ज्योतिष एवं आयुर्वेद में पवित्र भाव और सदाचरण को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। चरक संहिता में कहा गया है कि जो मनुष्य देवता, ऋषि, गंधर्व, पितृग्रहों आदि का अपमान करता है और अनुचित रूप से नियम, व्रत, पूजा-पाठ आदि कर्म करता है तो वह जीवन में बहुत तरह के कष्ट व उन्माद से पीड़ित रहता है।
आयुर्वेद के ग्रंथों में यह बताया गया है कि सम्यक रूप से सदाचार का पालन करने, धर्म का आचरण करने और प्राकृतिक नियमों के अनुरूप जीवनचर्या को व्यवस्थित करने से ग्रहों के अशुभ प्रभाव निष्फल हो जाते हैं और मनुष्य स्वस्थ, सुखी व प्रसन्न बना रहता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।
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