भोग करते हैं। ग्रहों का यह भोग काल विंशोत्तरी महादशा कहलाता है। विंशोत्तरी दशा से मनुष्य के भविष्य के बारे में अनुमान लगाकर बताया जा सकता है। 

    सभी ग्रहों की महादशा भोग का क्रम और समय निश्चित होता है जो इस प्रकार है: सूर्य की महादशा 6 वर्ष, चंद्रमा की महादशा 10 वर्ष, मंगल की महादशा 7 वर्ष, राहु की महादशा 18 वर्ष, बृहस्पति की महादशा 16 वर्ष, शनि की महादशा 19 वर्ष, बुध की महादशा 17 वर्ष, केतु की महादशा 7 वर्ष और शुक्र की महादशा 20 वर्ष रहती है। --प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

सोमवार, 12 जुलाई 2021

अंक नौ वाले मनुष्य होते हैं क्रियाशील

   अंक ज्योतिष के अनुसार अंक 9 मंगल ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। किसी भी माह की 9, 18 व 27 तारीख को जन्म लेने वाले लोगों का अंक नौ होता है। ऐसे मनुष्य जल्दबाज, शीघ्र आवेश में आने वाले, संघर्षशील, नेतृत्व करने वाले और कमजोर व्यक्तित्व वाले होते हैं। इनके लिए मंगलवार, शुक्रवार और बृहस्पतिवार शुभ रहते हैं। 

   अंक नौ के लोगों में बार-बार बुखार, चेचक, खसरा, पेट, यकृत व प्लीहा रोग, लकवा आदि होने की संभावना रहती है। इस अंक के लोगों को भोजन में अदरक, प्याज, लहसुन, काली मिर्च, तिल, सरसों, चुकंदर, गाजर, मुनक्का, चुकंदर आदि का सेवन अधिक करना चाहिए। अधिक मिर्च-मसालेदार भोजन, शराब व नशीले पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए। रोगों से बचाव के लिए मंगल ग्रह से संबंधित मंत्र 'ऊं अं अंगारकाय नम:', 'ऊं भौं भोमाय नम:', 'ऊं क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:' का जप करने के साथ-साथ रोजाना हनुमान जी की उपासना करनी चाहिए।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

आठ अंक वाले मनुष्य होते हैं गंभीर

 अंक ज्योतिष के अनुसार अंक 8 शनि ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। जिनका जन्म किसी भी माह की 8, 17 और 26 तारीख को होता है, उन पर शनि ग्रह का प्रभाव देखा जा सकता है। इस अंक के लोग गंभीर, मजबूत, एकाकी, कूटनीतिज्ञ, धर्म व आध्यात्म में रुचि रखने वाले, दयावान, कार्य के प्रति निष्ठावान, भाग्य पर भरोसा करने वाले होते हैं। इनके लिए शनिवार, रविवार और सोमवार शुभ रहते हैं। 

   आठ अंक के मनुष्य किडनी, आंत्र, गठिया, सिर दर्द, वात रोग, फोड़े-फुंसी आदि से पीड़ित हो सकते हैं। ऐसे लोगों को अपने भोजन में ताजा फल व सब्जी, केला, गाजर, जामुन, फालसा, किशमिश आदि का सेवन करना चाहिए। शराब, मांसाहार, तंबाकू या किसी अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से परहेज करना चाहिए। रोग मुक्त रहने के लिए शनि के मंत्र 'ऊं शं शनैश्चराये नम:' अथवा 'ऊं ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चराय नमः' का जप प्रत्येक शनिवार को करना चाहिए।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

सात अंक वाले मनुष्य होते हैं धार्मिक

   अंक ज्योतिष के अनुसार अंक 7 वाले लोग केतु ग्रह से प्रभावित होते हैं। जिनका जन्म किसी भी माह की 7, 16 या 25 तारीख को होता है, वे केतु ग्रह के प्रभाव में रहते हैं। ऐसे लोग कल्पनाशील, आदर्शवादी, सपनों में खोये रहने वाले, खुशमिजाज, ऊर्जावान और आशावादी होते हैं। धर्म व आध्यात्म के प्रति इनमें विशेष लगाव होता है। सोमवार, बुधवार और रविवार इनके लिए शुभ रहते हैं। 

