जीवन में सुख, शांति, संपन्नता और रोगों से छुटकारा पाने के लिए हम सभी अपने-अपने तरीके से पूजा-पाठ, जप, तप, मंत्र जप, यज्ञ, दान आदि द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करके उनकी कृपा पाने की कोशिश करते हैं, परंतु कई बार निरंतर प्रयासों के बाद भी अपेक्षित लाभ नहीं मिलता, तब जीवन में निराशा और नकारात्मकता हावी होने लगती है तथा ईश्वर भक्ति से मन विचलित होने लगता है। इसका कारण भगवान के पूजा स्थल का उचित दिशा में अर्थात वास्तु के अनुरूप न होना भी हो सकता है।
कहा ये जाता है कि ईश्वर सर्वत्र विद्यमान हैं, लेकिन वास्तु शास्त्र में भगवान की पूजा के लिए अलग-अलग दिशाओं को महत्व दिया गया है। वहीं धार्मिक कार्यों के निष्पादन में सदैव पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना ही उचित माना गया है। वास्तु नियमों के अनुसार अगर हम भगवान के पूजा स्थल के उद्देश्य से दिशाओं पर चर्चा करें तो पूर्व दिशा में सूर्योदय होने से यह दिशा सूर्य देव तथा सूर्यवंशी प्रभु श्री राम की पूजा के लिए उत्तम है। इस दिशा में श्री राम दरबार का चित्र लगाकर पूजा की जा सकती है। पश्चिम दिशा का संबंध बृहस्पति यानि गुरु से होता है, इसलिए यहां अपने आराध्य एवं आध्यात्मिक, धार्मिक अथवा शैक्षिक गुरु की पूजा का स्थल बनाया जा सकता है।
उत्तर दिशा को कुबेर की दिशा कहा गया है। इस दिशा में धन की देवी महालक्ष्मी और बुद्धि प्रदाता श्री गणेश जी का पूजा स्थल शुभ फलदायी होता है। उत्तर दिशा के महत्व को देखते हुए ही धन वृद्धि के लिए धन रखने वाली अलमारी या तिजोरी का मुख उत्तर दिशा में ही खुलने को उचित माना जाता है। दक्षिण दिशा में महाकाली या पवन पुत्र हनुमान जी की पूजा के लिए स्थल बनाया जा सकता है। माना जाता है कि दक्षिणमुखी हनुमान जी की आराधना करने से सभी प्रकार के रोग, समस्याओं और कष्टों से छुटकारा मिलने लगता है।
उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण को घर या व्यापारिक स्थल पर मंदिर या पूजा स्थल बनाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान माना जाता है। यह दिशा भगवान शिव और पंच देवों की पूजा के लिए श्रेष्ठ है। कुलदेवी की पूजा के लिए उत्तर-पश्चिम दिशा अर्थात वायव्य कोण निर्धारित किया गया है। यहां अपने कुल की देवी की स्थापना करके उनकी पूजा-अर्चना की जा सकती है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें