सोमवार, 15 मार्च 2021

विकार रहित होकर ही मिलता है परम सुख

 मन का असंतोष और अस्वस्थता-ये दो मनुष्य के ऐसे चित्त के ऐसे विकार हैं जो मनुष्य को दुःख एवं कष्ट के मार्ग पर ले जाते हैं। जिस मनुष्य को इस बात का बोध होने लगता है कि मन में संतोष और उत्तम स्वास्थ्य जीवन के लिए आवश्यक हैं, तो उसकी दिशा ही बदल जाती है। जिस प्रकार भूख और प्यास लगने पर हमें भोजन-पानी की ज़रुरत होती है और हम प्रयास करके अपनी क्षुधा बुझाते हैं, उसी तरह मन में किसी कारण से असंतोष पनपने तथा मन के अस्वस्थ होने पर हम इस स्थिति से उबरने का प्रयास करते हैं। 

हमें यह बात ज्ञात रहनी चाहिए कि किसी भी बात की अति कदापि अच्छी नहीं होती। अति करने से मन में तृप्ति के स्थान पर अतृप्ति होने से अस्वस्थता आने लगती है। इसी तरह दिन-प्रतिदिन की जरूरतों के पीछे दौड़ते रहने की मानसिकता मनुष्य का स्वभाव बन गया है जिसके कारण जीवन में असंतोष पनपने लगता है। 

आत्मा की तृप्ति तभी होती है जब हमारे मन में पूर्ण संतोष का भाव हो और स्वस्थ विचार श्रृंखला हो। मन में अपवित्र और कुविचारों की वजह से ही मनुष्य जीवन में आने वाले असीम सुख के क्षणों को जीने से वंचित रह जाता है। 

जीवन में जो अच्छा नजर आ रहा हो, वह हमेशा ही श्रेष्ठ हो, यह आवश्यक नहीं है। शर्करा मीठी होती है जो खाद्य एवं पेय पदार्थों में मिठास उत्पन्न करके उन्हें स्वादिष्ट बना देती है परन्तु एक निश्चित मात्रा से अधिक प्रयोग करने पर वही मीठी शर्करा शरीर में पहुँच कर जठराग्नि को विकारयुक्त बना देती है। कहने का अर्थ यह है कि हमारे जीवन में अचार-विचार, व्यवहार, खान-पान आदि में अति का होना सदैव कष्टदायी ही होता है। संतुलित जीवन सुखदायी होता है, जिससे जीवन में श्रेष्ठता आती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मन को समदर्शी और समस्त विकारों से रहित बनाकर मनुष्य अपने जीवन में परम सुख का अनुभव कर सकते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

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