शनिवार, 17 जुलाई 2021

श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता का दूसरा अध्याय गीता के सार के रूप में जाना जाता है। इस अध्याय में दिए गए 72 श्लोकों में आत्मा व परमात्मा, मुक्त मनुष्य के लक्षण, बुद्धि योग और विषय भोग से मुक्त होने के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है। इस अध्याय को सांख्य योग भी कहा जाता है। इसमें भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को ह्रदय की कमजोरी, मोह, शोक आदि को त्याग कर अपने धर्म के अनुसार योग में स्थित होकर अपनी समस्त इंद्रियों को वश में करते हुए निष्काम कर्म करते रहना चाहिए। 

    भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि इस संसार में कोई भी अमर नहीं है। जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है। मृत्यु के बाद कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म भी निश्चित है। मनुष्य का शरीर नाशवान है, लेकिन उसके शरीर में रहने वाली आत्मा अविनाशी, अजन्मा, शाश्वत, अव्यय, अकल्पनीय, अखंडित, अपरिवर्तनीय, अवध्य, अविकारी, स्थिर, सर्वव्यापी, एक समान रहने वाली आदि अद्भुत रूप वाली है। शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। 

   श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने यह भी कहा है कि जिस मनुष्य के अंदर इंद्रिय तृप्ति की कामना न हो, दैहिक, दैविक व भौतिक तापों में मन अविचलित रहे, दुख, सुख व कष्ट आने पर कोई असर न हो, आसक्ति, क्रोध, भय व घृणा की भावना न हो, मन और इच्छाओं पर पूरा नियंत्रण हो तथा पूर्ण ज्ञान व चेतना में दृढ़ स्थिरता हो, वही मनुष्य वास्तव में सांसारिक विषयों से मुक्त माना जाता है। सच्चे ह्रदय से भगवान के शरणागत होकर मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति, ज्ञान और मुक्ति का अधिकारी हो सकता है। - प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

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