शनिवार, 24 अप्रैल 2021

आयुर्वेद और चिकित्सा ज्योतिष

आयुर्वेद का मानना है कि मनुष्य के शरीर में होने वाले विभिन्न रोग वात, पित्त और कफ की मात्रा में असंतुलन होने के कारण उत्पन्न होते हैं। चिकित्सा ज्योतिष (मेडिकल एस्ट्रोलॉजी) के अनुसार हमारे सौर मंडल में मौजूद ग्रह भी त्रिदोष उत्पन्न करते हैं, जिससे शरीर में रोग होने लगते हैं। लग्न कुंडली के विश्लेषण से आसानी से रोग व रोग के कारणों का पता लगाया जा सकता है। 

    चिकित्सा ज्योतिष के अनुसार सूर्य ग्रह पित्त दोष, चंद्र ग्रह वात एवं कफ दोष, मंगल ग्रह पित्त दोष, बुध ग्रह वात, पित्त व कफ दोष, बृहस्पति ग्रह कफ दोष और शनि ग्रह वात दोष उत्पन्न करते हैं। त्रिदोषों के अनुसार ही मनुष्य में संबंधित रोग होते हैं। इसलिए रोग निदान एवं शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रशिक्षित डॉक्टर से इलाज कराने के साथ-साथ अनुभवी ज्योतिषविद् से भी संपर्क करके ज्योतिषीय उपाय करने चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

ग्रहों के प्रभाव से बनती है मनुष्य की प्रकृति

 श्री मद्भभागवतगीता में मनुष्य की तीन प्रकृतियों की चर्चा की गई है। ये प्रकृति हैं-सत्त्वगुणी प्रकृति, रजोगुणी प्रकृति और तमोगुणी प्रकृति। मनुष्य के अंदर ये तीनों प्रकृति ग्रहों की अपनी प्रकृति के प्रभाव से विकसित होती हैं। कहने का अर्थ यह है कि ग्रह अपनी प्रकृति के अनुसार मनुष्यों की प्रकृति को बनाते हैं। 

    नव ग्रहों में राहु और केतु को छाया ग्रह माना गया है। यही दो ग्रह ऐसे हैं, जिनकी अपनी कोई प्रकृति नहीं होती है। शेष सातों ग्रह की अपनी-अपनी प्रकृति होती है। सूर्य, चंद्र और बृहस्पति ग्रह सत्त्वगुणी प्रकृति के होते हैं।

    बुध और शुक्र ग्रहों की प्रकृति रजोगुणी होती है जबकि मंगल और शनि ग्रह तमोगुणी प्रकृति के माने गए हैं। मनुष्य के जन्म के समय जो ग्रह अधिक प्रभावी होते हैं, उनकी प्रकृति के अनुसार ही मनुष्य की प्रकृति हो जाती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

बडे़ काम का है तेज पत्ता

 दाल, सब्जी, कढ़ी आदि में तेज पत्तों का किचन में उपयोग होता है। दालचीनी, लौंग और इलायची की सुगंध वाले तेज पत्ते को तमाल पत्र भी कहते हैं। अपच, पेट के रोग, दस्त लगने, वात रोग, वमन होने, कब्ज, सर्दी, खांसी, जुकाम, श्वांस रोग, कफ, ह्रदय रोग आदि में तेज पत्तों का प्रयोग किया जाता है। 

    बुखार आने पर तेज पत्तों का काढ़ा लाभकारी माना गया है। कफ रोगों में तेज पत्ते के वृक्ष की छाल और पीपल का चूर्ण समान मात्रा में मिलाकर शहद के साथ चाटना चाहिए। तेज पत्तों को जलाकर उसकी बारीक राख से रोजाना दांत साफ करने तथा मसूड़ों की मालिश करने से दांत व मसूड़ों के रोग दूर होने लगते हैं। तेज पत्तों को जलाकर घर में इसका धुआं करने से घर कीटाणुमुक्त हो जाता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

रत्नों के ज्योतिषीय प्रभाव

 ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए अन्य उपायों के साथ साथ सही रत्न धारण करने की सलाह भी दी जाती है। रत्न कई प्रकार के होते हैं जैसे मोती, मूंगा, हीरा, माणिक्य, पन्ना, नीलम, पुखराज, गोमेद और लहसुनिया। इन रत्नों को योग्य एवं अनुभवी ज्योतिष की सलाह के बाद ही धारण करना चाहिए।

   रत्न के ज्योतिषीय प्रभाव को देखा जाए तो रत्न तीन तरह से काम करते हैं। अशुभ ग्रहों के असर से जातक को बचाते हैं, कमजोर ग्रहों को मजबूत बनाते हैं और जातक के जीवन में शुभ ग्रहों के भोग में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं। रत्नों के विकल्प के रूप में उप-रत्न भी धारण किए जा सकते हैं। कभी भी अपनी मर्जी से रत्न धारण नहीं करने चाहिए वरना ये नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। --प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

सही दिशा में लगाएं तस्वीर

 आवासीय या कार्यस्थल पर तस्वीर लगाने का चलन है। कौन सी तस्वीर किस दिशा में लगानी चाहिए, यह वास्तु शास्त्र से पता चलता है। परिवार के जीवित सदस्यों की तस्वीरें पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा में लगानी चाहिए। 

   पूर्वजों की तस्वीरों के लिए सही दिशा दक्षिण, पश्चिम या दक्षिण-पश्चिम है। जबकि प्रेरणा देने वाली तस्वीरें उत्तर-पश्चिम दिशा में लगाई जा सकती हैं। पूजा स्थल में कभी भी किसी परिवार के सदस्य, पूर्वज और आध्यात्मिक गुरु की तस्वीर नहीं लगानी चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

