धार्मिक स्थलों की तीर्थ यात्रा सभी प्रकार के भय, कष्ट और पापों का नाश करने वाली मानी गई है। कहते हैं कि शुद्ध चित्त भाव से तीर्थ यात्रा करने से समस्त पुण्य की प्राप्ति होती है। तीर्थ यात्रा करने वालों को चाहिए कि वे पूर्ण श्रद्धा भक्ति और संयम-नियम के साथ तीर्थ यात्रा करते हुए पवित्र नदियों में स्नान करें एवं भगवान के दर्शन करें।
ऐसे तीर्थ यात्री जिसने तीर्थ यात्रा के दौरान अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित नहीं किया है और मन-मस्तिष्क में कुटिलता भरी हुई है, कितने भी तीर्थ कर आएं, कितनी ही पवित्र नदियों में स्नान कर लें, कितना भी दान-पुण्य कर लें, तीर्थ यात्रा का कोई शुभ फल प्राप्त नहीं होता है।सफल तीर्थ यात्रा के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण आवश्यक है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।
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