वास्तु शास्त्र के मूल आधार के रूप में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्वों को मान्यता दी गई है। चूंकि ये पांचों तत्व प्रकृति से जुड़े होते हैं, इसलिए वास्तु के सिद्धांतों को प्रकृति के अनुरूप माना जा सकता है। किसी भवन के निर्माण में यदि इन पंचतत्व का ध्यान रखते हुए किचन, टॉयलेट, बेडरूम, स्टडी रूम, गैस्ट रूम, ड्राइंग रूम, सीढ़ियां, मंदिर आदि बनवाये जाएं तथा कमरों की आंतरिक साजसज्जा वास्तु के अनुसार रखी जाए तो ऐसे भवन में रहने वाले लोग सुखी व संपन्न जीवन व्यतीत कर सकते हैं। भवन में सकारात्मक ऊर्जा और प्रकाश के सतत प्रवाह के लिए सौर ऊर्जा का अपना महत्व है। जिन भवनों में सूर्य की पर्याप्त रौशनी और ऊर्जा आती है उनमें निवास करने वाले अपेक्षाकृत अधिक प्रसन्न और सुखी जीवन बिताते देखे गए हैं।
सौर मंडल में सूर्य को सबसे शक्तिशाली ग्रह माना गया है। ऊर्जा का दृश्य रूप सूर्य ही है।सूर्य समस्त ग्रहों का स्वामी है। सूर्य के बिना जीवन की कल्पना करना व्यर्थ है। सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा और रौशनी समस्त जैव और अजैव जगत को विकसित करने में मदद करती है। सूर्य की ऊर्जा में जीवन प्रदान करने वाली अद्भुत शक्ति होती है जिसका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव वास्तु पर भी पड़ता है। सूर्य की ऊर्जा के महत्व को समझते हुए ही वास्तुविदों द्वारा देश के विभिन्न राज्यों में ऐसे बहुत से निर्माण किए गए हैं जो आज भी लोगों को प्रभावित करते हैं। इनके निर्माण में इस बात का ध्यान रखा गया है कि वहां प्रातःकालीन सूर्य की रौशनी व ऊर्जा का प्रवाह अवश्य हो।
देखने में तो सूर्य की रौशनी हमें श्वेत रंग की दिखाई देती है, लेकिन वास्तव में सूर्य की किरणों में सात रंग बैंगनी, नीला, श्याम, नारंगी, हरा, लाल और पीला, होते हैं। ये सभी रंग हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। सुबह के समय सूर्य की रौशनी में बैठे रहना स्वास्थ्य के लिए विशेष लाभकारी माना गया है। वहीं दोपहर को सूर्य की तेज रौशनी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में भी सूर्य की रौशनी और ऊर्जा का प्रयोग करते हुए कई बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। सूर्य की यही ऊर्जा किसी भी भवन के अंदर सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है जिससे भवन का लाभ वहां रहने वालों को मिलता है।
यह निर्विवाद सत्य है कि सूर्य की ऊर्जा परमात्म स्वरूप है जो स्वस्थ जीवन और कार्यक्षमता में वृद्धि के लिए परम आवश्यक है। इसलिए वास्तु शास्त्र में सूर्य के उदय होने से लेकर अस्त होने तक उसकी ऊर्जा के सकारात्मक और नकारात्मक असर को ध्यान में रखते हुए ही निर्माण को प्रमुखता दी गई है। वास्तु नियमों के अनुसार भवन की उत्तर, पूर्व और उत्तर-पूर्व दिशा को खुला और स्वच्छ रखना आवश्यक है। इसके पीछे मूल कारण सूर्य के प्रकाश का पूर्व दिशा से घर में प्रवेश कराया जाना है। इसी तरह उत्तर पूर्व दिशा में बोरिंग और भूमिगत पानी की टंकी के जरिए घर में पानी की सप्लाई देना भी वास्तु नियमों में श्रेष्ठ माना गया है। ऐसा इसलिए अनिवार्य किया गया है ताकि सूर्य की प्रातःकालीन किरणें पानी पर पड़ने से पानी में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और कीटाणुओं को नष्ट करके पानी को शुद्ध करने में मदद कर सकें। वहीं दूसरी ओर भवन की दक्षिण और पश्चिम दिशा की तरफ की दीवारों को ऊंचा रखने एवं कम से कम खुली जगह रखने का नियम वास्तु शास्त्र में मिलता है। ऐसा करने का वैज्ञानिक कारण है। चूंकि दोपहर और शाम के समय सूर्य की धूप में हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणें होती हैं, इसलिए दक्षिण और पश्चिम दिशा में अधिक ऊंचाई होने से घर इनके हानिकारक प्रभाव से सुरक्षित बना रहता है। किसी भी वास्तु के मध्य भाग को ब्रह्म स्थान कहा जाता है। इसलिए इसे भी वास्तु में महत्वपूर्ण मानते हुए खुला और स्वच्छ रखने की बात कही गई है। ब्रह्म स्थान के खुला रहने से सूर्य की भरपूर रौशनी घर में आती है जो दरवाजे और खिड़कियों के माध्यम से घर के अंदर सकारात्मक ऊर्जा को प्रवाहित करती है और नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर देती है। इसलिए भवन का निर्माण कराते समय सूर्य की ऊर्जा एवं किरणों के प्रभाव महत्व को भी अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा
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