सफल तीर्थ यात्रा के लिए जरूरी है इंद्रियों पर नियंत्रण

धार्मिक स्थलों की तीर्थ यात्रा सभी प्रकार के भय, कष्ट और पापों का नाश करने वाली मानी गई है। कहते हैं कि शुद्ध चित्त भाव से तीर्थ यात्रा करने से समस्त पुण्य की प्राप्ति होती है। तीर्थ यात्रा करने वालों को चाहिए कि वे पूर्ण श्रद्धा भक्ति और संयम-नियम के साथ तीर्थ यात्रा करते हुए पवित्र नदियों में स्नान करें एवं भगवान के दर्शन करें। 

   ऐसे तीर्थ यात्री जिसने तीर्थ यात्रा के दौरान अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित नहीं किया है और मन-मस्तिष्क में कुटिलता भरी हुई है, कितने भी तीर्थ कर आएं, कितनी ही पवित्र नदियों में स्नान कर लें, कितना भी दान-पुण्य कर लें, तीर्थ यात्रा का कोई शुभ फल प्राप्त नहीं होता है।सफल तीर्थ यात्रा के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण आवश्यक है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

ध्यान और योग से परमात्म-चिंतन

 श्रीमद्भगवद्गीता में योग करने वाले योगियों के लिए भी उपदेश दिया गया है। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि योग करने वाले साधक को अपने मन और इंद्रियों को वश में करके समस्त इच्छाओं को त्याग कर किसी एकांत स्थल पर कुश, मृगछाला या मुलायम वस्त्र के आसन पर बैठकर और एकाग्र चित्त होकर परम पिता परमात्मा का ध्यान लगाना चाहिए। 

   ध्यान लगाने के लिए अपने शरीर और गर्दन को बिल्कुल सीधा रखते हुए नाक के अग्र भाग पर अपनी दृष्टि लगाने के बाद आंखों को धीरे से बंद कर लेना चाहिए। इसके बाद अपनी अंतरआत्मा से ध्यानमग्न होकर परमात्मा का चिंतन करना चाहिए। योग साधना करने वाले मनुष्य को अधिक मात्रा में भोजन करने या बिल्कुल भी भोजन न करने, अधिक सोने और अधिक जागने से परहेज करना चाहिए अन्यथा योग सिद्ध नहीं होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

वास्तु में सौर ऊर्जा की उपयोगिता

 वास्तु शास्त्र के मूल आधार के रूप में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्वों को मान्यता दी गई है। चूंकि ये पांचों तत्व प्रकृति से जुड़े होते हैं, इसलिए वास्तु के सिद्धांतों को प्रकृति के अनुरूप माना जा सकता है। किसी भवन के निर्माण में यदि इन पंचतत्व का ध्यान रखते हुए किचन, टॉयलेट, बेडरूम, स्टडी रूम, गैस्ट रूम, ड्राइंग रूम, सीढ़ियां, मंदिर आदि बनवाये जाएं तथा कमरों की आंतरिक साजसज्जा वास्तु के अनुसार रखी जाए तो ऐसे भवन में रहने वाले लोग सुखी व संपन्न जीवन व्यतीत कर सकते हैं। भवन में सकारात्मक ऊर्जा और प्रकाश के सतत प्रवाह के लिए सौर ऊर्जा का अपना महत्व है। जिन भवनों में सूर्य की पर्याप्त रौशनी और ऊर्जा आती है उनमें निवास करने वाले अपेक्षाकृत अधिक प्रसन्न और सुखी जीवन बिताते देखे गए हैं। 

   सौर मंडल में सूर्य को सबसे शक्तिशाली ग्रह माना गया है। ऊर्जा का दृश्य रूप सूर्य ही है।सूर्य समस्त ग्रहों का स्वामी है। सूर्य के बिना जीवन की कल्पना करना व्यर्थ है। सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा और रौशनी समस्त जैव और अजैव जगत को विकसित करने में मदद करती है। सूर्य की ऊर्जा में जीवन प्रदान करने वाली अद्भुत शक्ति होती है जिसका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव वास्तु पर भी पड़ता है। सूर्य की ऊर्जा के महत्व को समझते हुए ही वास्तुविदों द्वारा देश के विभिन्न राज्यों में ऐसे बहुत से निर्माण किए गए हैं जो आज भी लोगों को प्रभावित करते हैं। इनके निर्माण में इस बात का ध्यान रखा गया है कि वहां प्रातःकालीन सूर्य की रौशनी व ऊर्जा का प्रवाह अवश्य हो। 

    देखने में तो सूर्य की रौशनी हमें श्वेत रंग की दिखाई देती है, लेकिन वास्तव में सूर्य की किरणों में सात रंग बैंगनी, नीला, श्याम, नारंगी, हरा, लाल और पीला, होते हैं। ये सभी रंग हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। सुबह के समय सूर्य की रौशनी में बैठे रहना स्वास्थ्य के लिए विशेष लाभकारी माना गया है। वहीं दोपहर को सूर्य की तेज रौशनी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में भी सूर्य की रौशनी और ऊर्जा का प्रयोग करते हुए कई बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। सूर्य की यही ऊर्जा किसी भी भवन के अंदर सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है जिससे भवन का लाभ वहां रहने वालों को मिलता है। 

   यह निर्विवाद सत्य है कि सूर्य की ऊर्जा परमात्म स्वरूप है जो स्वस्थ जीवन और कार्यक्षमता में वृद्धि के लिए परम आवश्यक है। इसलिए वास्तु शास्त्र में सूर्य के उदय होने से लेकर अस्त होने तक उसकी ऊर्जा के सकारात्मक और नकारात्मक असर को ध्यान में रखते हुए ही निर्माण को प्रमुखता दी गई है। वास्तु नियमों के अनुसार भवन की उत्तर, पूर्व और उत्तर-पूर्व दिशा को खुला और स्वच्छ रखना आवश्यक है। इसके पीछे मूल कारण सूर्य के प्रकाश का पूर्व दिशा से घर में प्रवेश कराया जाना है। इसी तरह उत्तर पूर्व दिशा में बोरिंग और भूमिगत पानी की टंकी के जरिए घर में पानी की सप्लाई देना भी वास्तु नियमों में श्रेष्ठ माना गया है। ऐसा इसलिए अनिवार्य किया गया है ताकि सूर्य की प्रातःकालीन किरणें पानी पर पड़ने से पानी में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और कीटाणुओं को नष्ट करके पानी को शुद्ध करने में मदद कर सकें। वहीं दूसरी ओर भवन की दक्षिण और पश्चिम दिशा की तरफ की दीवारों को ऊंचा रखने एवं कम से कम खुली जगह रखने का नियम वास्तु शास्त्र में मिलता है। ऐसा करने का वैज्ञानिक कारण है। चूंकि दोपहर और शाम के समय सूर्य की धूप में हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणें होती हैं, इसलिए दक्षिण और पश्चिम दिशा में अधिक ऊंचाई होने से घर इनके हानिकारक प्रभाव से सुरक्षित बना रहता है। किसी भी वास्तु के मध्य भाग को ब्रह्म स्थान कहा जाता है। इसलिए इसे भी वास्तु में महत्वपूर्ण मानते हुए खुला और स्वच्छ रखने की बात कही गई है। ब्रह्म स्थान के खुला रहने से सूर्य की भरपूर रौशनी घर में आती है जो दरवाजे और खिड़कियों के माध्यम से घर के अंदर सकारात्मक ऊर्जा को प्रवाहित करती है और नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर देती है। इसलिए भवन का निर्माण कराते समय सूर्य की ऊर्जा एवं किरणों के प्रभाव महत्व को भी अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

भारतीय दर्शन में पंचमहाभूत

 भारतीय दर्शन में पांच प्राकृतिक तत्वों का उल्लेख मिलता है। ये पांच तत्व हैं आकाश, पृथ्वी, वायु, जल और अग्नि। इन्ही पांच तत्वों को पंचमहाभूत कहा गया है। देखा जाए तो इन सभी तत्वों का अपना अलग अलग अस्तित्व होता है, परंतु जब ये तत्व एकत्र होते हैं तो सामूहिक ऊर्जा का संचय होने लगता है जो सभी के लिए लाभप्रद होता है। 

   वास्तु की दृष्टि से पंचमहाभूत सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह के लिए अनिवार्य माने गए हैं। जिस वास्तु में इन पांच तत्वों का संतुलन होता है, वहां नकारात्मक ऊर्जा नही रहती। जिससे उस वास्तु में निवास या व्यवसाय करने वालों के सामने किसी तरह की कोई समस्या नहीं आती। वहीं इन तत्वों के असंतुलन से वास्तु दोष उत्पन्न हो जाते हैं। 

   दर्शन शास्त्र की मान्यता है कि मनुष्य का शरीर भी इन्ही पंच तत्वों से बना होता है। ये पांच तत्व मनुष्य को सुनने, स्पर्श करने, देखने, सूंघने और स्वाद लेने की अनुभूति कराते हैं। इन पांच तत्वों में से किसी भी तत्व के असंतुलन से शरीर के रोगग्रस्त होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि पंचमहाभूत के महत्व को समझते हुए इनके संतुलन के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

फेंगशुई में रंगों की उपयोगिता

 आदि काल से ही रंगों का प्रयोग होता रहा है। रंगों में छिपी अदृश्य शक्ति मनुष्य के जीवन को कई तरह से प्रभावित करती है। यूं तो सभी रंग सुंदर और महत्वपूर्ण होते हैं, फिर भी कोई रंग ऐसा होता है जो मनुष्य को विशेष रूप से पसंद आता है। रंग मनुष्य के दिलोदिमाग से जुड़कर अपना प्रभाव दिखाते हैं। फेंगशुई के अनुसार रंगों की दो श्रेणियां यिन और येंग हैं। येंग श्रेणी में नीला, काला, पर्पल, सफेद, पीला, औरेंज और लाल रंग आते है।

    फेंगशुई के अनुसार नीला रंग शांति, ज्ञान, बुद्धि एवं विश्वास का प्रतीक है। काला रंग धन व आय का, पर्पल रंग आध्यात्मिक ज्ञान और शारीरिक व मानसिक ऊर्जा का, सफेद रंग पवित्रता व विश्वास का, पीला रंग प्रसन्नता का, औरेंज रंग एकाग्रता व शक्ति का और लाल रंग नेतृत्व व सम्मान का प्रतीक है। जो मनुष्य जिस रंग को पसंद करता है, उसमें उसी रंग का प्रभाव देखने में आता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

अमृत सिद्ध योग में करें शुभ कार्य

 ज्योतिष में अनेक शुभ-अशुभ योगों का वर्णन किया गया है। आज हम बात कर रहे हैं अमृत सिद्ध योग की, जो सप्ताह के सात अलग-अलग दिनों में नक्षत्र विशेष का संयोग होने पर बनता है। माना जाता है कि अमृत सिद्ध योग में जो भी कार्य किया जाता है, वह सिद्ध हो जाता है। रविवार को हस्त नक्षत्र होने पर अमृत योग होता है।

