बुधवार, 31 मार्च 2021

दान का विधान

 धर्म ग्रंथ और पुराणों के अनुसार सतयुग में तप, त्रेता युग में ज्ञान, द्वापर युग में यज्ञ और कलियुग में एकमात्र दान ही मनुष्य के कल्याण का सहज मार्ग है। सुपात्र को निःस्वार्थ भाव से दान करने से इस जीवन में परम आनंद व सुख का अनुभूति तो होती ही है, मृत्यु के बाद परलोक में भी श्रेयस एवं शांति की प्राप्ति होती है। दान वचन पालन का एक ऐसा अप्रतिम शुभ कार्य है जिसमें दाता याचक को अपना सर्वस्व तक न्यौछावर कर सकता है।

नेन प्राप्यते स्वर्गः श्रीदनीनेव लभ्यते।

दानेन शत्रून् जयति व्याधिरदानेन नश्यति।

ज्योतिष शास्त्र में भी ग्रह एवं नक्षत्रों के निमित्त दान करना शुभ माना गया है। जब जन्म कुंडली, वर्ष कुंडली ग्रहगोचर आदि में ग्रह खराब स्थिति में होने के कारण जातक के जीवन में कष्ट, बाधा, रोग, कलह, ऋणग्रस्तता, वाद-विवाद आदि समस्याएँ आ रहीं हों तो अरिष्ट निवारण के लिए ग्रहों से सम्बंधित वस्तुओं का दान किया जाता है। दान के तीन प्रकार बताये गए हैं। निःस्वार्थ भाव से बिना किसी लोभ-लालच के किया गया दान सात्विक, फल प्राप्ति की आशा से किया गया दान राजस तथा श्रद्धा भाव के बिना कुपात्र को किया गया दान तामस प्रकृति का होता है। तीनों प्रकार के दान में सात्विक दान सर्वश्रेष्ठ होता है।

दान के लिए उचित स्थान और समय

वैसे तो दान कहीं भी और किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु धार्मिक एवं तीर्थस्थल, मंदिर, गौशाला, गुरुद्वारा, पूजा या धर्मस्थल आदि पर दान देना विशेष शुभ माना गया है। क्योंकि इन स्थानों पर मन एवं ह्रदय के इष्टदेव में रम जाने से अहं भाव नहीं आता हो, जो कि दान की सार्थकता के लिए आवश्यक है। दान के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। जब भी ह्रदय में दान की भावना जागृत हो, तत्काल उसे पूरा करना चाहिए। परिवार में किसी नए सदस्य का जन्म होने, जन्म दिवस या विवाह समारोह होने, पूर्णिमा, संक्रांति, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, त्रयोदशी संस्कार अथवा श्राद्ध कर्म के समय किया गया दान अक्षय फल प्रदान करने वाला होता है। मृत्यु का आभास होने पर भी किया दान इहलोक के साथ परलोक के लिए भी कल्याणकारी माना गया है।

दान के लिए पात्र व्यक्ति

दान हमेशा सुपात्र को ही दिया जाना चाहिए। कुपात्र एवं अयोग्य व्यक्ति को अशुभ फल देने वाला होता है। विद्वान, वेदपाठी, धर्मनिष्ठ, सत्यनिष्ठ और सांसारिक विरक्त व्यक्ति क पूर्ण श्रद्धा के साथ सां करने से दान का प्रभाव और फल कई गुना अधिक सार्थक हो जाता है। किसी जरूरतमंद, भूख-प्यास से व्याकुल याचक को उसकी ज़रुरत के अनुसार कोई उपयोगी वास्तु, वस्त्र, खाद्यान, भोजन आदि का दान भी शुभ माना गया है। सूर्य ग्रह का दान रविवार को, चंद्र का सोमवार को, मंगल का मंगलवार को, बुध का बुधवार को, गुरु का गुरुवार को, शुक्र का शुक्रवार को तथा शनि ग्रह का दान शनिवार को ही करना चाहिए।

ग्रहों के अनुसार दान

नवग्रहों के अशुभ प्रभाव को शुभ करने के लिए ज्योतिष शास्त्र में अशुभ ग्रहों से संबंधित वस्तुओं का दान किया जा सकता है। वस्तुओं का दान करते समय कुछ धन भी श्रद्धापूर्वक देना चाहिए। सूर्य ग्रह के लिए लाल-पीला वस्त्र, गेहूं, तांबा, माणिक्य, मसूर की दाल, लाल पुष्प या फल, लाल चंदन, स्वर्ण आदि का दान किया जा सकता है। चंद्र के लिए श्वेत वस्त्र, दूध, दही, शंख, मोती, चांदी, चीनी, चावल, मंगल के लिए स्वर्ण, गुड़, सिंदूरी वस्त्र, मूंगा, लाल मिठाई लाल मसूर, लाल गेहूं, तांबा, रक्त चंदन, बुध के लिए स्वर्ण, पन्ना, कांसा, हरा वस्त्र, हरा फल, हरी मूंग, और गुरु ग्रह के लिए पीले वस्त्र, चने की दाल, हल्दी, पुखराज या सुनैला, धान, गौघृत, धार्मिक पुस्तक, स्वर्ण, शहद आदि का दान किया जा सकता है

इसी तरह शुक्र गृह का दोष निवारण करने के लिए चावल, घी, हीरा, कपूर, चीनी, मिश्री, दही, श्वेत चंदन, श्वेत वस्त्र, शनि के लिए काला वस्त्र, साबुत उड़द की दाल, लोहा, काले चने, काले फल, नीलम, भैंसा, काले तिल, सरसों का तेल, काला कंबल जूते, राहु के लिए तलवार, गोमेद, लोहा, कंबल, स्वर्ण मिश्रित नाग, तांबे का बर्तन, काली सरसों, राई, शीशा और केतु के लिए सात प्रकार के अनाज, काजल, स्वर्ण, चांदी या तांबे का सर्प, लहसुनिया रत्न, मिठाई, कस्तूरी, ऊनी वस्त्र आदि का दान किया जा सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

उपरत्न भी कर सकते हैं धारण

 जन्म कुंडली के विश्लेषण के बाद कुछ व्यक्तियों को ज्योतिषविद् रत्न धारण करने की सलाह देते हैं। रत्न धारण करते समय ध्यान रखने योग्य बात यह है कि रत्न खंडित, चोरी किया हुआ, किसी से छीना हुआ, मुफ्त में मिला या किसी से उतरवा कर लिया हुआ नहीं होना चाहिए। रत्न को उससे संबंधित धातु के साथ सही अंगुली में ही धारण करना शुभ होता है। मंहगे रत्न की जगह उप रत्न भी धारण किए जा सकते हैं। 

   रत्न को अंगूठी, लॉकेट, ब्रेसलेट आदि किसी भी तरह से धारण कर सकते हैं, लेकिन रत्न का कुछ हिस्सा त्वचा से अवश्य स्पर्श करते रहना चाहिए। विधि पूर्वक मंत्रोच्चारण के साथ रत्न धारण करने के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद को धन, वस्त्र, अनाज, फल अथवा उपयोग की वस्तु का दान करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

पूर्व संकेतों से भी जान सकते हैं ग्रहों की अशुभता

  जीवन में अक्सर आने वाले कष्ट, दुःख, रोग, बाधाएँ, भय, पराजय, हानि, धन की कमी, दुर्घटनाएं जैसी समस्याएं नव ग्रहों के अशुभ होने का परिणाम होती हैं। कौन सा ग्रह अशुभ फल दे रहा है, ये जानने के लिए कुंडली का अध्ययन किया जाता है। कुंडली या सही जन्म की तारीख और समय न होने की दशा में जीवन में आए दिन नजर आने वाले पूर्व संकेतों से भी अशुभकारी ग्रह को जाना जा सकता है। परंतु इन अशुभकारी ग्रहों का पता तभी चल सकता है जबकि जीवन में घटने वाली घटनाओं का सटीक विश्लेषण करने की पारखी नजर हमारे पास हो।

