श्री मद्भभागवतगीता में मनुष्य की तीन प्रकृतियों की चर्चा की गई है। ये प्रकृति हैं-सत्त्वगुणी प्रकृति, रजोगुणी प्रकृति और तमोगुणी प्रकृति। मनुष्य के अंदर ये तीनों प्रकृति ग्रहों की अपनी प्रकृति के प्रभाव से विकसित होती हैं। कहने का अर्थ यह है कि ग्रह अपनी प्रकृति के अनुसार मनुष्यों की प्रकृति को बनाते हैं।
नव ग्रहों में राहु और केतु को छाया ग्रह माना गया है। यही दो ग्रह ऐसे हैं, जिनकी अपनी कोई प्रकृति नहीं होती है। शेष सातों ग्रह की अपनी-अपनी प्रकृति होती है। सूर्य, चंद्र और बृहस्पति ग्रह सत्त्वगुणी प्रकृति के होते हैं।
बुध और शुक्र ग्रहों की प्रकृति रजोगुणी होती है जबकि मंगल और शनि ग्रह तमोगुणी प्रकृति के माने गए हैं। मनुष्य के जन्म के समय जो ग्रह अधिक प्रभावी होते हैं, उनकी प्रकृति के अनुसार ही मनुष्य की प्रकृति हो जाती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।
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