श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय में मनुष्य को दिव्य ज्ञान का बोध कराया गया है। इस अध्याय में कुल 42 श्लोक हैं। इनके माध्यम से कहा गया है कि आत्मा व भगवान से संबंधित दिव्य ज्ञान होने से मनुष्य की अंतश्चेतना शुद्ध हो जाती है। जिसके प्रभाव से भगवान की भक्ति करते हुए अंत काल में मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
भगवान श्री कृष्ण ने इस अध्याय में स्पष्ट रूप से कहा है कि वे अजन्मा, अविनाशी व समस्त जीवों के स्वामी हैं। धर्म की हानि होने से जब अधर्म का बोलबाला होने लगता है, तब वे अवतार लेकर दुष्टों का नाश करके पुनः धर्म की स्थापना करते हैं। आसक्ति, भय एवं क्रोध का परित्याग करके उनकी (श्री कृष्ण) शरण में आने वाले मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्कर से छुटकारा मिल जाता है।
संसार के भौतिक बंधन से मुक्त होने के लिए भगवान कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को सात्विक, राजसिक व तामसिक प्रकृति के गुणों के प्रति अनासक्त भाव से भगवान के दिव्य ज्ञान में लीन होकर कर्म करने चाहिए। यदि मनुष्य के ह्रदय में अज्ञानता की वजह से किसी प्रकार का कोई संशय रहता है तो उसे दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण के सिद्धांत रुपी ज्ञान यज्ञ का सहारा लेना चाहिए।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।
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