   अनुभव के आधार पर यह पता चलता है कि जब घर या व्यावसायिक स्थल के बल्व या ट्यूबलाइट अचानक ही खराब होकर बंद हो जाएं, सोने या तांबे के बर्तन या आभूषण गुम हो जाएं, अचानक तेज बुखार, सर दर्द, तनाव, घबराहट या पित्त रोग होने लगे, पिता को कष्ट हो, किसी मुक़दमे में जीत की संभावना होने के बाद भी हार का सामना करना पड़ जाए अथवा सरकार के किसी विभाग की वजह से अचानक परेशानी का सामना करना पड़े तो कहा जा सकता है कि सूर्य बाधाकारी ग्रह है। इसी प्रकार अगर घर के नल या पाइप लाइन में लीकेज की वजह से पानी बहने लगे, पानी से भरा बर्तन या मिटटी का कोई बर्तन अचानक टूट जाए, माता या कन्या संतान को कष्ट होने लगे, मानसिक तनाव, घबराहट, बेचैनी, जुकाम, नजला, डायबिटीज और सहन शक्ति में कमी होने लगे तो ये माना जा सकता है कि चंद्र बाधाकारी ग्रह सिद्ध हो रहा है। मंगल के बाधाकारी ग्रह होने की दशा में अचानक ही मकान या जमीन को नुक्सान होता है, मकान में लगी ईंट टूट जाती है, दीपक, हवन की ज्योति या अग्नि अचानक की अपने आप बुझ जाती है और बैठे बिठाये किसी तरह की दुर्घटना या अग्नि अथवा बिजली के कारण चोट लग जाने जैसे समस्याओं से जूझना पड़ सकता है।

   सोचने समझने एवं सूंघने की शक्ति कम हो जाना, पढाई लिखाई में व्यवधान आना, काम भावना में कमी होना और त्वचा रोग उत्पन्न होने के संकेतों से पता चलता है कि बुध बाधाकारी ग्रह हो गया है। गुरु ग्रह के बाधाकारी हो जाने से धर्म एवं आध्यात्म में रूचि काम होने लगती है, झूठ बोलने की आदत पड़ने लगती है, सोने अथवा पीतल के बने बर्तन या आभूषण गुम हो जाते हैं और सर के बाल उड़ने लगते हैं। वहीँ शुक्र ग्रह के बाध्यकारी होने की वजह से हाथ एवं पैर के अंगूठे में सुन्नाहट देखने को मिलती है, त्वचा और गुप्त रोग परेशान करने लगते हैं, मन में विपरीत लिंग के प्रति काम भावना प्रबल हो जाती है और धातु क्षीण होने से कमजोरी आने लगती है।

    आलस्य एवं नींद की अधिकता होने, अस्त्र-शस्त्र या लोहे की वास्तु अथवा वाहन से चोट लगने, सावधानी के बाद भी तेल के फैलने, घर के किसी पालतू जानवर जैसे काली गाय, भैंस, कुत्ता आदि की अचानक मृत्यु हो जाने, अकारण ही किसी श्रमिक या नौकर अथवा गरीब व्यक्ति से वाद-विवाद होने जैसी समस्याएं शनि के बाधाकारी ग्रह होने का पूर्व संकेत हैं। राहु के बाधाकारी ग्रह होने के कारण घर के पालतू जानवर अचानक या तो घर छोड़कर चले जाते हैं या फिर उनकी मृत्यु हो जाती है, किसी पवित्र नदी के पास जाकर भी स्नान का मन नहीं करता, सपने में मरा हुआ सर्प, छिपकली या धुंआ वाली अनजान जगह दिखाई देने लगती है, यात्रा के दौरान कोई वस्तु या धन गुम हो जाता है और हाथ एवं पैर के नाखून विकृत होकर टूटने लगते हैं। वहीं केतु के बाधाकारी ग्रह हो जाने से हमारी बातचीत की भाषा में कड़वाहट आने लगती है, सावधानी बरतने के बाद भी कार्यों में गलतियां होने लगती हैं, अचानक पागल कुत्ते के काटने की संभावना बन जाती है, घर के पालतू पक्षी की बीमारी की वजह से मृत्यु हो जाती है और अचानक ही किसी अच्छी या बुरी खबर का सामना करना पड़ सकता है।

   नव ग्रहों के बाधाकारी होने के ये पूर्व संकेत पूर्ण नहीं हैं। इनके अलावा अन्य संकेत भी हो सकते हैं जिन्हें अनुभव के द्वारा महसूस किया जा सकता है। किसी गृह के बाधाकारी होने पर उसकी शांति और प्रसन्नता के लिए किसी कुशल ज्योतिष की सलाह से उपाय किये जाने चाहिए।--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

रविवार, 28 मार्च 2021

वास्तु दोष निवारण में उपयोगी बोनसाई पौधे

 अपने पर्यावरण को हरा-भरा और प्रदूषणमुक्त बनाये रखने के लिए पेड़-पौधों का बड़ा महत्त्व है। इनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। परंतु जगह की कमी को देखते हुए आज के समय में घर, कार्यालय, भवन, फैक्टरी, काम्प्लेक्स, पिकनिक स्पॉट, पार्क और चौराहों, मल्टी स्टोरी बिल्डिंग आदि में गमलों में पेड़-पौधे लगाने का चलन बढ़ता जा रहा है। ऐसे बड़े पेड़-पौधे जिन्हें विशेष तकनीक के द्वारा गमलों में लगाया जाता है, बोनसाई पौधे कहलाते हैं। इन पौधों की ऊंचाई और फैलाव बहुत कम होता है, परंतु इनमें फल और पुष्प आदि सामान्य पौधों के समान ही प्राप्त किये जा सकते हैं।

वास्तु दोषों के निवारण के लिए बोनसाई पौधे 
वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार अगर आवासीय भवन और कार्यालयों में बोनसाई पौधे लगाए जा रहे हों तो इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि उन्हें पर्याप्त खाद और सूरज की धूप मिलती रहे। क्योंकि इन पौधों के लिए विशेष देखरेख की आवश्यकता होती है। बोनसाई पौधों की समुचित वृद्धि के लिए इनमें सड़ने वाली रेशेदार वनस्पति, गिरे हुए कोमल पत्ते, नीम की खली, गोबर से बनी खाद का प्रयोग ही करना चाहिए। कीटनाशक दवाओं और रासायनिक खाद के प्रयोग से बचना चाहिए। सही देखरेख के साथ उचित दिशा में लगाए गए बोनसाई पौधे भवन में सकारात्मक ऊर्जा देते हैं और वास्तु दोषों का निवारण भी करते हैं।
शुभ और अशुभ पौधे 
वास्तु  नियमों के अनुसार घर एवं कार्यालयों में आम, संतरे, सेब, अंगूर, अनार, केसर, नीम, मौलश्री, चंदन, जयंती, गुड़हल, अशोक, नीम, चंपा, तुलसी, बेल, गुलाब, चमेली आदि के बोनसाई पौधे लगाए जा सकते हैं। जबकि भवन और उसके आस-पास कांटेयुक्त पेड़-पौधे, बेर, दूध निकलने वाले पौधे, कैथल, बरगद, पीपल, बांस, कैक्टस, ढाक आदि लगाना अशुभ फलदायी होता है। इस तरह के बोनसाई पौधे न सिर्फ नकारात्मक ऊर्जा देते हैं बल्कि कई तरह की समस्याओं जैसे अर्थाभाव, घरेलू विवाद, रोग आदि का कारण भी बनते हैं।
सही दिशा का रखें ध्यान 
वास्तु नियमों के अनुसार अगर घर या कार्यालय में उचित दिशा का ध्यान रखते हुए बोनसाई पौधे लगाए जाएं तो इनका शुभ प्रभाव देखने को मिलता है। पूर्व दिशा में तुलसी, पश्चिम में शाक-सब्ज़ी, उत्तर में हरी कोमल दूब या घास और दक्षिण में बड़े पत्तों वाले पौधे जैसे मनी प्लांट लगाने चाहिए। इसी प्रकार उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) में हरी दूब घास, दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) में जलीय छायादार पौधे, दक्षिण-पश्चिम दिशा (नैऋत्य कोण) में भारी तने या पत्ते वाले पौधे तथा उत्तर-पश्चिम दिशा (वायव्य कोण) में वायु को शुद्ध करने वाले पौधे लगाना शुभ एवं श्रेष्ठ रहता है। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

योग के आठ अंगों में शामिल हैं यम और नियम

नारद पुराण में योग के आठ अंगों, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का उल्लेख किया गया है। इनमें से  यम और नियम का पालन करते हुए अपनी बुद्धि को स्थिर करके अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाया जा  सकता है। 

   अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (द्रव्यों का संचय न करना), अक्रोध (शांत रहना) और अनसूया (ईर्ष्या न करना) कर्म यम के अन्तर्गत आते हैं, जबकि तप, स्वाध्याय, संतोष, शौच, भगवान विष्णु जी की आराधना और संध्योपासन कर्म नियम कहलाते हैं।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

मंगलवार, 23 मार्च 2021

बीमारी से बचने के लिए मंत्र जाप करना है श्रेष्ठ उपाय

 ज्योतिष शास्त्र की मान्यता के अनुसार हमारे सौर मंडल में मौजूद सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, ब्रहस्पति, शुक्र, शनि, राहू और केतु ग्रहों की अनिष्ट स्थान-स्थिति और उनकी दृष्टि के प्रभाव से मनुष्यों को दुख, कष्ट, रोग, कलह, धन हानि, आकस्मिक दुर्घटना, मृत्यु भय जैसी पीड़ाओं से गुजरना पड़ता है। वर्तमान समय में भी भारत सहित संसार के अधिकांश देशों के नागरिक अनिष्ट-ग्रह प्रभाव से कोरोना जैसी आकस्मिक महामारी के कारण बीमारी का शिकार हो रहे हैं और काल के गाल में समा रहे हैं। कोरोना वायरस के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए सरकार की ओर से लॉकडाउन जैसे कठोर कदम उठाते हुए लोगों को अपने घरों से बाहर न निकलने के निर्देश भी दिए हैं। ऐसा करना आवश्यक भी है। 

   बीमारी से बचने के लिए घर में रहकर मंत्र जाप करना ही श्रेष्ठ है। ज्योतिष की दृष्टि से देखा जाए तो जिन मनुष्यों की कुंडली में रोगकारक ग्रहों की स्थिति अनिष्टकारी है, उनके लिए तो ऐसे समय में घर से बाहर निकलना घातक ही माना जा सकता है। क्योंकि ग्रहों की अनिष्टकारी स्थिति मनुष्य को शीघ्र ही रोगग्रस्त बना सकती है। ऐसी स्थिति में कोई भी औषधि लाभ नहीं पहुंचाती तथा मनुष्य का बल, वीर्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता अनिष्टकारी ग्रह द्वारा हरण कर लिया जाता है। इसीलिये इन दिनों शरीर को मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाए रखने के लिए अनिष्टकारी ग्रहों के बीज मंत्र का जाप करना एक आसान और प्रभावी उपाय हो सकता है। इन मंत्रों के जाप के लिए विशेष कुछ भी नहीं करना पड़ता है। बस जब भी समय मिले अपने ईष्ट देवी-देवता के सामने या फिर एकांत जगह में आसन बिछाकर बैठ जाइए और दांए हाथ में माला लेकर शुद्ध उच्चारण करते हुए बीज मंत्र का जाप करते जाइए। ध्यान सिर्फ इतना ही रखना है कि मंत्र जाप से पहले शरीर की शुद्धि कर ली गई हो और मंत्र जाप करते समय मन में किसी प्रकार के अपवित्र विचार और किसी के प्रति दुर्भावना न हो। नवग्रहों के बीज मंत्र इस प्रकार हैं:

सूर्य ग्रह के लिए "ऊं ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:", चंद्र ग्रह के लिए " ऊं श्रां श्रीं श्री स: चंद्राय नम:", मंगल ग्रह के लिए "ऊं क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:", बुध ग्रह के लिए " ऊं ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:", ब्रहस्पति ग्रह के लिए "ऊं ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम:", शुक्र ग्रह के लिए " ऊं द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:", शनि ग्रह के लिए "ऊं प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:", राहु ग्रह के लिए " ऊं भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:" और केतु ग्रह के लिए "ऊं स्रां स्रीं स्रौं स: केतवे नम:" मंत्र का जाप किया जा सकता है। ज्योतिषविदों की राय है कि कोरोना वायरस के लिए विशेष रूप से राहु ग्रह जिम्मेदार है, इसलिए इन दिनों राहु ग्रह की शांति के लिए राहु ग्रह के बीज मंत्र का जाप करना लाभकारी सिद्ध हो सकता है। 

  माना जाता है कि जो भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ ध्यान लगा कर बीज मंत्र का जाप करता है, उसके जीवन में बहुत से सकारात्मक बदलाव आने लगते हैं। जन्म कुंडली में जो ग्रह अनिष्ट फल दे रहे होते हैं, वे भी मंत्र जाप करने से शुभ फल देने लग जाते हैं। बीज मंत्र के जाप से मानसिक शांति, अर्थ लाभ, रोगों से मुक्ति, संतान सुख, कार्य सिद्धि, परिवार में सुख-समृद्धि, व्यापार में उन्नति, लिए गए लोन से मुक्ति आदि लाभ मिलते हैं। अगर बीज मंत्र का जाप संबंधित ग्रह से जुड़े दिन या वार को करते हुए व्रत उपवास नियम का पालन भी किया जाए तो सकारात्मक परिणाम अति शीघ्र मिलने लगते हैं। बीज मंत्र का जाप कब व कितने दिनों तक और कितनी माला किया जाए, व्रत में क्या खाया-पिया जाए, इसकी जानकारी किसी भी ज्योतिषविद् या व्रत कथा की पुस्तक से हासिल की जा सकती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

रविवार, 21 मार्च 2021

शरीर के अंगों से होता है ग्रहों का संबंध

 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बारह राशियों के स्वामी ग्रहों का संबंध मनुष्य के शरीर के अलग-अलग अंगों से होता है। जो ग्रह अशुभ फल देगा, उससे संबंधित शरीर के अंग में भी कष्ट होने की संभावना रहेगी। 

  मेष राशि के स्वामी मंगल ग्रह का सीधा संबंध मस्तिष्क के क्रिया-कलापों से होता है। वृष राशि के स्वामी ग्रह शुक्र का संबंध गले से, मिथुन राशि के स्वामी ग्रह बुध का संबंध छाती व पेट से और कर्क राशि के स्वामी ग्रह चंद्रमा का संबंध शरीर के पृष्ठ भाग से होता है। 

   सिंह राशि के स्वामी ग्रह सूर्य का संबंध ह्रदय, रीढ़ की हड्डी और कोहनी से नीचे के भाग से, कन्या राशि के स्वामी ग्रह बुध का संबंध पेड़, जनन अंग, हाथ, आंत्र व विसर्जन तंत्र से, तुला राशि के स्वामी ग्रह शुक्र का संबंध शरीर के पृष्ठ भाग और मूत्राशय तंत्र से और वृश्चिक राशि के स्वामी ग्रह मंगल का संबंध पेडू व जनन अंगों से होता है। 

 धनु राशि के स्वामी ग्रह बृहस्पति ग्रह का संबंध जांघ, नितंब और यकृत से, मकर राशि के स्वामी ग्रह शनि का संबंध घुटने व हड्डियों से, कुंभ राशि के स्वामी ग्रह शनि का संबंध त्वचा और टखनों से और मीन राशि के स्वामी ग्रह बृहस्पति का संबंध पैर व नाड़ी तंत्र से होता है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

ग्रहों के अशुभ होने से आती हैं समस्याएं

सौरमंडल में मौजूद नवग्रहों की गति एवं कुंडली में स्थिति का असर पृथ्वी पर रहने वाले समस्त जीवों पर पड़ता है। यहां तक कि वनस्पति भी इन्हीं ग्रहों से ऊर्जा ग्रहण करके अपना पोषण करती हैं। यूं तो ग्रहों की अशुभता के बहुत से कारण ज्योतिष शास्त्र में मिलते हैं, परंतु कुछ ऐसे सामान्य कारण भी हैं जो ग्रहों की अशुभता का कारण बनते हैं और जातक के जीवन में धन हानि,कलह, शत्रुओं से पीड़ा, शारीरिक एवं मानसिक रोग, संतान से परेशानी, व्यापार में घाटा, नौकरी में बाधा, मानसिक तनाव, विवाह में बाधा जैसी समस्याएं आने लगती हैं।