   इसी तरह सोमवार को मृगशिरा नक्षत्र होने पर, मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र होने पर, बुधवार को अनुराधा नक्षत्र होने पर, बृहस्पतिवार को हस्त नक्षत्र होने पर, शुक्रवार को रेवती नक्षत्र होने पर और शनिवार को रोहिणी नक्षत्र होने पर अमृत सिद्ध योग बनता है।-प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

सदाचरण की जरूरत

 ज्योतिष एवं आयुर्वेद में पवित्र भाव और सदाचरण को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। चरक संहिता में कहा गया है कि जो मनुष्य देवता, ऋषि, गंधर्व, पितृग्रहों आदि का अपमान करता है और अनुचित रूप से नियम, व्रत, पूजा-पाठ आदि कर्म करता है तो वह जीवन में बहुत तरह के कष्ट व उन्माद से पीड़ित रहता है। 

  आयुर्वेद के ग्रंथों में यह बताया गया है कि सम्यक रूप से सदाचार का पालन करने, धर्म का आचरण करने और प्राकृतिक नियमों के अनुरूप जीवनचर्या को व्यवस्थित करने से ग्रहों के अशुभ प्रभाव निष्फल हो जाते हैं और मनुष्य स्वस्थ, सुखी व प्रसन्न बना रहता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

वास्तु में प्राणिक ऊर्जा

 वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी भवन, कक्ष तथा भूखण्ड में अदृश्य प्राणिक शक्ति की मौजूदगी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह अदृश्य प्राणिक शक्ति ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होने वाली ऊर्जा पर निर्भर करती है। सरल भाषा में इसे प्राण ऊर्जा या प्राणिक ऊर्जा भी कह सकते हैं। 

   किसी वास्तु में रहने वाले एवं कोई भी छोटा-बड़ा व्यवसाय या कारोबार करने वाले लोग इस प्राणिक शक्ति व ऊर्जा से प्रभावित होते हैं और उसी प्रभाव के अनुसार व्यवहार करते देखे जा सकते हैं। वास्तु में प्रवाहित सकारात्मक ऊर्जा लोगों को सक्रिय एवं सत्वगुण वाले प्रभाव देती है तो वहीं, वहां की नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से लोग निष्क्रिय और रजस व तामसिक गुण वाले हो जाते हैं।     

   वास्तु शास्त्र इस बात पर विशेष जोर देता है कि जो भी भवन, कक्ष या भूखण्ड हम उपयोग में लाएं तो सबसे पहले वहां की प्राणिक ऊर्जा के प्रभाव को अच्छी तरह जांच-परख लिया जाए। इस प्रभाव को परखने का बहुत आसान तरीका है कि वहां कुछ समय तक रहा जाए या व्यवसाय किया जाए। अगर रहने या व्यवसाय करने के दौरान सब कुछ अनुकूल नजर आए और किसी प्रकार की कोई समस्या सामने न आए, तो यह माना जा सकता है कि प्राणिक ऊर्जा सकारात्मक है। 

    जबकि इसके विपरीत फल मिलते दिखाई दें तो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राणिक ऊर्जा नकारात्मक होने से वहां रहना या व्यवसाय करना उपयुक्त नहीं होगा। ऐसा भी नहीं है कि प्राणिक ऊर्जा का प्रभाव तत्काल नजर आने लगे। इसके सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव को लंबी अवधि के बाद भी अनुभव किया जा सकता है। 

   प्राणिक ऊर्जा के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए वास्तु के तीन गुणों की व्याख्या की जा सकती है। ये तीन गुण हैं, सत्व गुण, रजस गुण और तमस गुण। वास्तु शास्त्र की दृष्टि से देखा जाए तो ये तीनों गुण वास्तु की अलग-अलग दिशाओं पर अपना प्रभाव रखते हैं। इसीलिए माना जाता है कि संपूर्ण वास्तु का सही ढंग से उपयोग व उपभोग करने के लिए दिशाओं के अनुसार ही निर्माण और सामान व्यवस्थित किया जाना उचित रहता है। 

   किसी भी वास्तु का ईशान कोण सत्व गुण का प्रभाव रखता है। यही कारण है कि ईशान कोण को हमेशा खुला, स्वच्छ और हल्का रखा जाता है। इस कोण में व इसके नजदीक पूर्व या उत्तर दिशा में पूजा स्थल, बच्चों के पढ़ने का कमरा व बैठक बना सकते हैं। यहां किसी तरह के भारी निर्माण करने व भारी सामान रखने की मनाही की गई है। 

   वास्तु के आग्नेय और वायव्य कोण पर रजस गुण का प्रभाव माना गया है। इसीलिए इन दोनों कोणों की जगह एवं इनके नजदीक का उपयोग मनोरंजन, खाना पकाने और भौतिक संसाधनों से जुड़ी गतिविधियों के लिए किया जा सकता है। वहीं वास्तु का नैरित्य कोण तमस गुण से प्रभावित माना गया है। चूंकि इस कोण में गहराई अधिक होने से सूर्य की ऊर्जा कम मिलती है इसलिए इस कोण एवं इसके नजदीक के क्षेत्र का उपयोग शयन कक्ष बनाने तथा भारी वस्तुओं को रखने में किया जा सकता है। 

