शनिवार, 17 जुलाई 2021

श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग से संबंधित है। इस अध्याय में कहा गया है कि इस भौतिक संसार में प्रत्येक मनुष्य को कोई न कोई कर्म करना ही पड़ता है, जिससे वह संसार के बंधनों में बंध जाता है। मनुष्य के ये कर्म सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक प्रकृति के हो सकते हैं। लेकिन, अगर मनुष्य निष्काम भावना के साथ भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करे तो निश्चित ही वह कर्म करने के बंधन से मुक्त होकर आत्मा और परमात्मा के दिव्य ज्ञान को प्राप्त करने के योग्य हो जाता है। 

   श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में कुल 43 श्लोक दिए गए हैं। इन श्लोकों का सार यही है कि मनुष्य अपने-अपने वर्ण (क्षत्रिय, वैश्य, ब्राह्मण व शूद्र) के अनुसार कर्म फल में आसक्त हुए बिना भगवान विष्णु के निमित्त कर्म करे, लाभ की इच्छा कदापि न करे, आलस्य व स्वामित्व की भावना का त्याग करे और हमेशा दूसरे मनुष्यों को सही रास्ते पर लाने के लिए अनासक्त होकर अपने कर्म पथ पर दृढ़ निश्चय के साथ चलता रहे। 

   इसी अध्याय में भगवान कृष्ण कहते हैं कि कर्मेंद्रियों से मन, मन से बुद्धि और बुद्धि से आत्मा श्रेष्ठ है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी समस्त इंद्रियों और इच्छाओं को ज्ञान के द्वारा वश में करे, जिससे कि काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का दमन हो सके। भगवान ये भी कहते हैं कि मनुष्य स्वयं को भगवान का सेवक समझे, अपने भीतर आध्यात्मिक ज्ञान व शक्ति का विकास करे, पाप कर्मों से दूर रहकर सद्कर्म करते हुए भगवान की भक्ति व सेवा में तल्लीन रहे। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 


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