भगवान श्री कृष्ण जी के मुखारविंद से अर्जुन को दिए गए उपदेश रुपी ज्ञान का अनुपम भंडार है श्रीमद्भगवद्गीता। मनुष्यों को भौतिक संसार के मायाजाल से निकाल कर भगवान के प्रति समर्पित होने का संदेश देने वाली इस अद्भुत कृति में कुल अठारह अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय अपने आप में विशिष्ट ज्ञान को समेटे हुए है। भक्तिभाव के साथ श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन करने से मनुष्य की समस्त जिज्ञासाओं व चिंताओं का सहज ही समाधान हो जाता है और वह सात्विक जीवन जीते हुए अंत में विष्णु लोक को गमन करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय के अंतर्गत कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल में सैन्य निरीक्षण की चर्चा की गई है। इस अध्याय में कुल 46 श्लोक हैं। इसमें शक्तिशाली अर्जुन युद्ध भूमि में सामने खड़ी विपक्षी सेना में अपने नाते-रिश्तेदार, गुरुजनों एवं मित्रों को देख कर व्यथित हो जाता है और शोक व मोह के वशीभूत होकर भगवान श्री कृष्ण से युद्ध न करने की बात कहता है। इसलिए यह अध्याय अर्जुन विषाद योग के नाम से भी जाना जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य को शोक और मोह से छुटकारा पाने के लिए भगवान की शरण लेनी चाहिए। क्योंकि वे ही मनुष्य को सही रास्ता दिखा सकते हैं और मन के विषाद को दूर कर सकते हैं। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण को ह्रषीकेश, अच्युत, कृष्ण, गोविंद, मधुसूदन, जनार्दन और प्रजापालक नामों से पुकारा गया है। वहीं अर्जुन को पार्थ और कुंती पुत्र कहा गया है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।
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