वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी भवन, कक्ष तथा भूखण्ड में अदृश्य प्राणिक शक्ति की मौजूदगी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह अदृश्य प्राणिक शक्ति ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होने वाली ऊर्जा पर निर्भर करती है। सरल भाषा में इसे प्राण ऊर्जा या प्राणिक ऊर्जा भी कह सकते हैं।
किसी वास्तु में रहने वाले एवं कोई भी छोटा-बड़ा व्यवसाय या कारोबार करने वाले लोग इस प्राणिक शक्ति व ऊर्जा से प्रभावित होते हैं और उसी प्रभाव के अनुसार व्यवहार करते देखे जा सकते हैं। वास्तु में प्रवाहित सकारात्मक ऊर्जा लोगों को सक्रिय एवं सत्वगुण वाले प्रभाव देती है तो वहीं, वहां की नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से लोग निष्क्रिय और रजस व तामसिक गुण वाले हो जाते हैं।
वास्तु शास्त्र इस बात पर विशेष जोर देता है कि जो भी भवन, कक्ष या भूखण्ड हम उपयोग में लाएं तो सबसे पहले वहां की प्राणिक ऊर्जा के प्रभाव को अच्छी तरह जांच-परख लिया जाए। इस प्रभाव को परखने का बहुत आसान तरीका है कि वहां कुछ समय तक रहा जाए या व्यवसाय किया जाए। अगर रहने या व्यवसाय करने के दौरान सब कुछ अनुकूल नजर आए और किसी प्रकार की कोई समस्या सामने न आए, तो यह माना जा सकता है कि प्राणिक ऊर्जा सकारात्मक है।
जबकि इसके विपरीत फल मिलते दिखाई दें तो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राणिक ऊर्जा नकारात्मक होने से वहां रहना या व्यवसाय करना उपयुक्त नहीं होगा। ऐसा भी नहीं है कि प्राणिक ऊर्जा का प्रभाव तत्काल नजर आने लगे। इसके सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव को लंबी अवधि के बाद भी अनुभव किया जा सकता है।
प्राणिक ऊर्जा के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए वास्तु के तीन गुणों की व्याख्या की जा सकती है। ये तीन गुण हैं, सत्व गुण, रजस गुण और तमस गुण। वास्तु शास्त्र की दृष्टि से देखा जाए तो ये तीनों गुण वास्तु की अलग-अलग दिशाओं पर अपना प्रभाव रखते हैं। इसीलिए माना जाता है कि संपूर्ण वास्तु का सही ढंग से उपयोग व उपभोग करने के लिए दिशाओं के अनुसार ही निर्माण और सामान व्यवस्थित किया जाना उचित रहता है।
किसी भी वास्तु का ईशान कोण सत्व गुण का प्रभाव रखता है। यही कारण है कि ईशान कोण को हमेशा खुला, स्वच्छ और हल्का रखा जाता है। इस कोण में व इसके नजदीक पूर्व या उत्तर दिशा में पूजा स्थल, बच्चों के पढ़ने का कमरा व बैठक बना सकते हैं। यहां किसी तरह के भारी निर्माण करने व भारी सामान रखने की मनाही की गई है।
वास्तु के आग्नेय और वायव्य कोण पर रजस गुण का प्रभाव माना गया है। इसीलिए इन दोनों कोणों की जगह एवं इनके नजदीक का उपयोग मनोरंजन, खाना पकाने और भौतिक संसाधनों से जुड़ी गतिविधियों के लिए किया जा सकता है। वहीं वास्तु का नैरित्य कोण तमस गुण से प्रभावित माना गया है। चूंकि इस कोण में गहराई अधिक होने से सूर्य की ऊर्जा कम मिलती है इसलिए इस कोण एवं इसके नजदीक के क्षेत्र का उपयोग शयन कक्ष बनाने तथा भारी वस्तुओं को रखने में किया जा सकता है।
वास्तु का मध्य भाग केंद्र अथवा ब्रह्म स्थल कहलाता है। इस भाग पर भी सत्व गुण प्रभावी रहता है। इसीलिए वास्तु के इस भाग को भी स्वच्छ, हल्का और खुला रखने की सलाह दी जाती है। इस भाग में किसी तरह का कबाड़, फर्नीचर, टूटाफूटा या भारी सामान भूल कर भी नहीं रखा जाना चाहिए। ब्रह्म स्थल में तुलसी का पौधा लगाकर नियमित रूप से पूजा करते हुए जल चढ़ाना और दीपक जलाना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
वास्तु में प्राणिक शक्ति व ऊर्जा के अनुरूप निर्माण एवं व्यवस्था करने से वहां रहने और व्यवसाय करने वालों का जीवन सक्रिय, सुखी व संपन्न बनता है तथा वे वास्तु की सकारात्मक ऊर्जा का भरपूर लाभ उठाते हुए जीवन में उत्तरोत्तर प्रगति की ओर अग्रसर होते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।