   वास्तु का मध्य भाग केंद्र अथवा ब्रह्म स्थल कहलाता है। इस भाग पर भी सत्व गुण प्रभावी रहता है। इसीलिए वास्तु के इस भाग को भी स्वच्छ, हल्का और खुला रखने की सलाह दी जाती है। इस भाग में किसी तरह का कबाड़, फर्नीचर, टूटाफूटा या भारी सामान भूल कर भी नहीं रखा जाना चाहिए। ब्रह्म स्थल में तुलसी का पौधा लगाकर नियमित रूप से पूजा करते हुए जल चढ़ाना और दीपक जलाना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

    वास्तु में प्राणिक शक्ति व ऊर्जा के अनुरूप निर्माण एवं व्यवस्था करने से वहां रहने और व्यवसाय करने वालों का जीवन सक्रिय, सुखी व संपन्न बनता है तथा वे वास्तु की सकारात्मक ऊर्जा का भरपूर लाभ उठाते हुए जीवन में उत्तरोत्तर प्रगति की ओर अग्रसर होते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

सेहत के लिए योग और प्राणायाम

 मनुष्य के शरीर के विभिन्न अंगों के सुचारू रूप से काम करने के लिए ऑक्सीजन की समुचित मात्रा का होना आवश्यक है। सामान्य अवस्था में मनुष्य के सांस लेने और छोड़ने की जो गति होती है, उससे शरीर को केवल जरूरत की ऑक्सीजन ही मिल पाती है। जबकि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अधिक ऑक्सीजन का शरीर में पहुंचना अनिवार्य माना जाता है। शरीर में ऑक्सीजन की भरपूर आपूर्ति होने से सभी अंग अच्छे ढंग से काम करते हैं और आसानी से रोगग्रस्त नहीं होते। 

   नियमित रूप से योग और प्राणायाम करते रहने से शरीर में ज्यादा ऑक्सीजन पहुंचती है जिससे शरीर के सभी अंग रोगमुक्त बने रहते हैं, यह बात चिकित्सा वैज्ञानिकों और योगाचार्यों द्वारा प्रमाणित की जा चुकी है। योग और प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से शरीर में ऑक्सीजन की संतुलित आपूर्ति होती है और कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। 

   शरीर में ऑक्सीजन की ज्यादा आपूर्ति के लिए जिन प्राणायामों को मुख्य रूप से नियमित करने की संस्तुति की गई है, वे हैं: भस्त्रिका प्राणायाम, कपालभाति प्राणायाम, अनुलोम-विलोम, भ्रामक प्राणायाम और नाड़ी शोधन प्राणायाम। इन प्राणायामों को विधिपूर्वक और योग्य एवं अनुभवी योगाचार्य के निर्देशन में ही करना चाहिए क्योंकि कुछ दशाओं में इन प्राणायामों को करने की मनाही है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 


रविवार, 4 अप्रैल 2021

कल्याणकारी हैं श्री राम भक्त हनुमान

 श्री राम भक्त हनुमान एक ऐसे साक्षात एवं जागृत देव हैं, जिनकी उपासना में पवित्रता और पूर्ण भक्ति भाव बनाए रखना आवश्यक माना गया है, क्योंकि ब्रह्मचर्य का पालन करने के कारण उनका संपूर्ण जीवन पवित्र रहा है। हनुमान जी की उपासना से सुख, शांति, आरोग्य एवं अन्य लाभों की प्राप्ति होती है तथा लिया गया कर्जा भी जल्दी ही चुक जाता है। 

    शनिदेव के प्रकोप से बचने के लिए हनुमान जी की उपासना को ही सर्वोत्तम माना गया है। जिस भवन में हनुमान जी का चित्र या प्रतिमा होती है, वहां भूत-प्रेत, पिशाच और बुरी आत्माएं कभी अनिष्ट नहीं कर सकती। मंगल, शनि एवं पितृ दोषों से मुक्ति के लिए हनुमान जी की उपासना करनी चाहिए।

   हनुमान जी के विविध मुद्राओं में चित्र देखने को मिलते हैं, जैसे पर्वत उठाए हुए, लंका दहन करते हुए, श्री राम और लक्ष्मण को अपने कंधे पर लेकर उड़ते हुए, श्री राम दरबार में भक्त के रूप में बैठे हुए, सूर्य को ग्रास बनाते हुए, सुरसा के मुख से बाहर आते हुए, गदा को कंधे पर रखे एक घुटने पर बैठे हुए, लेटे हुए और प्रभु श्री राम के गले लगते हुए आदि स्वरुप हनुमान जी के हैं। इन सभी स्वरूपों का अपना-अपना महत्व है। 

भवन की दक्षिण दिशा में लाल रंग के बैठी हुई मुद्रा में लगाया गया हनुमान जी का चित्र सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इससे दक्षिण दिशा से आने वाली नकारात्मक ऊर्जा और बुरी ताकतें दूर होने लगती हैं तथा घर में सुख, समृद्धि एवं शांति का प्रादुर्भाव होने लगता है। भूत-प्रेत और बुरी आत्माओं से बचाव के लिए भवन के मुख्य द्वार पर पंचमुखी हनुमान जी का चित्र लगाया जा सकता है।

   वास्तु शास्त्र की मान्यता है कि पंचमुखी हनुमान जी का चित्र या प्रतिमा भवन में वास्तु दोषों का निवारण तो करती ही है, वहां रहने वालों के जीवन में उन्नति के अवसर भी लाती है। यदि परिवार के सदस्यों में साहस और आत्मविश्वास की कमी हो तो अपने एक हाथ में पर्वत उठाये हुए हनुमान जी का चित्र घर में लगाना चाहिए। जीवन में उत्साह, साहस और सफलता पाने के लिए घर में उड़ते हुए हनुमान जी चित्र लगाया जा सकता है।