   अंक सात वाले मनुष्यों में खून की कमी, अस्थमा, हैजा, पित्त रोग, बवासीर व त्वचा रोग हो सकते हैं। इन लोगों को अपने भोजन में सूखे मेवे, फल, गुड़, बेसन, दूध, फलीदार सब्जियों का प्रयोग करना चाहिए। रोग से मुक्ति के लिए इस अंक वालों को केतु से संबंधित मंत्र 'ऊं केतवे नम:' अथवा 'ऊं प्रां प्रीं प्रौं केतवे नम:' का जप व ध्यान करना चाहिए।--प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

छह अंक वाले मनुष्यों का होता है चुंबकीय आकर्षण

  अंक ज्योतिष के अनुसार अंक 6 शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। जिन लोगों का जन्म किसी भी माह की 6,15 या 24 तारीख को होता है, वे शुक्र ग्रह से प्रभावित होते हैं। ऐसे लोगों में चुंबकीय आकर्षण होने से दूसरे लोग स्वत: ही इनसे जुड़े जाते हैं। ऐसे लोग सौंदर्य प्रेमी, शांति पसंद, निडर, जिद्दी, ईमानदार, ऐश्वर्य संपन्न, विनम्र और स्पष्ट बोलने वाले होते हैं। 

    अंक छह वाले मनुष्यों में नाक, कान, गला, फेफड़े, स्तन, ह्रदय से जुड़े रोग होते हैं। इस अंक वाले लोगों को अपने भोजन में खरबूजा, अंजीर, खुबानी, सेब, अनार, बादाम आदि का सेवन अधिक करना चाहिए। रोग मुक्त रहने के लिए रोजाना शुक्र ग्रह से संबंधित मंत्र 'ऊं ह्रीं श्रीं शुक्राय नम:', 'ऊं ह्रां ह्रीं ह्रौं स: शुक्राय नम:', 'ऊं द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:' का जप करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

रविवार, 11 जुलाई 2021

पांच अंक वाले मनुष्य होते हैं अपरिवर्तनशील

   जिन मनुष्यों का जन्म किसी भी महीने की 5,14 और 23 तारीख को होता है, उनका अंक 5 होता है । ऐसे मनुष्य बुध ग्रह से प्रभावित रहते हैं। अंक पांच वाले मनुष्य शीघ्र आवेश में आने वाले, जल्दबाज, मस्तमौला, खतरों से खेलने वाले, सच्चे दोस्त व सहयोगी, नई-नई खोज करने में कुशल और मेहनती होते हैं। ऐसे मनुष्य कई बार अधिक पैसा कमाने के लालच में गलत रास्ते पर भी जाते देखे गए हैं। 

   अंक पांच वाले मनुष्यों का स्वभाव अपरिवर्तनशील होता है। इसलिए एक बार जो तय कर लेते हैं, उसी पर चलते हैं। कोई भी इनके स्वभाव को नहीं बदल सकता। इन मनुष्यों को गहरे रंग के प्रयोग से बचना चाहिए। इनके लिए बुध ग्रह से संबंधित हरे रंग की खाद्य वस्तुओं, हरे फल व सब्जी, नारियल पानी, सौंफ, हरे बादाम, पिस्ता आदि का सेवन करना लाभकारी होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

चार अंक वाले मनुष्य होते हैं मितव्ययी

 अंक ज्योतिष के अनुसार अंक 4 राहु ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। जिन लोगों का जन्म किसी भी माह की 4,13, 22 और 31 तारीखों में होता है, वे राहु ग्रह से प्रभावित होते हैं। इस अंक वाले लोग ऊर्जावान, बलशाली, मितव्ययी, सम्मानित, अपने कार्य में व्यस्त, विचारशील और कला व संगीत में रुचि रखते हैं। इनके लिए रविवार का दिन शुभ होता है। ऐसे लोगों में पेट, ह्रदय व त्वचा रोग, गठिया और प्रोस्टेट से संबंधित रोग हो सकते हैं। 

  अंक चार वाले मनुष्यों का आर्थिक विकास 40 साल की उम्र के बाद ही देखा गया है। दिखावा व चापलूसी इन्हें पसंद नहीं होती। ऐसे लोगों को अपने भोजन में धनिया, जीरा, नारियल पानी, कीवी, बाजरा आदि का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। रोग मुक्ति के लिए राहु ग्रह के मंत्र 'ऊं भ्रां भ्रीं भ्रौं से: राहवे नम:' का नियमित जप करना चाहिए।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा


तीन अंक वाले मनुष्य होते हैं स्वाभिमानी

   ज्योतिष के अनुसार अंक 3 बृहस्पति ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। किसी भी माह की 3, 12, 21 तथा 30 तारीख को जन्म लेने वाले लोग बृहस्पति ग्रह से प्रभावित रहते हैं। इस अंक के लोग स्वाभिमानी, अनुशासन का पालन करने वाले, स्वतंत्र व निरंकुश प्रवृत्ति के होते हैं। जिस क्षेत्र में कार्य करते हैं, अपने दायित्व को निष्ठा और ईमानदारी से निभाते हैं। ऐसे लोगों के लिए मंगलवार, बृहस्पतिवार व शुक्रवार शुभ रहते हैं। 

   अंक 3 से प्रभावित लोगों में तंत्रिका तंत्र से संबंधित रोग, मोटापा, त्वचा रोग, पीठ व पैरों में दर्द आदि की समस्या होने की संभावना रहती है। इस अंक वाले लोगों को अपने भोजन में ताजा फल व सब्जियां, जामुन, किशमिश, बादाम, अखरोट, गुड़, शक्कर आदि का सेवन करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

दो अंक वाले मनुष्य होते हैं सौम्य स्वभाव वाले

   ज्योतिष के अनुसार 2 का अंक चंद्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। जिनका जन्म किसी भी माह की 2, 11, 20 या 29 तारीख को होता है, वे चंद्र अंक वाले होते हैं। ऐसे लोग भावुक, कल्पना लोक में विचरण करने वाले, कलाकार, रोमांटिक एवं सौम्य स्वभाव के होते हैं। किसी एक बात पर बहुत ज्यादा दिन तक टिकना इनके लिए मुश्किल होता है। इसलिए इनकी बनी हुईं योजनाएं अधूरी रह जाती हैं। रविवार, सोमवार और शुक्रवार इनके लिए अच्छे सिद्ध होते हैं।

   2 अंक वाले लोग प्राय: मानसिक रोग, तनाव, नींद न आना, बेचैनी, घबराहट, पेट व आंत्र संबंधी रोग, डायबिटीज, ट्यूमर आदि से पीड़ित हो सकते हैं। इनके लिए पूर्णमासी का व्रत, चंद्र देव का पूजन और सोमवार को भगवान शिव की उपासना करना शुभ रहता है। ऐसे लोगों को अपने भोजन में बंद गोभी, खीरा, अलसी, केला, शलजम, दूध, दही, पनीर, दूध-चावल की खीर आदि का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

एक अंक के मनुष्य होते हैं सूर्य ग्रह से प्रभावित

 ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों को नौ अंकों का आयाम माना गया है। एक अंक सूर्य का द्योतक है। किसी भी माह की 1,10,19 या 28 तारीख को जन्म लेने वाले मनुष्य सूर्यांक वाले होते हैं। ऐसे लोग स्वतंत्र विचार वाले, जिद्दी व दृढ़ निश्चयी होते हैं और किसी के नीचे या दबाव में काम करना पसंद नहीं करते। इस अंक वालों के लिए सोमवार व रविवार शुभ रहते हैं।

  एक अंक वाले लोगों को जीवन में ह्रदय रोग, नेत्र रोग, हाई ब्लडप्रेशर, चोट लगने के कारण फ्रैक्चर की समस्या आ सकती है। बेहतर जीवन के लिए इन्हें सूर्य की उपासना करने एवं सूर्य ग्रह से संबंधित मंत्रों का पाठ करना चाहिए। सूर्यांक वाले लोगों लिए शहद, केसर, नीबू, संतरा, छुहारे, लौंग, किशमिश का सेवन करना फायदेमंद होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

नव ग्रह और उनकी प्रकृति

  ज्योतिष में नौ ग्रहों की विवेचना की गई है। ये ग्रह हैं, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु। सूर्य ग्रह को संसार की आत्मा कहा गया है। मनुष्य के शरीर में रहने वाली आत्मा सूर्य ही है। चंद्र ग्रह मन और माता दुर्गा का प्रतीक है। मंगल ग्रह को वीरता व रक्त का प्रतीक मानने के साथ-साथ पवन पुत्र हनुमान जी का स्वरूप भी माना गया है। 

