हमारे प्राचीन वेद, पुराण आदि ग्रंथों में कल्प वृक्ष नाम के एक ऐसे विशालकाय वट का उल्लेख मिलता है, जिसकी प्राप्ति समुद्र मंथन के समय चौदह रत्नों के साथ हुई थी। इन रत्नों में से कल्प वृक्ष को इंद्र देवता को प्रदान किया गया था, जिन्होंने इस वृक्ष की स्थापना हिमालय की उत्तर दिशा में स्थित सुरकानन में कर दी।
कल्प वृक्ष को देवताओं के अद्भुत वृक्ष के रूप में मान्य किया गया है। नारद पुराण में वर्णित है कि कल्प वृक्ष पर साक्षात भगवान बालमुकुंद स्वयं विराजते हैं। माना जाता है कि कल्प वृक्ष के नीचे बैठकर पूर्ण श्रद्धा भाव से भगवान की पूजा अर्चना करने और वृक्ष के तने पर मौली बांधकर तीन या सात परिक्रमा लगाने से श्रदालुओं की सभी मनोकामनाएं तो पूरी होती ही हैं, बार-बार जन्म एवं मृत्यु के बंधन से भी मुक्ति मिल जाती है।
देवताओं को अत्यंत प्रिय कल्प वृक्ष को कई और भी नामों से जाना जाता है, जैसे-कल्प द्रुप, कल्प तरु, सुर तरु, देव तरु, कल्प लता आदि। पद्मपुराण के अनुसार पारिजात वृक्ष, ही कल्प वृक्ष है। वहीं नारद पुराण के अनुसार, कल्प वृक्ष को सत्य युग में वट, त्रेता युग में वटेश्वर, द्वापर युग में कृष्ण और कलियुग में पुराण पुरुष के नाम से भी जाना जाता है। इस्लामिक धार्मिक साहित्य में भी तूबा नाम के एक ऐसे वृक्ष का वर्णन किया गया है, जो स्वर्ग का उपवन कहलाता है।
बरगद के विशालकाय वृक्ष के समान ही कल्प वृक्ष का स्वरूप होता है। इस वृक्ष की ऊंचाई सत्तर फुट, वृक्ष के तने का व्यास पैंतीस फुट और तने का घेराव एक सौ पचास फुट तक होता है। कल्प वृक्ष पर भी अन्य वृक्षों की तरह पुष्प और फल लगते हैं। कल्प वृक्ष की औसत आयु दो हजार पांच सौ से तीन हजार साल तक की मानी गई है।
नारद पुराण में कहा गया है कि इस वृक्ष को कल्प वृक्ष इसलिए कहा गया है क्योंकि इसकी आयु एक कल्प है। एक कल्प चौदह मनवंतर का होता है और एक मनवंतर तीस करोड़ चौरासी लाख अड़तालीस हजार वर्षों का होता है। यही कारण है कि कल्प वृक्ष कल्पांत तक भी नष्ट नहीं होता। आज भी भारत के रांची, अल्मोड़ा, काशी, बाराबंकी, बस्ती आदि स्थानों पर और दक्षिण अफ्रीका व ऑस्ट्रेलिया में हजारों वर्ष पुराने कल्प वृक्ष मौजूद हैं।
अपने अंदर अपार सकारात्मक ऊर्जा का भंडार लिए हुए कल्प वृक्ष को कई योजन विस्तार वाला बताया गया है। नारद पुराण के अनुसार, कल्प वृक्ष, सत्य युग में एक योजन, त्रेता युग में पौन योजन, द्वापर युग में आधा योजन और कलियुग में एक चौथाई योजन विस्तार लिए हुए है। कई तरह के औषधीय गुणों से भरपूर कल्प वृक्ष को एक परोपकारी वृक्ष कहा जाए तो कुछ भी गलत नहीं होगा। कल्प वृक्ष के पत्ते, पुष्प, फल आदि का उपयोग दमा, मलेरिया, और एलर्जी जैसी बीमारियों के उपचार में किया जाता है।
माना जाता है कि जहां कल्प वृक्ष होता है, वहां सूखा नहीं पड़ता। नारद पुराण में कहा गया है कि कल्प वृक्ष की छाया में बैठ कर भगवान बालमुकुंद से प्रार्थना करने से ब्रह्म हत्या के अपराध से मुक्ति मिल जाती है। इसलिए कल्प वृक्ष को पवित्र और मनोवांछित फल देने वाला दिव्य वृक्ष माना गया है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।
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