   भवन के ड्राइंग रूम में श्री राम दरबार में नमस्कार की मुद्रा में बैठे हुए हनुमान जी का चित्र परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम, विश्वास, स्नेह और एकता को बढ़ाने में सहायक होता है। परिवार के सदस्यों में धार्मिक भावना बनाये रखने के लिए श्री राम की आराधना करते हुए अथवा भजन करते हुए हनुमान जी का चित्र लगाना शुभ होता है। इस चित्र को घर में लगाने से परिवार के सदस्यों में आपसी विश्वास भी मजबूत होता है।

   चूंकि हनुमान जी बालब्रह्मचारी हैं, इसलिए भूलकर भी हनुमान जी के चित्र या प्रतिमा को शयन कक्ष में नहीं लगना चाहिए। सीढ़ियों के नीचे, रसोई घर अथवा किसी अपवित्र स्थान पर भी हनुमान जी का चित्र नहीं लगाना चाहिए अन्यथा अशुभ परिणाम मिलते हैं। घर में अदृश्य वास्तु दोषों के निवारण के लिए दक्षिण दिशा में त्रिकोणाकार मंगल यंत्र स्थापित करके नियम से प्रतिदिन ग्यारह माला " ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः" मंत्र का जप करने से लाभ मिलता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा   

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

शंख बजाएं, सेहत पाएं

 किसी भी धार्मिक आयोजन, कथा, पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन आदि के समय शंख बजाने को अत्यंत शुभ माना जाता है। शंख से निकलने वाली ध्वनि से वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा और हानिकारक जीवाणु एवं विषाणुओं का नाश हो जाता है, जिससे स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है।

   माना जाता है कि समुद्र मंथन के समय निकलने वाले चौदह रत्नों में से एक रत्न शंख भी था। धार्मिक तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से शंख बहु उपयोगी है। शंख बजाने से कुंभक, रेचक तथा प्राणायाम क्रियाएं एक साथ होती हैं, इसलिए स्वास्थ्य भी सही बना रहता है। वहीं कैल्सियम कार्बोनेट से निर्मित होने के कारण यदि शंख में रात भर गंगा जल भरकर प्रातः सेवन किया जाए तो शरीर में कैल्सियम तत्व की कमी नहीं होने पाती है और छोटी-मोटी बीमारियों से बचाव।

   आयुर्वेद के मतानुसार शंख की भस्म के औषधीय प्रयोग से हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, अस्थमा, मंदाग्नि, मस्तिष्क और स्नायु तंत्र से जुड़े रोगों में आशातीत लाभ मिलता है। लयबद्ध ढंग से शंख बजाने से फेफड़ों को मजबूती मिलती है तथा शरीर में शुद्ध आक्सीजन का प्रवाह होने से रक्त भी शुद्ध होता है।

   कहा जाता है कि दक्षिणवर्ती शंख धन की देवी महालक्ष्मी जी का स्वरुप है। इसलिए धन लाभ और सुख-समृद्धि के लिए घर में उत्तर-पूर्व दिशा में अथवा घर के पूजा घर में रखना चाहिए और प्रतिदिन उस शंख की धूप दीप दिखाकर पूजा करनी चाहिए। पितृ दोष के असर से बचने के लिए दक्षिणवर्ती शंख में पानी भरकर अमावस्या और शनिवार के दिन दक्षिण दिशा में मुख करते हुए तर्पण करने से पितृ प्रसन्न होकर शुभ आशीर्वाद देते हैं जिससे गृह कलह, कार्यों में बाधा, संतान हीनता और धन की कमी जैसी समस्याओं में कमी आने लगती है।

   नवग्रहों की शांति एवं प्रसन्नता के लिए भी शंख उपयोगी रत्न माना गया है। सूर्य ग्रह की प्रसन्नता के लिए सूर्योदय के समय शंख से सूर्यदेव पर जल अर्पित करना चाहिए। चंद्र ग्रह के अशुभ प्रभाव को दूर करने लिए शंख में गाय का कच्चा दूध भरकर सोमवार को भगवान् शिव पर चढ़ाना चाहिए। मंगल ग्रह को अपने अनुकूल बनाने के लिए मंगलवार के दिन सुंदरकांड का पाठ करते हुए शंख बजाना आसान और श्रेष्ठ उपाय है।

    बुध ग्रह की प्रसन्नता के लिए शंख में जल और तुलसी दल लेकर शालिग्राम पर अर्पित करना चाहिए, वहीं गुरु गृह को प्रसन्न करने के लिए गुरूवार को दक्षिणवर्ती शंख पर केसर का तिलक लगाकर पूजा करने से भगवान् विष्णु की कृपा मिलती है। शुक्र ग्रह के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए शंख को श्वेत वस्त्र में लपेट कर पूजा घर में रखना चाहिए। धन -धान्य एवं आर्थिक समृद्धि पाने के लिए शंख में चावल भरकर लाल रंग के वस्त्र में लपेट कर उत्तर दिशा की ओर खुलने वाली तिजोरी अथवा धन रखने वाली आलमारी में रखना चाहिए। - प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा 

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

सुखी जीवन के लिए शुभ कर्म

 मनुष्य के जीवन में कर्म की प्रधानता को महत्व दिया गया है, परंतु परम सत्य यह भी है कि प्रत्येक मनुष्य का अपना भाग्य भी जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करता है। यदि मनुष्य के कर्म अच्छे हों, रहने, व्यवसाय एवं व्यापार करने वाली जगह वास्तु के अनुरूप बनी हुई हो तथा अपने इष्ट देव पर अटूट विश्वास हो तो कुंडली में बैठे ग्रह और भाग्य की प्रतिकूलता का बहुत ज्यादा अशुभ असर मनुष्य पर नहीं पड़ता है और जीवन यात्रा आसानी से चलती रहती है।

