सोमवार, 15 मार्च 2021

अपने धर्म का पालन करने वाला है सच्चा ईश्वर भक्त

 सर्व शक्तिमान ईश्वर की आराधना हम सब अपने-अपने ढंग से करते हैं और अपने आप को उनका सच्चा एवंपरम प्रिय भक्त कहलाना पसंद करते हैं। परन्तु सच्चे भक्त की क्या परिभाषा होती है, यह हम जानते तक नहीं हैं और जानना भी नहीं चाहते हैं। निहित स्वार्थ के लिए भगवान् से प्रार्थना करना, धार्मिक स्थलों की यात्रा करना, पवित्र नदियों में स्नान करना, वर्तमान और परलोक सुधारने के लिए गर्व के साथ दान-दक्षिणा देना सच्ची भक्ति नहीं है। 

    पुराणों में भगवान् ने स्वयं कहा है कि जो मनुष्य संसार के समस्त प्राणियों के हित के बारे में चिंतन करता है, जो दूसरों के दोष नहीं देखता, जो अपनी समस्त इन्द्रियों को अपने वश में रखता है और जिसके ह्रदय में किसी के भी प्रति किंचितमात्र भी ईर्ष्या भाव नहीं है, वही भगवान् का सच्चा भक्त है। 

    इसके साथ-साथ वह मनुष्य भी भगवान् की सच्ची भक्ति करने वाला माना गया है, जो कभी भी मन, वाणी और क्रिया द्वारा किसी को भी पीड़ा नहीं पहुंचाता, जिसमें कुछ भी संग्रह करने का स्वभाव नहीं है तथा जो निष्काम एवं शांत भाव से अपने कार्य भगवान् को समर्पित करता हुआ पूर्ण करता रहता है.

   श्रीमदभगवदगीता में भी भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए स्पष्ट कहा है कि निंदनीय कर्मों से अपने आप को च्युत करके सात्विक बुद्धि वाला प्रत्येक मनुष्य जो फल की अभिलाषा किये बिना अपने धर्म का पालन करता है, वह उन्हें बहुत प्रिय है क्योकि वह भी सच्चा भक्त है।--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

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