* किसी भी जीव या प्राणी की आत्मा को कष्ट या ठेस पहुंचाने, सरकारी टैक्स की चोरी करने, दादा, पिता या श्वसुर आदि का अपमान करने से सूर्य ग्रह कुपित होकर अशुभ फल देते हैं। नानी, दादी, माता या परिवार की किसी बुजुर्ग और सम्मानित महिला को कष्ट देने तथा किसी की वस्तु को द्वेषपूर्वक लेने से चंद्र ग्रह का अशुभ असर जीवन पर पड़ता है। भाई के साथ झगड़ा या धोखा करने तथा पत्नी के भाइयों का अपमान करने से मंगल ग्रह का प्रकोप जातक को झेलना पड़ सकता है।

* बहन, बेटी, बुआ, मौसी, पत्नी की बहन, पत्नी की भाभी और किन्नरों को कष्ट देने से बुध ग्रह पीड़ित होकर अशुभ फल देते हैं। पिता, दादा, नाना, गुरु और साधू-सन्यासियों का उपहास उड़ाने तथा उनको अपमानित करके कष्ट देने से गुरु ग्रह कुपित होकर अशुभ फल देने लगते हैं। जीवन साथी को कष्ट देने, गंदे, फटे और पुराने वस्त्र धारण करने अथवा घर में सजोकर रखने और पर स्त्री के साथ संबंध बनाने से शुक्र ग्रह पीड़ित होकर जातक को कष्ट देते हैं।

* चाचा, ताऊ से झगड़ा करने, किराए पर लिए गए मकान या दूकान को खाली न करने अथवा खाली करने के बदले में धन मांगने, शराब, मांस या नशीले पदार्थों का सेवन करने से शनि ग्रह कुपित होते हैं जिसकी वजह से जातक जीवन में कष्ट भोगता है।

* बड़े भाई का अपमान करके उन्हें कष्ट पहुंचाने और सर्प पालकर अपनी आजीविका कमाने वाले सपेरों को कष्ट पहुंचाने पर राहु ग्रह नकारात्मक प्रभाव देने लगते हैं। इसी प्रकार भांजे एवं भतीजे को कष्ट देने, कुत्ते को मारने, मंदिर या किसी धर्म स्थल को नष्ट करने अथवा मंदिर में लगे ध्वज को क्षति पहुंचाने, किसी मुक़दमे में झूठी गवाही देने और किसी के साथ धोखा करने से केतु ग्रह कुपित होकर जातक को कष्ट देते हैं।

* नवग्रहों को अपने अनुकूल और शुभ बनाने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि सदैव शुभ कार्य ही किये जाएं और सभी को समुचित आदर-सत्कार दिया जाए। साथ ही ईश्वर की भक्ति करते हुए कुपित ग्रहों की शांति एवं प्रसन्नता के लिए ज्योतिष के अनुसार उपाय करते रहना भी जरूरी है। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा 

सकारात्मक सोच के साथ बनाए रखें जीने का जज्बा

सीधी और सच्ची बात इतनी सी है कि हमारे जीवन के अतीत में जो कुछ भी हुआ है या वर्तमान में हो रहा है या फिर भविष्य में होगा, वो हमारा प्रारब्ध ही है। सुख-दुख, अमीरी-गरीबी, अच्छा-बुरा, पसंद-नापसंद, मान-अपमान, मिलना-बिछुड़ना, हंसना-रोना, बीमारी-दुर्घटना, संयोग-वियोग, जन्म-मृत्यु......सब कुछ हमारे वश के बाहर है। हम सिर्फ प्रयास कर सकते हैं, सोच-विचार कर सकते हैं, दूसरों से चर्चा कर सकते हैं, अपने आप में चिंतन कर सकते हैं। 

  जीवन की सत्यता तो यही है कि हम अपने वर्तमान पर ध्यान दें, बीते समय को याद करके बेवजह अपनी ऊर्जा को नष्ट न करें और न ही आने वाले कल के बारे में सोच कर अपने वर्तमान को बर्बाद करें। जो आज है उसी का आनंद लें। आज जो हमारे पास है उसी का उपयोग करें। आज जो हमारे साथ है, उसी के साथ मिलकर अपने सपनों को साकार करें। यहां कुछ भी स्थायी नहीं है। आज जो हमसे जुड़ा है, कल वो हमसे दूर भी हो सकता है। अपने दिलो दिमाग से इस भ्रम को बिल्कुल बाहर निकाल दें कि हम ही कर्ता-धर्ता हैं, हमारे चाहने से ही सब कुछ होता रहा है, हम जो चाहे, हासिल कर सकते हैं। 

   कर्म करते रहना हमारी फितरत होनी चाहिए। फल की आशा में बैठे रहना कदापि उचित नहीं है। दूसरों को पसंद करें, लेकिन इस बात की कोई उम्मीद न रखें कि दूसरे भी हमें पसंद करें। अगर प्रारब्ध में होगा तो हमारे मनमाफिक फल अवश्य मिलेगा, दूसरे भी हमें अवश्य ही पसंद करेंगे, जीवन में वो सब कुछ हासिल होगा जो हम चाहते आए हैं। बस धैर्य, विश्वास, कर्म, आशा और सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीने का जज्बा अपने अंदर बनाए रखने की आवश्यकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

गुरुवार, 18 मार्च 2021

सपनों से जान सकते हैं मनुष्य की प्रकृति

 रात्रि या दिन में सोने के बाद बहुत से लोग सपने देखते हैं। सपने देखते समय हमारा अंतर्मन स्थूल शरीर के बंधन से तो मुक्त हो जाता है, लेकिन हमारे विचार, सोच, स्वभाव, कार्य आदि उस पर बंधन नहीं लगा पाते हैं। सपने अच्छे व बुरे, दोनों तरह के हो सकते हैं। सपनों के द्वारा दुख, हर्ष, शोक, भय, उद्वेग आदि आंतरिक भाव व्यक्त होते हैं। यह जरूरी नहीं है कि देखे गए सभी सपने फलीभूत हों। कुछ ही सपने आने वाले समय में सच हो पाते हैं। 

  यहां हम मनुष्य की प्रकृति के साथ सपनों के संबंध की चर्चा कर रहे हैं। आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य की प्रकृति तीन प्रकार की होती है, वात, पित्त और कफ। या तो मनुष्य इनमें से किसी भी एक प्रकृति का हो सकता है या फिर दो या दो से अधिक मिश्रित प्रकृति का हो सकता है। सपने में जो लोग अपने को आकाश में उड़ता हुआ या भोजन करते हुए देखते हैं, वे वायु प्रकृति वाले होते हैं। ऐसे लोगों में पेट से संबंधित बीमारी होती रहती है। 

   इसी तरह जो लोग सपने में अपने को किसी नदी, नहर, तालाब, झरने या बाथरूम में नहाते देखते हैं, बरसात होते या पानी पीते हुए देखते हैं, उनकी कफ प्रकृति होती है। ऐसे लोगों में खांसी, जुकाम, नजला, कफ बनना, दमा, गले की खराश, डायबिटीज जैसी बीमारी होने की संभावना रहती है। सपने में किसी भी रूप में अग्नि देखने वालों की पित्त प्रकृति होती है। ऐसे लोग पित्त से संबंधित रोग, पेट में जलन, मुंह में खट्टा पानी आना, वमन, जी मिचलाना जैसी बीमारी से पीड़ित हो सकते हैं।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

शुभ कार्यों के लिए वर्जित है होलाष्टक

स्नेह, प्रेम, सद्भाव और राग-रंग का त्यौहार होली फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष रविवार 28 मार्च को होलिका दहन होगा और सोमवार 29 मार्च को रंग व गुलाल से होली खेली जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार होली से ठीक आठ दिन पहले फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से आठ दिन के लिए होलाष्टक लग जाते हैं, जिनमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। इस वर्ष 22 मार्च को होलाष्टक लग रहे हैं जो होलिका दहन के बाद समाप्त हो जायेंगे।