  कुंडली में बैठे ग्रहों की स्थिति के सटीक विश्लेषण से इतना तो अनुमान लगाया ही जा सकता है कि मनुष्य को जीवन में किस प्रकार की सुख-सुविधाएं हासिल होंगी और कौन सी शारीरिक,मानसिक व आर्थिक परेशानियों का सामना उसे करना होगा।  

  वहीं घर, व्यवसाय या व्यापार स्थल के वास्तु निरीक्षण से वहां के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव के कारणों की जानकारी आसानी से जानी जा सकती है। तब उसी के अनुसार धैर्य, विश्वास व बताए गए उपायों के साथ शुभ कर्म करते रहने से विभिन्न समस्याओं व बाधाओं पर विजय प्राप्त करके सुखी, संपन्न और स्वस्थ जीवन का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है। --प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।

गौसेवा से होता है ग्रह दोषों का निवारण

 प्राचीन काल से ही यह मान्यता रही है कि गौ माता में तैंतीस करोड़ देवताओं का वास होता है। भगवान श्री कृष्ण ने गौ पालक बनकर विश्व को गौ सेवा एवं रक्षा का संदेश दिया। पूजा कर्म के लिए गौ पूजन का अपना महत्व है। वर या कन्या के विवाह के लिए गोधूलि का समय सर्वोत्तम माना जाता है। भोजन से पूर्व गाय के लिए रोटी अथवा गौ ग्रास निकालने की आज भी परंपरा चली आ रही है। 

   महर्षि पाराशर के अनुसार जिस घर में गौ सेवा होती है, वहां समस्त प्रकार के सुख अपने आप ही आने लगते हैं। गौ माता का दर्शन और स्पर्श शुभ माना गया है। शकुन शास्त्र के अनुसार जिस घर के दरवाजे के सामने गाय झुंड बनाकर बैठी रहती हैं, उस घर के लोगों का भाग्य बदलने से वहां धन-धान्य, संतान, विद्या, आरोग्य सुख आदि की वृद्धि होने लगती है। वहीं ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गाय के पूजन एवं दान से ग्रह दोषों का निवारण होता है।

दूर होते हैं वास्तु दोष  
किसी भी घर के वास्तु दोषों को दूर करने के लिए गाय को घर में पालना, गाय के गोबर से घर को लीपना अथवा गाय के गोबर से बने कंडे को जलाकर उसपर शुद्ध घी और हवन सामिग्री डालकर निकलने वाले धुएं से पूरे घर को शुद्ध करना उपयुक्त होता है। भवन निर्माण से पूर्व अगर बछड़े वाली गाय को भूखंड पर बांध दिया जाय तो गाय के मुख से जमीन पर गिरने वाले झाग या फैन से वास्तु दोषों का निवारण होता है। किसी जरूरी कार्य से घर से बाहर निकलने पर अपने बछड़े को दूध पिलाती गाय का दर्शन होना शुभ होता है।
पितृ दोष होते हैं दूर
जन्म कुंडली में अगर राहू ग्रह की युति सूर्य, चंद्र, मंगल या शुक्र ग्रह के साथ हो अथवा शनि, राहू या केतु के साथ सूर्य ग्रह स्थित हो अथवा मंगल ग्रह की युति राहू या केतु से हो तो कुंडली में पितृ दोष होता है। इस कारण जातक को जीवन में संघर्षों का सामना करना पड़ता है। पितृ दोष को दूर करने के लिए प्रतिदिन अथवा प्रत्येक अमावस्या को गाय को रोटी, गुड व चारा खिलाना चाहिए।
नीच ग्रह होते हैं शांत 
जन्म कुंडली में सूर्य नीच का अर्थात तुला राशि में या अशुभ स्थिति में हो अथवा शुक्र ग्रह नीच का अर्थात कन्या राशि में या अशुभ स्थिति में हो तो श्वेत रंग की गाय का पूजन करके रोटी खिलाने से ग्रहों की अशुभता दूर होती है। इसके अलावा कुंडली में गुरु ग्रह के नीच का अर्थात मकर राशि में या अशुभ स्थिति में होने पर गाय की पीठ पर बने कूबड़ या ककुदू का दर्शन करके गाय को रोटी में गुड और चने की दाल रखकर खिलाने से गुरु ग्रह शुभ प्रभाव देने लगते हैं। 
कमजोर ग्रह होते हैं मजबूत
माना जाता है कि गाय के नेत्र में सूर्यदेव तथा नेत्रों की ज्योति में चंददेव का वास होता है। इसलिए कुंडली में अगर चंद्र और सूर्य ग्रह कमजोर स्थिति में होने के कारण कष्ट दे रहे हों तो गाय के नेत्रों का नियमित दर्शन करने से लाभ होता है। अगर किसी मनुष्य के हाथ में आयु रेखा टूटी हुयी, जंजीर नुमा या जाल युक्त हो तो गाय का पूजन करने के साथ-साथ गाय के घी का सेवन करना चाहिए। कमजोर बुध ग्रह को मजबूत बनाने के लिए बुधवार को हरा चारा, पालक, मेथी, बथुआ या हरी मूंग खिलाना श्रेष्ठ उपाय है। बच्चों को नजर लगने से बचाने के लिए गाय के गोबर को जलाकर उस भस्म को बच्चे के माथे, गले, छाती और पीठ पर लगाने से लाभ होता है। जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आ रही हो, उन्हें प्रत्येक गुरूवार को भगवान विष्णु का तथा प्रत्येक सोमवार को माता गौरी का पूजन करके अपने हाथ से गाय को हल्दी और चने की दाल मिश्रित आटे की एक लोई खिलानी चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।  

गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

अंत शरीर का होता है, आत्मा का नहीं

  इस संसार में जिसका जन्म हुआ है, समय आने पर उसकी मृत्यु भी सुनिश्चित है। जन्म और मृत्यु के इस सत्य को स्वीकार करने से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म भी निश्चित है। मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होता ही है। 

  भगवान श्रीकृष्ण द्वारा यह भी कहा गया है कि शरीर का ही अंत होता है। शरीर में बसने वाली आत्मा का कभी अंत नहीं होता। आत्मा तो मृत शरीर को त्याग कर दूसरे नए शरीर में चली जाती है। आत्मा को कभी नहीं देखा जा सकता। सिर्फ शरीर को ही देख सकते हैं। जब आत्मा अजर-अमर है तो फिर शोक क्यों किया जाए? अत: इस नाशवान शरीर के लिए शोक और दुख प्रकट करना समझदारी नहीं है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अन्न के सदुपयोग का संदेश देने वाला पर्व है बसौड़ा

रंगों के अद्भुत त्यौहार होली के बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला माता की आराधना की जाती है। इसलिए इस दिन को शीतलाष्टमी के रूप में जाना जाता है। आम बोलचाल की भाषा में इसे बासौड़ा भी कहा जाता है। देखा जाए तो बासौड़ा होली के बाद मौसम में आने वाले बदलाव के लिए तैयार होने का संदेश देेनेे वाला पर्व है। 

त्रितापों से मुक्ति का दिन 

स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एक सर्वमान्य नियम यह है कि जब भी मौसम में बदलाव हो, अपने खान-पान और रहन-सहन में भी उसी के अनुसार परिवर्तन कर लिया जाए अन्यथा बीमार होने के लिए तैयार रहें। होली तक मौसम में जो ठंडक एवं नमी बनी रहती थी, वो होली के बाद से ही उष्णता के रूप में हमारे शरीर पर असर डालने लगती है। ऐसे में हमें दैहिक, दैविक और भौतिक रूप से अपने को मजबूत एवं स्वस्थ बनाए रखने के लिए प्रयास आरंभ कर देना चाहिए। जो मनुष्य मौसम के इस बदलाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं, उनमें यदि इम्यूनिटी पावर कमजोर हो तो वे जल्दी बीमार हो जाते हैं। इसी इम्यूनिटी पावर को बढ़ाने के लिए इस दिन त्रितापों से मुक्ति दिलाने वाली शीतला माता की पूजा अर्चना की जाती है और बासी भोजन ग्रहण करके भविष्य में ताजा व गर्म भोजन करने का संकल्प लिया जाता है। 

अन्न के सदुपयोग का मिलता है संदेश 

शीतला माता को शक्ति की आराध्या जगतजननी देवी भगवती का स्वरूप माना जाता है। शीतला माता एक ऐसी आद्य शक्ति हैं जो प्रकृति तत्व और अन्न के महत्व के माध्यम से लोगों को ये संदेश देती हैं कि हमें प्रकृति से उत्पन्न होने वाले अन्न के एक-एक कण का सदुपयोग करना चाहिए। अन्नपूर्णा का सम्मान करने और जरूरतमंदों को अन्न का दान करने वालों को कभी भी मुसीबतों का सामना नही करना पड़ता है। चूंकि अन्न के उत्पादन में किसान और श्रमिकों की मेहनत लगी होती है, इसलिए शीतलाष्टमी इनकी मेहनत और भक्ति के समक्ष नतमस्तक होने का भी संदेश देती है। 

ऐसे करें शीतला माता का पूजन

शीतला माता की आराधना आद्य शक्ति के रूप में की जाती है। जिस प्रकार धन की देवी महालक्ष्मी जी की आराधना की जाती है, लगभग उसी तरह से शीतला माता की पूजा अर्चना का विधान है। अंतर सिर्फ इतना है कि शीतला माता को भोग के रूप में बासी भोजन अर्पित किया जाता है और बासी भोजन ही ग्रहण किया जाता है। शीतला माता की पूजा करते समय माता के थान पर जाकर हथेली से हल्दी के पांच थापे लगाकर हल्दी, गेंहू, मूंग की दाल, रोली, चावल आदि से शीतला माता की पूजा करनी चाहिए। एक दिन पहले यानि सप्तमी की रात को बनाकर रखी गई आटे की पूड़ी और गुड़ डाल कर पकाए गए चावल का भोग शीतला माता को लगाने के बाद होलिका दहन वाली जगह पर जाकर भी पूजा अर्चना करनी चाहिए। शीतला माता की पूजा के बाद छोटे बच्चों को शीतला के प्रकोप से बचाने के लिए उनके ऊपर मशक से पवित्र जल के छींटे लगवाने की भी परंपरा रही है। ऐसा करने से उनके शरीर में मौसम परिवर्तन से होने वाले दूषित प्रभावों से मुक्ति मिल जाती है और वे स्वस्थ बने रहते हैं। --प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

जनपद न्यायालय आगरा में 22 फरवरी को लगेगा वृहद विधिक साक्षरता सेवा शिविर

                        प्रमोद कुमार अग्रवाल   राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ क...