    इसी तरह बुध ग्रह भगवान गणेश जी स्वरूप है, जो बुद्धि एवं व्यापार का प्रतीक हैं। बृहस्पति ग्रह को ज्ञान के अधिष्ठाता और भगवान विष्णु जी का स्वरूप माना गया है। शुक्र ग्रह ज्ञान की देवी माता सरस्वती का स्वरूप हैं  जिन्हें संगीत, काव्य, श्रृंगार एवं कामकला का प्रतीक माना गया है। शनि ग्रह भगवान शंकर का स्वरूप हैं, जो धन प्रदाता और शरीर में लौह तत्व का कारक हैं। राहु और केतु के छाया ग्रह होने से इनके प्रतीक का वर्णन नहीं मिलता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

श्रीमद्भभागवतगीता का भी है प्रयोजन

  भगवान श्री कृष्ण के मुखारविंद की अभिव्यक्ति है श्रीमद्भभागवतगीता। मनुष्य को इस भौतिक संसार से उबारने के लिए ही भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर जो ज्ञान दिया था, वही इस पवित्र ग्रंथ में वर्णित किया गया है। श्रीमद्भभागवतगीता ऐसे मनुष्यों के लिए प्रेरणा स्रोत है जो इस नश्वर संसार में मोह-माया के जाल में फसे हुए हैं। 
   श्रीमद्भभागवतगीता का परम उद्देश्य मनुष्य और सर्वशक्तिमान ईश्वर के मध्य प्रेम, श्रद्धा और विश्वास के संबंधों को मजबूत बनाने में सहयोग करना है। मनुष्य अपने मन के अनुसार भगवान के साथ मित्र, भाई, पिता, पति, गुरु, प्रेमी आदि किसी भी रूप में संबंध स्थापित करके उनकी सेवा कर सकता है। 
   श्रीमद्भभागवतगीता मनुष्य को प्रेरित करती है कि वह सांसारिक बंधनों से मुक्ति के लिए भगवान की शरण में आ जाए, निष्काम कर्म भाव से अपने दायित्वों का निर्वहन करता रहे, अपने को सदैव भगवान की शरण में मानते हुए उनका चिंतन करे और अपनी तामसिक प्रवृत्तियों का त्याग कर विशुद्ध सात्विक जीवन व्यतीत करे। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

ग्रहों की शांति के लिए करें हवन

 ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की शांति के लिए हवन किए जाने को श्रेष्ठ उपाय के रूप में स्वीकार किया गया है। वहीं वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भवन में से नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव को दूर करने के लिए वास्तु पूजन के साथ-साथ हवन करने का भी विधान है। 

    हवन के लिए जिस सामग्री का उपयोग किया जाता है, उसे समिधा कहा जाता है। समिधा में बहुत सारी जड़ी बूटियां मिली होती हैं। जिनके प्रज्ज्वलित होने से निकलने वाला धुआं वातावरण को शुद्ध और प्रदूषण रहित बना देता है। किसी ग्रह विशेष की शांति के लिए हवन के समय उस ग्रह से संबंधित समिधा का भी उपयोग किया जा सकता है। 

   नव ग्रहों में सूर्य की समिधा मदार है। इसी तरह चंद्र की समिधा पलाश, मंगल की समिधा खैर, बुध की समिधा चिचिड़ा, बृहस्पति की समिधा पीपल, शुक्र की समिधा गूलर, शनि की समिधा शमी, राहु की समिधा दूब और केतु ग्रह की समिधा कुश मानी गई है। इसलिए ग्रह के अनुसार समिधा लेकर विधि-विधान से मंत्र जाप करते हुए ग्रह शांति करनी चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा


गुरुवार, 8 जुलाई 2021

सुखी दांपत्य के लिए बेडरूम का रखें ध्यान

 आवासीय भवन में बेडरूम या शयन कक्ष एक ऐसा महत्वपूर्ण स्थान है जहां पति और पत्नी अपना अधिकांश जीवन साथ-साथ बिताते हैं। लेकिन सब कुछ अच्छा होने के बावजूद बहुत बार यह देखने में आता है कि उनके बीच बिना किसी उचित कारण के वाद-विवाद तथा मतभेद की स्थिति बनी रहती है। जिसकी वजह से उनका पारिवारिक जीवन अशांत और कलहपूर्ण हो जाता है।

