श्रीमद्भभागवतगीता का परम उद्देश्य मनुष्य और सर्वशक्तिमान ईश्वर के मध्य प्रेम, श्रद्धा और विश्वास के संबंधों को मजबूत बनाने में सहयोग करना है। मनुष्य अपने मन के अनुसार भगवान के साथ मित्र, भाई, पिता, पति, गुरु, प्रेमी आदि किसी भी रूप में संबंध स्थापित करके उनकी सेवा कर सकता है।
श्रीमद्भभागवतगीता मनुष्य को प्रेरित करती है कि वह सांसारिक बंधनों से मुक्ति के लिए भगवान की शरण में आ जाए, निष्काम कर्म भाव से अपने दायित्वों का निर्वहन करता रहे, अपने को सदैव भगवान की शरण में मानते हुए उनका चिंतन करे और अपनी तामसिक प्रवृत्तियों का त्याग कर विशुद्ध सात्विक जीवन व्यतीत करे। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा
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