होलाष्टक में नहीं होते हैं शुभ कार्य

धार्मिक और पौराणिक मान्यता है कि होलाष्टक के आठ दिनों में अष्टमी से पूर्णमासी के दौरान सौर मंडल के आठ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि और राहु उग्र स्वरुप धारण कर लेते हैं। जिसके अशुभ प्रभाव से बचने के लिए आठ दिनों तक शुभ कार्य जैसे विवाह, नामकरण, गृह प्रवेश, नया वाहन या संपत्ति खरीद आदि नहीं किए जाते हैं। माना जाता है कि होलाष्टक में शुभ कार्य करने से बनते कार्य में रुकावट, मानसिक व शारीरिक कष्ट, धन की हानि, संतान से परेशानी हो सकती हैं। होलाष्टक में शुभ कार्य न करने के पीछे यह भी मान्यता है कि भगवान नारायण के परम भक्त प्रह्लाद को बुआ होलिका के साथ अग्नि में बैठाने के आदेश के बाद धर्मप्रेमी लोगों में दुःख व्याप्त होने से शुभ कार्य करना अशुभ माना गया। यह सर्वविदित ही है कि होलिका दहन में नारायण की कृपा से प्रह्लाद सकुशल बच गए जबकि बुआ होलिका अग्नि में ही भस्म हो गयी अर्थात बुराई का अंत हो गया और अच्छाई की जीत हुई। 

 कामदेव के क्रोध से भी संबंधित है होलाष्टक 
कहा जाता है कि भगवान शिव ने जिस दिन कामदेव को क्रोधावेश में आकर भस्म किया था, उस दिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी। इसलिए तभी से होलाष्टक की शुरुआत मानी जाती है। एक मान्यता यह भी है कि भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण ने अष्टमी के दिन से ही गोपियों के साथ होली खेलना शुरू किया और लगातार आठ दिनों तक होली खेलने के बाद रंगों से सराबोर वस्त्रों को होलिका दहन के बाद अग्नि में समर्पित किया था।

होलाष्टक पर  ऐसे करें पूजन
होलाष्टक के पहले दिन अष्टमी को होलिका दहन के लिए उचित स्थान चुन कर गाय के गोबर से लीपकर शुद्ध करते हैं । इसके बाद आटा और हल्दी से स्वस्तिक बनाकर सूखी लकड़ी व कंडों का ढ़ेर बनाकर ऊपर की तरफ होली का डंडा स्थापित करते हैं। होलाष्टक के दौरान कृष्ण भक्ति से जुड़े भजन और मंत्र जप आदि किये जाते हैं। ऐसा करने से भगवान नारायण की कृपा से  जीवन में सुख, शांति, सद्भाव और प्रेम की प्राप्ति होती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।

राशि और ग्रहों की स्थिति से भी हो सकता है परिवार का आकलन

 सृष्टि के संचालन के लिए घर-परिवार को आवश्यक बताया गया है। इसलिए जन्म कुंडली के बारह भावों को किसी न किसी संबंध से जोड़कर देखा जाता है। अन्य बातों के साथ-साथ पहले भाव से पितामह, दूसरे से पारिवारिक सुख, तीसरे से छोटे भाई-बहिन, चाचा, मामा का सुख,चौथे भाव से माता, श्वसुर, पांचवें से संतान, छठे से मामा, मौंसी, सातवें से पति और पत्नी, छोटे भाई-बहिन की संतान, आठवें से पिता के बड़े भाई, नवें से छोटी बहिन के पति, दसवें से पिता व सास, ग्यारहवें से बड़े भाई, दामाद, पुत्रवधु, दूसरी पत्नी और बारहवें भाव से शैयासुख आदि  की जानकारी मिलती है। कुंडली के अलग-अलग भावों में स्थित राशि और ग्रहों से जातक के पूरे परिवार और उनके साथ संबंधों का आकलन किया जा सकता है। 

   कालसर्प दोष वाली कुंडली के जातकों के वैवाहिक जीवन में दुःख, विरोध, अपयश, विवाह में विलंब तथा जीवन साथी से बिछोह की संभावनाएं बनी रहती हैं। इन जातकों का पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण होने के साथ-साथ विवाह विच्छेद तक की नौबत आ सकती है। जिन जातकों की कुंडली में मंगल दोष होता है उनका विवाह देरी से होने और विवाह के बाद कई तरह की समस्याएं देखी जाती हैं। बृहस्पति संहिता के अनुसार गुरु व शुक्र के अस्त होने की स्थिति में विवाह संस्कार कराना निषिद्ध माना गया है अन्यथा वैवाहिक जीवन कष्टकर  हो जाता है तथा किसी एक को अपने जीवन साथी से बिछुड़ना भी पड़ सकता है। जबकि पाराशर होराशास्त्र के अनुसार लग्नेश के लग्न में ही स्थित रहने पर जातक के या तो दो स्त्रियां होती हैं अथवा वह दूसरी स्त्रियों में आसक्त रहता है।

    सूर्य ग्रह के कुंडली में दूसरे भाव में रहने पर पुत्र और पौत्र का सुख मिलता है जबकि सातवें भाव में सूर्य पति या पत्नी से कलह कराता है। मीन राशि का सूर्य श्वसुर से धन लाभ दिलाता है। मेष राशि में चंद्र ग्रह के बैठे होने पर जातक को माता का सुख नहीं मिलता, वहीं वृश्चिक और कुम्भ राशि में चंद्र के होने पर जातक का झुकाव दूसरी स्त्रियों की तरफ होता  है। तीसरे भाव का मंगल भाई के सुख से वंचित कराता है, जबकि बारहवें भाव में मंगल के रहने पर दांपत्य जीवन में सुख नहीं होता।
जन्म कुंडली के दूसरे भाव में बुध होने पर जातक पिता का भक्त होता है। सिंह राशि का बुध भाई का सुख नहीं देता तो तुला राशि का बुध वैवाहिक जीवन के सुख को कम कर देता है। मीन और धनु राशि में बुध होने पर जातक को सुंदर एवं सुशील पत्नी मिलती है। दूसरे भाव में गुरु जातक को अच्छी पत्नी दिलाता है वहीं ग्यारहवें भाव में गुरु जातक के एक से अधिक स्त्रियों से संबंध बनाता है।
    
   चौथे, सातवें और बारहवें भाव में बैठा शुक्र ग्रह जातक को दूसरी स्त्रियों की ओर आकर्षित कराता है। कुंभ राशि में शुक्र पर स्त्री गमन की ओर ले जाता है तो सिंह राशि का शुक्र स्त्री से धन लाभ कराता है। कुंडली की सातवें भाव में शनि की उपस्थित पत्नी को रोगी बनाती है। कर्क राशि में शनि होने पर जातक माता का विरोधी होता है वहीँ मीन राशि में बैठा शनि पुत्र से कलह कराता है।
कुंडली के दूसरे चौथे एवं सातवें भाव में राहु की उपस्थिति से स्त्री सुख में कमी आती है तो दसवें भाव का राहु जातक को  पिता के सुख से वंचित कराता है। इसी प्रकार केतु के दूसरे, तीसरे, चौथे और सातवें भाव में होने पर जातक का विरोध परिवार के सदस्यों से बना रहता है तथा उसे पत्नी या पति से पीड़ा झेलनी पड़ती है। ---प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा 

मंगलवार, 16 मार्च 2021

घर के स्थापित कर सकते हैं पारद शिवलिंग

 धार्मिक मान्यता है कि घर में शिवलिंग स्थापित करके पूजा नहीं की जाती है, लेकिन पारद शिवलिंग इसके अपवाद हैं। घर में पारद शिवलिंग की पूजा करना संपूर्ण सौभाग्य का सूचक माना गया है। विधि-विधान के अनुसार मंत्र सिद्ध पारद शिवलिंग के पूजन से धन, समृद्धि, सुख, सम्मान, शांति, व्यापार में लाभ, संतान, आरोग्य सुख आदि की प्राप्ति होती है। 

    शास्त्रों के अनुसार पारद शिवलिंग की स्थापना घर, दुकान, फैक्ट्री, कार्यालय, वाहन आदि में की जा सकती है। घर में स्थापित पारद शिवलिंग पर जल चढ़ाना अनिवार्य नहीं होता। पारद शिवलिंग के दर्शन एवं पूजन से वास्तु दोष, कालसर्प दोष, पितृ दोष, ग्रहों के अशुभ फल, शनि की साढ़े साती जैसी समस्याओं से भी छुटकारा मिलने लगता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा 