   वैवाहिक जीवन में अगर इस तरह की स्थिति आ रही हो तो वास्तु की दृष्टि से अपने बेडरूम पर एक बार नजर अवश्य डाल लेनी चाहिए, क्योंकि हो सकता है कि बेडरूम वास्तु दोष से प्रभावित हो। वैवाहिक जीवन को खुशनुमा, सुखी और शांतपूर्ण बनाने के लिए अपने बेडरूम को वास्तु अनुरूप बनाना चाहिए।  

    बेडरूम के लिए भवन की दक्षिण-पश्चिम दिशा को उपयुक्त स्थान माना गया है। जगह की कमी होने पर पश्चिम, उत्तर-पश्चिम अथवा दक्षिण दिशा में भी बेडरूम बनाया जा सकता है। बच्चों के लिए बेडरूम पश्चिम दिशा में ही बनाना शुभ रहता है। बेडरूम में केवल भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी की आलिंगनबद्ध या साथ में झूला झूलते हुए वाली तस्वीर लगा सकते हैं। 

   बेडरूम की छत का समतल होना आवश्यक है। ढालू छत वास्तु के अनुसार दोषपूर्ण है। यदि बेडरूम की छत ढालू है तो बेड छत की उस दिशा की ओर रखना चाहिए जहां छत की ऊंचाई कम हो। इसी तरह बेडरूम में लेंटर की बीम या लोहे की गाटर हो तो बेड को भूलकर भी इनके नीचे नहीं लगाना चाहिए बल्कि अलग हटकर ही सोने का स्थान बनाना चाहिए। 

   पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम सम्बन्धों की मजबूती के लिए बेडरूम में दीवारों का रंग गुलाबी अथवा हल्का पीला रखा जाए तो अच्छा रहता है। नीला, लाल, काला या बेंगनी रंग अनावश्यक टकराव और मानसिक तनाव देता है। इसलिए जितना संभव हो, बेडरूम में इन रंगों का प्रयोग करने से बचना चाहिए। बेडरूम में सफेद रंग के कबूतर की जोड़ी मेज पर रख सकते हैं। 

   बेडरूम में सोते समय किसी भी परिस्थिति में दक्षिण दिशा में पैर नहीं होने चाहिए। बेडरूम के मुख्य प्रवेश द्वार की तरफ सिर या पैर करके सोना भी दोषपूर्ण माना गया है। पूर्व दिशा में पैर करके सोने से सुख समृद्धि तथा पश्चिम दिशा में पैर करके सोने से धार्मिक व आध्यात्मिक भावनाओं में वृद्धि होती है। 

   बेडरूम में दर्पण लगी ड्रेसिंग टेबल सिर के सामने नहीं होनी चाहिए। अगर जगह की कमी हो तो सोने से पहले दर्पण को किसी मोटे कपड़े के पर्दे या चादर से ढक देना चाहिए। बेडरूम में रात में सोने से पहले झूठे बर्तन हटा देना भी जरूरी है। बेडरूम में बेड पर बैठकर खाना खाना, शराब पीना या किसी भी तरह का नशा करना वास्तु दोष है,जो दांपत्य जीवन को प्रभावित कर सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।

वास्तु के अनुसार बनाएं सीढ़ियां

    मनुष्य के लिए आवासीय भवन या कमरा एक ऐसा मज़बूत सुरक्षा कवच होता है, जिसमें रहते हुए वह स्वयं को निश्चिन्त और सुरक्षित महसूस करता है। वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार बने भवन या कमरे में रहते हुए जीवन में प्राप्त सुख-सुविधाओं का बिना किसी व्यवधान के उपभोग किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में यह भी सकते हैं कि वास्तु के अनुसार बनी सीढ़ियां सकारात्मक प्रभाव देती हैं। 

   भवन निर्माण के दौरान भवन में अन्य निर्माण के साथ-साथ छत पर जाने के लिए सीढ़ियां भी बनवाई जाती हैं। वास्तु नियमों के अनुसार सीढ़ियां भवन के नैऋत्य कोण अर्थात दक्षिण-पश्चिम दिशा में ही दक्षिण से पश्चिम की ओर जाती हुईं बनवानी चाहिए। सीढ़ियों में अंधेरा रहना शुभ नहीं माना गया है, इसलिए सीढ़ियों में प्रकाश की समुचित व्यवस्था होनी आवश्यक है।

