श्रीमद्भगवद्गीता का छठा अध्याय ध्यान योग से संबंधित है। इस अध्याय में कुल 47 श्लोक दिए गए हैं, जिसमें बताया गया है कि मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए अष्टांगयोग करना चाहिए तथा अपने ध्यान को परमात्मा पर केंद्रित करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य समाधि अवस्था को प्राप्त होता है।
भगवान कहते हैं कि कर्म फल के प्रति अनासक्त भाव से कर्म करने वाले मनुष्य ही योगी और सन्यासी हैं। मन पर विजय प्राप्त करने वाला, समस्त जीवों को समान दृष्टि से देखने वाला, आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने वाला, विधि पूर्वक योगाभ्यास करने वाला, उचित आहार-विहार व दैनिक कार्य कलापों में नियमित रहने वाला मनुष्य ध्यान योगी कहलाता है।
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि योगाभ्यास के द्वारा मनुष्य अपने मन और समस्त भौतिक मानसिक क्रियाओं से पूर्ण रूप से संयमित हो जाता है। इसे सिद्धि या समाधि अवस्था कहते हैं। ध्यान योग में लगने वाले मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह अपने शरीर, मन व आत्मा को परमात्मा में लगाए, समान मत वाले लोगों के साथ एकांत में रहे, सावधानी पूर्वक सभी इच्छाओं का अंत करे, विश्वास के साथ बुद्धि द्वारा योग करे और मन की चंचलता व अस्थिरता को हटाकर भगवान के चरणों में समर्पित हो जाए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।
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