सोमवार, 15 मार्च 2021

अपने धर्म का पालन करने वाला है सच्चा ईश्वर भक्त

 सर्व शक्तिमान ईश्वर की आराधना हम सब अपने-अपने ढंग से करते हैं और अपने आप को उनका सच्चा एवंपरम प्रिय भक्त कहलाना पसंद करते हैं। परन्तु सच्चे भक्त की क्या परिभाषा होती है, यह हम जानते तक नहीं हैं और जानना भी नहीं चाहते हैं। निहित स्वार्थ के लिए भगवान् से प्रार्थना करना, धार्मिक स्थलों की यात्रा करना, पवित्र नदियों में स्नान करना, वर्तमान और परलोक सुधारने के लिए गर्व के साथ दान-दक्षिणा देना सच्ची भक्ति नहीं है। 

    पुराणों में भगवान् ने स्वयं कहा है कि जो मनुष्य संसार के समस्त प्राणियों के हित के बारे में चिंतन करता है, जो दूसरों के दोष नहीं देखता, जो अपनी समस्त इन्द्रियों को अपने वश में रखता है और जिसके ह्रदय में किसी के भी प्रति किंचितमात्र भी ईर्ष्या भाव नहीं है, वही भगवान् का सच्चा भक्त है। 

    इसके साथ-साथ वह मनुष्य भी भगवान् की सच्ची भक्ति करने वाला माना गया है, जो कभी भी मन, वाणी और क्रिया द्वारा किसी को भी पीड़ा नहीं पहुंचाता, जिसमें कुछ भी संग्रह करने का स्वभाव नहीं है तथा जो निष्काम एवं शांत भाव से अपने कार्य भगवान् को समर्पित करता हुआ पूर्ण करता रहता है.

   श्रीमदभगवदगीता में भी भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए स्पष्ट कहा है कि निंदनीय कर्मों से अपने आप को च्युत करके सात्विक बुद्धि वाला प्रत्येक मनुष्य जो फल की अभिलाषा किये बिना अपने धर्म का पालन करता है, वह उन्हें बहुत प्रिय है क्योकि वह भी सच्चा भक्त है।--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

मनोकामनाएं पूरी करने वाला है कल्प वृक्ष

हमारे प्राचीन वेद, पुराण आदि ग्रंथों में कल्प वृक्ष नाम के एक ऐसे विशालकाय वट का उल्लेख मिलता है, जिसकी प्राप्ति समुद्र मंथन के समय चौदह रत्नों के साथ हुई थी। इन रत्नों में से कल्प वृक्ष को इंद्र देवता को प्रदान किया गया था, जिन्होंने इस वृक्ष की स्थापना हिमालय की उत्तर दिशा में स्थित सुरकानन में कर दी। 

   कल्प वृक्ष को देवताओं के अद्भुत वृक्ष के रूप में मान्य किया गया है। नारद पुराण में वर्णित है कि कल्प वृक्ष पर साक्षात भगवान बालमुकुंद स्वयं विराजते हैं। माना जाता है कि कल्प वृक्ष के नीचे बैठकर पूर्ण श्रद्धा भाव से भगवान की पूजा अर्चना करने और वृक्ष के तने पर मौली बांधकर तीन या सात परिक्रमा लगाने से श्रदालुओं की सभी मनोकामनाएं तो पूरी होती ही हैं, बार-बार जन्म एवं मृत्यु के बंधन से भी मुक्ति मिल जाती है। 

  देवताओं को अत्यंत प्रिय कल्प वृक्ष को कई और भी नामों से जाना जाता है, जैसे-कल्प द्रुप, कल्प तरु, सुर तरु, देव तरु, कल्प लता आदि। पद्मपुराण के अनुसार पारिजात वृक्ष, ही कल्प वृक्ष है। वहीं नारद पुराण के अनुसार, कल्प वृक्ष को सत्य युग में वट, त्रेता युग में वटेश्वर, द्वापर युग में कृष्ण और कलियुग में पुराण पुरुष के नाम से भी जाना जाता है। इस्लामिक धार्मिक साहित्य में भी तूबा नाम के एक ऐसे वृक्ष का वर्णन किया गया है, जो स्वर्ग का उपवन कहलाता है। 

   बरगद के विशालकाय वृक्ष के समान ही कल्प वृक्ष का स्वरूप होता है। इस वृक्ष की ऊंचाई सत्तर फुट, वृक्ष के तने का व्यास पैंतीस फुट और तने का घेराव एक सौ पचास फुट तक होता है। कल्प वृक्ष पर भी अन्य वृक्षों की तरह पुष्प और फल लगते हैं। कल्प वृक्ष की औसत आयु दो हजार पांच सौ से तीन हजार साल तक की मानी गई है। 

   नारद पुराण में कहा गया है कि इस वृक्ष को कल्प वृक्ष इसलिए कहा गया है क्योंकि इसकी आयु एक कल्प है। एक कल्प चौदह मनवंतर का होता है और एक मनवंतर तीस करोड़ चौरासी लाख अड़तालीस हजार वर्षों का होता है। यही कारण है कि कल्प वृक्ष कल्पांत तक भी नष्ट नहीं होता। आज भी भारत के रांची, अल्मोड़ा, काशी, बाराबंकी, बस्ती आदि स्थानों पर और दक्षिण अफ्रीका व ऑस्ट्रेलिया में हजारों वर्ष पुराने कल्प वृक्ष मौजूद हैं। 

   अपने अंदर अपार सकारात्मक ऊर्जा का भंडार लिए हुए कल्प वृक्ष को कई योजन विस्तार वाला बताया गया है। नारद पुराण के अनुसार, कल्प वृक्ष, सत्य युग में एक योजन, त्रेता युग में पौन योजन, द्वापर युग में आधा योजन और कलियुग में एक चौथाई योजन विस्तार लिए हुए है। कई तरह के औषधीय गुणों से भरपूर कल्प वृक्ष को एक परोपकारी वृक्ष कहा जाए तो कुछ भी गलत नहीं होगा। कल्प वृक्ष के पत्ते, पुष्प, फल आदि का उपयोग दमा, मलेरिया, और एलर्जी जैसी बीमारियों के उपचार में किया जाता है। 

   माना जाता है कि जहां कल्प वृक्ष होता है, वहां सूखा नहीं पड़ता। नारद पुराण में कहा गया है कि कल्प वृक्ष की छाया में बैठ कर भगवान बालमुकुंद से प्रार्थना करने से ब्रह्म हत्या के अपराध से मुक्ति मिल जाती है। इसलिए कल्प वृक्ष को पवित्र और मनोवांछित फल देने वाला दिव्य वृक्ष माना गया है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

हथेलियों का दर्शन होता है मंगलकारी

प्रातः जागते ही अपनी दोनों हथेलियों का दर्शन करने को ज्योतिष शास्त्र में मंगलकारी माना गया है। सामुद्रिक शास्त्र (हस्तरेखा विज्ञान) के अनुसार मनुष्य के हाथ में मातृ रेखा, पितृ रेखा और आयु रेखा सबसे महत्वपूर्ण होती हैं। ये तीनों रेखाएं क्रमशः पवित्र गंगा, यमुना और सरस्वती माता का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसलिए जो लोग प्रातः अपनी हथेलियों का दर्शन करते हैं, उन्हें त्रिवेणी दर्शन का शुभ फल स्वत: ही प्राप्त हो जाता है। 

    सामुद्रिक शास्त्र में यह भी कहा गया है कि हथेलियों में पितृ रेखा के स्वामी ब्रह्मा जी, मातृ रेखा के स्वामी विष्णु जी और आयु रेखा के स्वामी शिव जी हैं। प्रातःकाल हथेलियों के दर्शन मात्र से ही इन तीनों देवताओं की कृपा भी मिलती है। देवताओं की कृपा पाने के लिए प्रातः उठकर सबसे पहले अपनी हथेलियों का दर्शन अवश्य करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।

   

तुलसी में बसते हैं त्रिदेव

 भारतीय धर्म एवं संस्कृति में बहुत से पेड़-पौधों को पूजनीय मानते हुए उन्हें लगाने एवं उनकी पूजा आराधना करना अनिवार्य बताया गया है। इनमें तुलसी, पीपल, आंवला, बरगद, अशोक, आम, बेल, कदली, नारियल, शमी आदि प्रमुख हैं। यद्यपि इन पौधों का सीधा संबंध हमारे पर्यावरण के संरक्षण से है फिर भी अनेक धार्मिक और मांगलिक कार्यों में इनका उपयोग किया जाता है। 