   सीढ़ियां हमेशा दाहिनी ओर ही होनी चाहिए। बायीं ओर सीढ़ियां बनवाना शुभ नहीं होता है। जगह के अभाव में सीढ़ियां पश्चिम या उत्तर दिशा में भी बनवाई जा सकती हैं। सीढ़ियां बनवाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि सीढ़ियों में पगतियों की संख्या सदैव विषम अर्थात पांच, सात, नौ, ग्यारह, सत्रह ही हों। 

   अगर सीढ़ियां घुमावदार हैं तो उनमें रेलिंग अवश्य लगवाएं। सीढ़ियों को कभी भी त्रिकोण आकार में नहीं बनवाएं तथा दो सीढ़ियों के मध्य का अंतर नौ इंच से अधिक भी न रखें। इस बात का भी ध्यान रखें कि भवन के मुख्य द्वार के सामने से सीढ़ियां नहीं दिखाई देनी चाहिए। 

   वास्तु शास्त्र के अनुसार सीढ़ियों के नीचे पूजा स्थल, शयन कक्ष, बैठक अथवा शौचालय नहीं बनवाना चाहिए। भवन निर्माण के समय यदि जगह कम पड़ रही हो तो ऐसी स्थिति में सीढ़ियों के नीचे स्नानघर या स्टोर रूम बनवा सकते हैं।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

व्यापार में नुकसान का ये भी हो सकता है कारण

 अक्सर देखने में आता है कि बहुत से व्यापारी पर्याप्त पूंजी की व्यवस्था करके उद्योग अथवा फैक्ट्री लगा लेते हैं और जी तोड़ मेहनत करते हैं, परंतु अथक प्रयासों के बावजूद अपेक्षित लाभ मिलने के बजाय व्यापार में नुक्सान होता रहता है या फिर व्यापार में बाधाएं व समस्याएं आती रहती हैं। अन्य कारणों के साथ-साथ उद्योग या फैक्ट्री के निर्माण, मशीनरी, तैयार माल आदि की व्यवस्था में वास्तु नियमों की अनदेखी भी होने वाले नुक्सान या घाटे का एक कारण हो सकती है। 

 फैक्ट्री या उद्योग जिस भूखंड पर लगाया जाए, उसके चारों ओर बनी बाऊंड्रीवाल पश्चिम एवं दक्षिण की तुलना में पूर्व और उत्तर दिशा की तरफ नीची होनी आवश्यक है। वहीं भूखंड का ईशान कोण न तो कटा हुआ होना चाहिए और न ही वहां किसी तरह का भारी सामान रखा जाना चाहिए। व्यवसाय स्थल पर ईशान कोण में पानी की व्यवस्था करना ठीक रहता है, परंतु ओवरहेड पानी की टंकी सदैव नैऋत्य कोण में ही रखना आवश्यक है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 



पंच तत्वों के संतुलन से मिलते हैं सकारात्मक परि

 पृथ्वी, आकाश, वायु, जल और अग्नि को पंच महाभूत माना गया है। इन्हें पंच तत्व के रूप में भी जाना जाता है। वास्तु की दृष्टि से देखा जाए तो इन पंच तत्वों का संतुलन ही सभी प्रकार के निर्मित भवनों के लिए सकारात्मक ऊर्जा और शुभ फल देने वाला माना जाता है। पंच तत्वों को वास्तु का आधार स्तंभ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी। 

   वास्तु शास्त्र के अनुसार दक्षिण-पश्चिम दिशा में पृथ्वी तत्व का अधिकार होता है। इसलिए यह दिशा भारी व मोटी होनी चाहिए और यहां बेडरूम बनाना चाहिए। पृथ्वी तत्व के असंतुलन से परिवार के सदस्यों में असुरक्षा की भावना देखी जाती है। 

    ईशान कोण एवं ब्रह्म स्थान में आकाश तत्व का प्रभाव रहता है। मंदिर, पूजा-पाठ, आध्यात्मिक चिंतन आदि के लिए यह दिशा उत्तम मानी गई है। इसलिए इस दिशा को हल्का, खुला और स्वच्छ रखना आवश्यक है। आकाश तत्व का असंतुलन परिवार में आर्थिक, मानसिक व स्वास्थ्य संबंधी परेशानी दे सकता है। 

