सृष्टि के संचालन के लिए घर-परिवार को आवश्यक बताया गया है। इसलिए जन्म कुंडली के बारह भावों को किसी न किसी संबंध से जोड़कर देखा जाता है। अन्य बातों के साथ-साथ पहले भाव से पितामह, दूसरे से पारिवारिक सुख, तीसरे से छोटे भाई-बहिन, चाचा, मामा का सुख,चौथे भाव से माता, श्वसुर, पांचवें से संतान, छठे से मामा, मौंसी, सातवें से पति और पत्नी, छोटे भाई-बहिन की संतान, आठवें से पिता के बड़े भाई, नवें से छोटी बहिन के पति, दसवें से पिता व सास, ग्यारहवें से बड़े भाई, दामाद, पुत्रवधु, दूसरी पत्नी और बारहवें भाव से शैयासुख आदि की जानकारी मिलती है। कुंडली के अलग-अलग भावों में स्थित राशि और ग्रहों से जातक के पूरे परिवार और उनके साथ संबंधों का आकलन किया जा सकता है।
कालसर्प दोष वाली कुंडली के जातकों के वैवाहिक जीवन में दुःख, विरोध, अपयश, विवाह में विलंब तथा जीवन साथी से बिछोह की संभावनाएं बनी रहती हैं। इन जातकों का पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण होने के साथ-साथ विवाह विच्छेद तक की नौबत आ सकती है। जिन जातकों की कुंडली में मंगल दोष होता है उनका विवाह देरी से होने और विवाह के बाद कई तरह की समस्याएं देखी जाती हैं। बृहस्पति संहिता के अनुसार गुरु व शुक्र के अस्त होने की स्थिति में विवाह संस्कार कराना निषिद्ध माना गया है अन्यथा वैवाहिक जीवन कष्टकर हो जाता है तथा किसी एक को अपने जीवन साथी से बिछुड़ना भी पड़ सकता है। जबकि पाराशर होराशास्त्र के अनुसार लग्नेश के लग्न में ही स्थित रहने पर जातक के या तो दो स्त्रियां होती हैं अथवा वह दूसरी स्त्रियों में आसक्त रहता है।
जन्म कुंडली के दूसरे भाव में बुध होने पर जातक पिता का भक्त होता है। सिंह राशि का बुध भाई का सुख नहीं देता तो तुला राशि का बुध वैवाहिक जीवन के सुख को कम कर देता है। मीन और धनु राशि में बुध होने पर जातक को सुंदर एवं सुशील पत्नी मिलती है। दूसरे भाव में गुरु जातक को अच्छी पत्नी दिलाता है वहीं ग्यारहवें भाव में गुरु जातक के एक से अधिक स्त्रियों से संबंध बनाता है।
कुंडली के दूसरे चौथे एवं सातवें भाव में राहु की उपस्थिति से स्त्री सुख में कमी आती है तो दसवें भाव का राहु जातक को पिता के सुख से वंचित कराता है। इसी प्रकार केतु के दूसरे, तीसरे, चौथे और सातवें भाव में होने पर जातक का विरोध परिवार के सदस्यों से बना रहता है तथा उसे पत्नी या पति से पीड़ा झेलनी पड़ती है। ---प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा
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