   तुलसी एकमात्र ऐसा पौधा है जो आसानी से कहीं भी लगाया जा सकता है। इसके लिए ज्यादा जगह की भी आवश्यकता नहीं होती है। भगवान विष्णु को तुलसी बहुत प्रिय हैं। पूजा अर्चना के बाद भगवान को लगाए जाने वाले भोग और प्रसाद के साथ तुलसी दल का प्रयोग अधिक शुभ फलदायी माना गया है। कहते हैं कि जिस घर में तुलसी का पौधा बिना किसी विशेष श्रम के वृद्धि करता है, वहां सुख, समृद्धि, शांति और संपन्नता बनी रहती है। अगर भवन में किसी प्रकार का वास्तु दोष है तो वह भी घर के आंगन या ईशान कोण में तुलसी को लगाने से दूर हो जाता है।

   तुलसी में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के साथ-साथ त्रिदेवी महालक्ष्मी, महाकाली तथा सरस्वती का वास होता है। नारद पुराण में कहा गया है कि तुलसी के पौधे पर जल अर्पित करने वाला, तुलसी के पौधे के मूल भाग की मिट्टी का तिलक लगाने वाला, तुलसी के चारों ओर कांटों का आवरण या चहारदीवारी बनवाने वाला और तुलसी के कोमल दलों से भगवान विष्णु के चरण कमलों की पूजा करने वाला मनुष्य जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त होता है। ब्राह्मणों को कोमल तुलसी दल अर्पित करने वाले मनुष्य को तीन पीढ़ियों के साथ ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। 

   तुलसी लगाते समय पवित्रता का ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए। अपवित्र अथवा दूषित स्थान पर तुलसी लगाने से दोष होता है। तुलसी के पौधे को कभी भी झूठे एवं गंदे हाथों से स्पर्श नहीं करना चाहिए। घर में तुलसी का पौधा सदैव पूर्व या उत्तर दिशा या फिर ईशान कोण में ही लगाना चाहिए। वास्तु शास्त्र में दक्षिण दिशा में तुलसी लगाना दोषपूर्ण माना गया है। तुलसी में जो भी खाद और पानी दिया जाए वह शुद्ध एवं पवित्र हो। तुलसी के पौधे से तुलसी दल लेते समय जूते या चप्पल नहीं पहनने चाहिए। मन में शुद्ध भाव रखते हुए तुलसी को हाथ जोड़कर प्रणाम करके ही तुलसी दल तोड़ना चाहिए। सूर्य देवता के अस्त होने के बाद, घर में किसी का जन्म या मृत्यु होने पर सूतक के दौरान, संक्रांति, अमावस्या, द्वादशी और रविवार के दिन तुलसी दल नहीं लेना चाहिए।

    घर में लगी हुई तुलसी पर नियमित रूप से जल अर्पित करने तथा प्रातः एवं सायं शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करने से सभी कष्ट एवं समस्याओं का निवारण होता है तथा घर-परिवार में सुख, समृद्धि और स्नेह-प्रेम में वृद्धि होती है। जिन घरों में परिवार में कलह, मनमुटाव, धन की कमी, स्वास्थ्य समस्या और अन्य प्रकार की परेशानी रहती हो तो उस घर के मुखिया को बिना नागा प्रातः व सांय तुलसी जी के समक्ष दीपक प्रज्ज्वलित करना चाहिए।--  प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

विकार रहित होकर ही मिलता है परम सुख

 मन का असंतोष और अस्वस्थता-ये दो मनुष्य के ऐसे चित्त के ऐसे विकार हैं जो मनुष्य को दुःख एवं कष्ट के मार्ग पर ले जाते हैं। जिस मनुष्य को इस बात का बोध होने लगता है कि मन में संतोष और उत्तम स्वास्थ्य जीवन के लिए आवश्यक हैं, तो उसकी दिशा ही बदल जाती है। जिस प्रकार भूख और प्यास लगने पर हमें भोजन-पानी की ज़रुरत होती है और हम प्रयास करके अपनी क्षुधा बुझाते हैं, उसी तरह मन में किसी कारण से असंतोष पनपने तथा मन के अस्वस्थ होने पर हम इस स्थिति से उबरने का प्रयास करते हैं। 

हमें यह बात ज्ञात रहनी चाहिए कि किसी भी बात की अति कदापि अच्छी नहीं होती। अति करने से मन में तृप्ति के स्थान पर अतृप्ति होने से अस्वस्थता आने लगती है। इसी तरह दिन-प्रतिदिन की जरूरतों के पीछे दौड़ते रहने की मानसिकता मनुष्य का स्वभाव बन गया है जिसके कारण जीवन में असंतोष पनपने लगता है। 

आत्मा की तृप्ति तभी होती है जब हमारे मन में पूर्ण संतोष का भाव हो और स्वस्थ विचार श्रृंखला हो। मन में अपवित्र और कुविचारों की वजह से ही मनुष्य जीवन में आने वाले असीम सुख के क्षणों को जीने से वंचित रह जाता है। 

जीवन में जो अच्छा नजर आ रहा हो, वह हमेशा ही श्रेष्ठ हो, यह आवश्यक नहीं है। शर्करा मीठी होती है जो खाद्य एवं पेय पदार्थों में मिठास उत्पन्न करके उन्हें स्वादिष्ट बना देती है परन्तु एक निश्चित मात्रा से अधिक प्रयोग करने पर वही मीठी शर्करा शरीर में पहुँच कर जठराग्नि को विकारयुक्त बना देती है। कहने का अर्थ यह है कि हमारे जीवन में अचार-विचार, व्यवहार, खान-पान आदि में अति का होना सदैव कष्टदायी ही होता है। संतुलित जीवन सुखदायी होता है, जिससे जीवन में श्रेष्ठता आती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मन को समदर्शी और समस्त विकारों से रहित बनाकर मनुष्य अपने जीवन में परम सुख का अनुभव कर सकते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

कर्मों का फल भोग है निश्चित

 वैदिक दर्शन में मनुष्य के पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार किया गया है।मान्यता है कि मनुष्य निरंतर शुभ-अशुभ कर्मों में रत रहता है उसी के अनुसार फल भी भोगता है। इसके लिए मनुष्य को अनेक जन्म धारण करने पड़ते हैं। वैदिक दर्शन के अनुसार कर्म तीन प्रकार के होते हैं, संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और क्रियमाण कर्म। इन कर्मों की व्याख्या विस्तार से की गई है। जिनके बारे में हम अपनी आगे की पोस्ट में विवेचना करेंगे। 

   यहां हम सिर्फ यही कहना चाहेंगे कि भगवान ने मनुष्य का जीवन यूं ही गंवा देने के लिए नहीं दिया है, बल्कि मनुष्य को जन्म मिला है सदैव शुभ कर्म करने के लिए, सद्मार्ग पर चलने के लिए, समस्त मानवता की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने के लिए और ईश्वर भक्ति के द्वारा अपने पाप कर्मों से मुक्ति पाने के लिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 



रविवार, 14 मार्च 2021

गर्भ रक्षा के लिए उपयोगी वासुदेव सूत्र

 गर्भवती महिला और उसके गर्भ में पल रहे शिशु की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण के चित्र या मूर्ति के समक्ष बैठकर शुद्ध घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर श्रीमद्भभागवत के छठवें स्कंध के आठवें अध्याय में दिए गए 'श्री नारायणवर्म' का पाठ पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रतिदिन करना चाहिए। साथ ही गर्भवती के कमरे में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का चित्र भी लगा देना चाहिए। 

     समय की कमी या किसी अन्य कारण से अगर यह पाठ करना संभव न हो तो सात्विक मनोवृत्ति के साथ भगवान श्रीकृष्ण के नाम व मंत्र का जप करते रहना चाहिए। गर्भवती महिलाओं के कष्टों का शमन करने के लिए 'श्री वासुदेव-सूत्र' सबसे आसान और प्रभावी वैष्णव कवच है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

शनिवार, 13 मार्च 2021

पाप कर्मों के भोग काल में करें ये कार्य

 गीता में कहा गया है कि मनुष्य को उसके द्वारा किए गए कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ता है। अच्छे कर्मों का फल अच्छा होता है तो वहीं बुरे व पाप कर्मों का फल बुरा होता है। किए गए कर्मों का फल भोगने से कोई बच नहीं सकता। माना जाता है कि मनुष्य द्वारा जो पाप कर्म जानबूझकर उद्देश्य के साथ किए जाते हैं, वे किसी भी तरीके से समाप्त नहीं किए जा सकते। ऐसे कर्मों का फल तो देर-सबेर भोगना ही पड़ता है। 