 किसी भी वास्तु के लिए उत्तर-पश्चिम दिशा पर वायु तत्व का अधिकार होता है। इसलिए यहां खुली जगह रखी जा सकती है और उत्तर दिशा में खिड़कियां बनवाई जा सकती हैं। वायु तत्व के असंतुलन से अच्छे और मजबूत संबंध भी खराब हो सकते हैं। 

  जल तत्व की बात करें तो इसका प्रभाव उत्तर और ईशान कोण में देखा जाता है। इसलिए इस दिशा में अंडरग्राउंड वाटर टैंक, हैंडपंप, समर व केवल बाथरूम आदि रखे जाते हैं। यह दिशा भी स्वच्छ व खुली रहनी चाहिए। जल तत्व का कमजोर होना परिवार में रोग और कलह का कारण बन सकता है।

   अग्नि तत्व का अधिकार आग्नेय कोण की तरफ होता है। इसलिए यहां किचन के साथ-साथ बिजली व अग्नि से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं। अग्नि तत्व के असंतुलन से आर्थिक व स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

किचन के लिए वास्तु नियम

 किसी भवन में किचन वह स्थान है जहां घर के सदस्य, विशेषकर महिलाएं खाना पकाती हैं। स्वस्थ वातावरण और सही दिशा में बनी हुई किचन में बनाया गया खाना, घर के सभी सदस्यों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाये रखता है। 

    वास्तु शास्त्र के अनुसार किचन की सही दिशा आग्नेय कोण यानि दक्षिण-पूर्व विदिशा है। यदि आग्नेय कोण में किचन बनाना संभव न हो तो पश्चिम दिशा में भी बना सकते हैं, लेकिन दोनों ही स्थिति में किचन में खाना पकाने वाले सदस्य का मुख सदैव पूर्व दिशा की तरफ होना चाहिए, अन्यथा महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं परेशान करती रहेंगी। 

   किचन में गैस, चूल्हा, अंगीठी, हीटर, स्टोव, बिजली से चलने वाले ओवन, मिक्सी, टोस्टर आदि उपकरण हमेशा आग्नेय कोण में ही रखने चाहिए। ईशान कोण यानि उत्तर-पूर्व विदिशा में कभी भी गैस-चूल्हा आदि नहीं रखना चाहिए। वरना धन की हानि और संतान वृद्धि रुकने की संभावना रहती है। 

   अगर किसी वजह से गैस-चूल्हा आग्नेय कोण की जगह किसी दूसरी दिशा में रखा गया है तो वास्तु दोष से बचने के लिए स्लैब के नीचे एक तांबे के बर्तन में पानी भरकर रखना चाहिए और प्रतिदिन सुबह व शाम उस पानी को पौधों में डाल कर नया पानी भर देना चाहिए। 

   किचन में कभी भी खाली डिब्बे नहीं रखने चाहिए। यदि डिब्बे में रखने के लिए कोई सामान न हो तो भी उसमें दो-चार बतासे या कोई मखाने रख देने चाहिए। इसके अलावा किचन में टूटे व चटके हुए बर्तन, खराब गैस-चूल्हा, काम में न आने वाले बर्तन, खराब मिक्सी, ओवन व अन्य उपकरण नहीं रखने चाहिए। 

   यदि बडे आकार की किचन में भोजन करने की व्यवस्था की जानी है तो इसके लिए पश्चिम दिशा उपयुक्त रहती है। कहने का अर्थ है कि किचन की पश्चिम दिशा में बैठ कर भोजन किया जा सकता है। किचन में फ्रिज को नैऋत्य कोण यानि दक्षिण-पश्चिम विदिशा को छोड़कर किसी भी अन्य दिशा में रख सकते हैं।

   किचन के अंदर रखा गया गैस-चूल्हा भवन के मेन गेट के बाहर से नहीं दिखाई देना चाहिए। यदि ऐसा है तो किचन की खिड़की पर पर्दा लगा सकते हैं। किचन में फर्श और स्लैब के पत्थर का रंग काला नहीं होना चाहिए। किचन की दीवारों पर हल्का लाल या गुलाबी पेंट कराया जा सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।


सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट इलाहाबाद के महत्वपूर्ण आदेश

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