रंगों के अद्भुत त्यौहार होली के बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला माता की आराधना की जाती है। इसलिए इस दिन को शीतलाष्टमी के रूप में जाना जाता है। आम बोलचाल की भाषा में इसे बासौड़ा भी कहा जाता है। देखा जाए तो बासौड़ा होली के बाद मौसम में आने वाले बदलाव के लिए तैयार होने का संदेश देेनेे वाला पर्व है।
त्रितापों से मुक्ति का दिन
स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एक सर्वमान्य नियम यह है कि जब भी मौसम में बदलाव हो, अपने खान-पान और रहन-सहन में भी उसी के अनुसार परिवर्तन कर लिया जाए अन्यथा बीमार होने के लिए तैयार रहें। होली तक मौसम में जो ठंडक एवं नमी बनी रहती थी, वो होली के बाद से ही उष्णता के रूप में हमारे शरीर पर असर डालने लगती है। ऐसे में हमें दैहिक, दैविक और भौतिक रूप से अपने को मजबूत एवं स्वस्थ बनाए रखने के लिए प्रयास आरंभ कर देना चाहिए। जो मनुष्य मौसम के इस बदलाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं, उनमें यदि इम्यूनिटी पावर कमजोर हो तो वे जल्दी बीमार हो जाते हैं। इसी इम्यूनिटी पावर को बढ़ाने के लिए इस दिन त्रितापों से मुक्ति दिलाने वाली शीतला माता की पूजा अर्चना की जाती है और बासी भोजन ग्रहण करके भविष्य में ताजा व गर्म भोजन करने का संकल्प लिया जाता है।
अन्न के सदुपयोग का मिलता है संदेश
शीतला माता को शक्ति की आराध्या जगतजननी देवी भगवती का स्वरूप माना जाता है। शीतला माता एक ऐसी आद्य शक्ति हैं जो प्रकृति तत्व और अन्न के महत्व के माध्यम से लोगों को ये संदेश देती हैं कि हमें प्रकृति से उत्पन्न होने वाले अन्न के एक-एक कण का सदुपयोग करना चाहिए। अन्नपूर्णा का सम्मान करने और जरूरतमंदों को अन्न का दान करने वालों को कभी भी मुसीबतों का सामना नही करना पड़ता है। चूंकि अन्न के उत्पादन में किसान और श्रमिकों की मेहनत लगी होती है, इसलिए शीतलाष्टमी इनकी मेहनत और भक्ति के समक्ष नतमस्तक होने का भी संदेश देती है।
ऐसे करें शीतला माता का पूजन
शीतला माता की आराधना आद्य शक्ति के रूप में की जाती है। जिस प्रकार धन की देवी महालक्ष्मी जी की आराधना की जाती है, लगभग उसी तरह से शीतला माता की पूजा अर्चना का विधान है। अंतर सिर्फ इतना है कि शीतला माता को भोग के रूप में बासी भोजन अर्पित किया जाता है और बासी भोजन ही ग्रहण किया जाता है। शीतला माता की पूजा करते समय माता के थान पर जाकर हथेली से हल्दी के पांच थापे लगाकर हल्दी, गेंहू, मूंग की दाल, रोली, चावल आदि से शीतला माता की पूजा करनी चाहिए। एक दिन पहले यानि सप्तमी की रात को बनाकर रखी गई आटे की पूड़ी और गुड़ डाल कर पकाए गए चावल का भोग शीतला माता को लगाने के बाद होलिका दहन वाली जगह पर जाकर भी पूजा अर्चना करनी चाहिए। शीतला माता की पूजा के बाद छोटे बच्चों को शीतला के प्रकोप से बचाने के लिए उनके ऊपर मशक से पवित्र जल के छींटे लगवाने की भी परंपरा रही है। ऐसा करने से उनके शरीर में मौसम परिवर्तन से होने वाले दूषित प्रभावों से मुक्ति मिल जाती है और वे स्वस्थ बने रहते हैं। --प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।
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