हमारे शरीर के अंदर बैठे हुए मन की माया भी निराली है। ये तो मन ही है जो एक जगह बैठे ही बैठे कुछ ही सेकेण्ड में पूरे ब्रम्हाण्ड की सैर कर आता है, जाने-अनजाने लोगों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़कर सैकड़ों काल्पनिक सपने बुनने लग जाता है। मन के अनुसार हो जाए तो खुश हो लेता है मन, और मन के विरुद्ध हो जाए तो उदासी व टूटन महसूस करने लगता है ये मन।
मन में क्या चल रहा है, ये तो वही जान सकता है जो मन का मालिक है। बाकी तो सब अनुमान ही लगा सकते हैं। मन खुश हो तो सब अच्छा लगता है और मन उदास हो तो सब अच्छा होते हुए भी खराब लगता है। मन की ये व्यथा है बड़ी अजीब। जिससे अपेक्षा करो, वही उपेक्षा दे जाता है।
अपेक्षा और उपेक्षा की ये उठापटक जीवन भर हमारे साथ चलती रहती है, हमारे मन को अपने हिसाब से चलाती है। मन की इस व्यथा को किसी से कहा भी नहीं जा सकता क्योंकि सबका अपना मन होता है और सब अपने मन के अनुसार जीवन को जीना चाहते हैं।
इसलिए जीवन को जीने का एक ही मंत्र समझ में आता है करो मन की.....सुनो मन की.....कहो मन की....बस ये अपेक्षा मत रखो कि कोई दूसरा भी हमारे मन के अनुसार अपने मन को चला सके। अगर अभी भी मन को नहीं समझाया तो फिर ये कहना बेकार ही होगा कि मन उदास उदास हो रहा है।- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।
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