   जबकि असावधानीपूर्वक और बिना उद्देश्य के हुए पाप कर्म ईश्वर की आराधना एवं प्रायश्चित करने से समाप्त हो जाते हैं। पाप कर्मों का फल भोग काल जब आता है तो मनुष्य को दुख, संताप, रोग, धन की कमी, परिवार के सदस्यों से मनमुटाव, परिवार के सदस्य से बिछोह, अपमान, क्लेश आदि स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास के साथ अपने ईष्ट देवी देवता की पूजा, मंत्र जाप, दान, हवन, जड़ीबूटी स्नान, रत्न या जड़ी धारण करने से मानसिक शांति मिल जाती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल आगरा। 

व्यापारिक उन्नति के लिए भी हैं वास्तु नियम

 बहुत से व्यापारी पर्याप्त पूंजी की व्यवस्था करके उद्योग अथवा कारखाना लगा लेते हैं और जी तोड़ मेहनत करते हैं, परंतु कई बार अथक प्रयासों के बावजूद अपेक्षित लाभ मिलने के बजाय व्यापार में नुकसान होता रहता है या फिर समस्याएं आती रहती हैं। 

    अन्य कारणों के साथ-साथ उद्योग या कारखाने के निर्माण, मशीनरी, तैयार माल आदि की व्यवस्था में वास्तु नियमों की अनदेखी भी होने वाले नुक्सान या घाटे का एक कारण हो सकती है। कारखाना और उद्योग की प्रगति के लिए उपयोगी प्रमुख वास्तु नियम इस प्रकार हैं:

   @ कारखाना या उद्योग जिस भूखंड पर लगाया जाए, उसके चारों ओर बनी बाऊंड्रीवाल पश्चिम एवं दक्षिण की तुलना में पूर्व और उत्तर दिशा की तरफ नीची होनी आवश्यक है। वहीं भूखंड का ईशान कोण न तो कटा हुआ हो और न ही वहां किसी तरह का भारी सामान रखा गया हो। ईशान कोण में पानी की व्यवस्था करना उपयुक्त रहता है, परंतु ओवरहैड पानी की टंकी सदैव नैऋत्य कोण में ही रखना आवश्यक है।

    @ कारखाने का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व, उत्तर या ईशान कोण में ही रखना लाभकारी होता है। पूर्वी आग्नेय अथवा उत्तरी वायव्य कोण में कभी भी मुख्य प्रवेश द्वार नहीं रखना चाहिए।

    @ कारखाने की बाउंड्रीवाल से एक फुट से दूर हटकर आग्नेय या वायव्य कोण के भाग में शौचालय बनवाये जा सकते हैं। वहीं वाहनों के लिए पार्किंग की व्यवस्था फैक्ट्री की उत्तरी वायव्य या पूर्वी आग्नेय कोण की दिशा में की जा सकती है।

   @ कारखाने के दक्षिण भाग में भारी सामान एवं मशीनें, उत्तरी भाग में हलकी मशीनें, उत्तर में कच्चा एवं आधा बना माल और वायव्य कोण में पूरी तरह बना हुआ माल रखा जाना चाहिए।

     @ कारखाने में प्रशासनिक विभाग के लिए पूर्व या उत्तर दिशा को श्रेष्ठ माना गया है। अधिकारी एवं कर्मचारियों को भी उत्तर या पूर्व में ही चेहरा करके बैठना चाहिए। कारखाना स्वामी की कुर्सी आने वाले ग्राहकों की कुर्सी की तुलना में अधिक ऊंची होनी चाहिए।

    @ कारखाने में लगने वाले बॉयलर, ट्रांसफार्मर, चिमनी, जेनरेटर, बिजली या टेलीफोन का खंबा, बिजली का मीटर, गैस या बिजली से चलने वाली भट्टी आदि की व्यवस्था सदैव पूर्वी आग्नेय कोण में ही करनी चाहिए।

     @ कारखाने या उद्योग स्थल में दक्षिण और पश्चिम भाग में बड़े वृक्ष तथा पूर्व या उत्तर में घास का लॉन एवं छोटे आकार के पेड़ लगाए जाने चाहिए।

     @ कारखाने के ईशान कोण और मध्य भाग यानी ब्रम्ह स्थल को साफ़ सुथरा, खुला और हल्का रखा जाना आवश्यक है। इन दोनों ही स्थानों में कोई मशीन, कबाड़ा, फर्नीचर या दूसरा कोई भी सामान नहीं रखा जाना चाहिए।

     @ कारखाने के जिस भाग या कमरे में कारीगर काम करते हों, वहां इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनके सिर के ऊपर वाली छत पर कोई बीम न हो। अगर ऐसा है तो आभासी छत बनाकर बीम को ढकवा देना चाहिए अथवा उनके काम करने की जगह को बदल देना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।

सोमवार, 8 मार्च 2021

मन की भी होती है व्यथा

हमारे शरीर के अंदर बैठे हुए मन की माया भी निराली है। ये तो मन ही है जो एक जगह बैठे ही बैठे कुछ ही सेकेण्ड में पूरे ब्रम्हाण्ड की सैर कर आता है, जाने-अनजाने लोगों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़कर सैकड़ों काल्पनिक सपने बुनने लग जाता है। मन के अनुसार हो जाए तो खुश हो लेता है मन, और मन के विरुद्ध हो जाए तो उदासी व टूटन महसूस करने लगता है ये मन। 

  मन में क्या चल रहा है, ये तो वही जान सकता है जो मन का मालिक है। बाकी तो सब अनुमान ही लगा सकते हैं। मन खुश हो तो सब अच्छा लगता है और मन उदास हो तो सब अच्छा होते हुए भी खराब लगता है। मन की ये व्यथा है बड़ी अजीब। जिससे अपेक्षा करो, वही उपेक्षा दे जाता है।

   अपेक्षा और उपेक्षा की ये उठापटक जीवन भर हमारे साथ चलती रहती है, हमारे मन को अपने हिसाब से चलाती है। मन की इस व्यथा को किसी से कहा भी नहीं जा सकता क्योंकि सबका अपना मन होता है और सब अपने मन के अनुसार जीवन को जीना चाहते हैं। 

   इसलिए जीवन को जीने का एक ही मंत्र समझ में आता है करो मन की.....सुनो मन की.....कहो मन की....बस ये अपेक्षा मत रखो कि कोई दूसरा भी हमारे मन के अनुसार अपने मन को चला सके। अगर अभी भी मन को नहीं समझाया तो फिर ये कहना बेकार ही होगा कि मन उदास उदास हो रहा है।- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

चिकित्सा ज्योतिष और रंगों की महत्ता

जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में सात रंगों का समन्वय होता है, उसी तरह मनुष्य के शरीर में भी सात रंगों की किरणें निश्चित अनुपात में रहती हैं। सौर मंडल में मौजूद विभिन्न ग्रहों से उत्सर्जित होने वाली अंतरिक्ष की चुंबकीय अल्ट्राकॉस्मिक किरणों के प्रभाव से यदि किसी रंग की किरणों की सक्रियता असंतुलित हो जाती है तो शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते हैं।   

   प्राकृतिक चिकित्सा के अंतर्गत सौर मंडल में मौजूद ग्रहों से निकलने वाली किरणों के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए रोगों के उपचार पर बल दिया गया है। इसके लिए रोग की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग रंग की कांच की बोतलों में तीन चौथाई भाग तक जल भरकर व सूर्य की रौशनी में रखकर सूर्य-तापित जल तैयार कर रोगी को पिलाया जाता है। 

    शरीर में जिस ग्रह की कॉस्मिक रश्मियों की कमी हो, उस ग्रह से संबंधित रत्न की भस्म या जल के रूप में औषधि तैयार कर रोगी को दी जाती है। इसके अलावा रोगी की कुंडली के विश्लेषण के बाद उचित रत्न धारण कराने से भी रोग निवारण में मदद मिलती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

जनपद न्यायालय आगरा में 22 फरवरी को लगेगा वृहद विधिक साक्षरता सेवा शिविर

                        प्रमोद कुमार अग्रवाल   राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ क...