मंगलवार, 20 जुलाई 2021

श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता का पांचवा अध्याय कर्म योग से संबंधित है, जिसमें कृष्णभावनाभावित कर्म की विवेचना की गई है। इस अध्याय में दिए गए 29 श्लोकों के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण ने भगवान को समर्पित कर्मों को ज्ञान से श्रेष्ठ बताया है। भगवान कहते हैं कि मनुष्य कर्म फल का त्याग करते हुए जब कर्मों में तल्लीन रहता है तो वह शांति, सहिष्णुता, आनंद, आध्यात्मिक दृष्टि और विरक्ति प्राप्त करता है। 

   भगवान श्री कृष्ण का कहना है कि मनुष्य को सदैव अपने धर्म के अनुसार कर्म करने चाहिए और यदि वह भक्ति युक्त कर्म करता रहे तो सबसे उत्तम है। अपनी इंद्रियों व मन को वश में करके भक्ति भाव के साथ कर्म करने वाले मनुष्य ही विशुद्ध आत्मा हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन में जो भी कर्म करे, यह मानकर करे कि वास्तव में उन कर्मों को करने में उसकी कोई भूमिका नहीं है। 

   भगवान की शुद्ध भक्ति और ज्ञान से परिपूर्ण मनुष्य समस्त जीवों को समान भाव से देखता है, हर्ष, व्याकुलता, इंद्रिय सुख, संशय, क्रोध, भौतिक इच्छा,भय आदि से मुक्त रहता है। भगवान श्री कृष्ण ने इस अध्याय के माध्यम से मनुष्य को निर्देशित किया है कि वह कृष्णभावनाभक्ति कर्म, तत्पदार्थ ज्ञान और समतामूलक भावना के द्वारा जीवन में पूर्ण शांति प्राप्त कर सकता है।--प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

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