सोमवार, 27 सितंबर 2021

उपयोगी वास्तु टिप्स

## मकान की उत्तर-पूर्व विदिशा यानि ईशान कोण में किसी भी तरह का निर्माण या टॉयलेट का होना दांपत्य जीवन के लिए अशुभ होता है। यहां तक कि इस वजह से विवाह टूटने की नौबत आ जाती है। इसलिए इस कोण को सदैव खुला और स्वच्छ रखना आवश्यक है। 

## मकान के आग्नेय कोण यानि दक्षिण-पूर्व विदिशा में गर्भवती महिला को कभी नहीं सुलाना चाहिए अन्यथा उस महिला में अनिद्रा एवं गर्भपात होने का अंदेशा बना रहेगा। जगह की कमी हो तो आग्नेय कोण से हटकर दक्षिण की दीवार की तरफ सुला सकते हैं। 

## मकान की पूर्व में सीढ़ियों का होना भी शुभ नहीं होता। इस दोष के कारण आर्थिक नुकसान के साथ-साथ परिवार के सदस्यों में मानसिक तनाव होता है। सीढ़ियों के लिए और कहीं जगह न हो तो पूर्व दिशा की दीवार और सीढ़ियों के बीच कम से कम तीन इंच का गैप कर देना चाहिए। 

## मकान की दक्षिण-पश्चिम विदिशा यानि नैऋत्य कोण में मुख्य प्रवेश द्वार (मेन गेट) का होना वास्तु दोष है। ऐसा होने से अनावश्यक खर्चा होता है, साथ ही घर के मुखिया का मन भी घर में नहीं लगता। इस दोष से बचने के लिए मुख्य द्वार पर दहलीज बनवा कर उसके नीचे चांदी की पत्ती और नौ छोटे पिरामिड लगवा देने चाहिए। 

## बॉक्स वाले पलंग या बेड में केवल ओढ़ने व बिछाने वाले कपड़े ही रखने चाहिए। पलंग के बॉक्स के अंदर किसी भी तरह का कबाड़, पुराने कपड़े, बिजली के खराब उपकरण, टूटे बर्तन, रद्दी अखबार आदि रखने से परिवार में कलह व मानसिक रोग होने की संभावना बनी रहती है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

शनिवार, 18 सितंबर 2021

श्राद्ध कर्म में पंचबली का महत्व

   पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का दूसरा नाम ही श्राद्ध है। धार्मिक एवं पौराणिक मान्यता है कि अमावस्या और पूर्णमासी के दिन पूर्ण श्रद्धा भाव के साथ पितरों के लिए श्राद्ध एवं तर्पण करने से पितृ प्रसन्न हो कर अपना शुभ आशीर्वाद देते हैं, लेकिन आश्विन मास में पड़ने वाले श्राद्ध के दिन पितृ पूजन के लिए विशेष महत्व रखते हैं। श्राद्ध के दिनों में पितरों की प्रसन्नता और कृपा पाने के लिए पिंड दान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन और श्रद्धा के अनुसार दक्षिणा देने आदि कार्य किए जाते हैं।

  भारतीय संस्कृति में पितरों को भगवान की तरह पूजनीय माना जाता है। पितरों को याद करके उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने के उद्देश्य से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक की अवधि श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष के रूप में मान्य की गई है। इस अवधि के दौरान प्रतिदिन तन व मन से सात्विक और पवित्र भावना बनाए रखते हुए दूध, काले तिल, कुशा एवं पुष्प मिश्रित जल से दक्षिण की तरफ मुख रखते हुए तर्पण करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से श्राद्ध पक्ष समाप्त होने पर पितर अपने परिजनों को आशीर्वाद देकर स्वर्ग लोक के लिए गमन करते हैं। 

   श्राद्ध पक्ष के दिनों में पड़ने वाली चतुर्थी तिथि के दिन होने वाले श्राद्ध में चतुर्थी व्रत रखने का विशेष महत्व होता है। चूंकि चतुर्थी तिथि का संबंध गणेश जी से माना गया है, इसलिए इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण करने के साथ-साथ गणेश जी की आराधना भी करनी चाहिए तथा गणेश जी व उनके वाहन मूषक को भोजन के अलावा मोदक का भोग भी लगाना चाहिए। इस तिथि को श्वेत गणपति को सफेद चंदन, श्वेत वस्त्र, लाल रंग के पुष्प, पीले रंग की माला, 21 मोदक, चार केले, पान, सुपारी, लौंग आदि अर्पित करते हुए गणेश जी की आरती करनी चाहिए। 

   श्राद्ध पक्ष के दिनों में गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देवताओं के लिए भोजन में से अंश निकाला जाता है। इन पांच अंशों का अर्पण पंच बलि कहलाता है। देखा जाए तो श्राद्ध पक्ष में पंच बलि पंच तत्वों के प्रति आभार व्यक्त करना है। क्योंकि कुत्ते को जल का, चींटी को अग्नि का, कौवा को वायु का, गाय को पृथ्वी का और देवता को आकाश का प्रतीक माना गया है। गाय में सभी पंच तत्व की उपस्थिति होने से श्राद्ध पक्ष में गौ सेवा को विशेष महत्व दिया गया है। इन दिनों पंच गव्य का प्रयोग करते रहने से पितृ दोष से भी मुक्ति मिल जाती है। 

    श्राद्ध पक्ष में श्रद्धा भाव के साथ जीव-जंतुओं को भी भोजन कराने से पितरों की कृपा से जीवन में सुख, शांति, धन, संपत्ति संतान, विद्या, ज्ञान आदि की प्राप्ति होती है और पितृ दोषों का निवारण होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

शनिवार, 14 अगस्त 2021

बहुत उपयोगी है श्रीयंत्र

 भारत में श्रीयंत्र का प्रयोग ईसा से लगभग एक हजार साल पहले हुआ था, लेकिन इसका महत्व तब प्रकाश में आया, जब पाण्डवों ने अपना राज-पाट छिन जाने के बाद श्रीयंत्र की प्राण प्रतिष्ठा करके पूजा करना शुरू किया। श्रीयंत्र की पूजा के प्रभाव से उनका खोया हुआ वैभव, सम्मान और संपत्ति आदि वापस प्राप्त हो गए। 

  श्रीयंत्र को लक्ष्मी यंत्र भी कहते हैं। श्रीयंत्र में श्री का अर्थ लक्ष्मी से होता है। इसका बीजमंत्र भी श्री है। ब्रह्मांड पुराण के अनुसार जहां श्रीयंत्र स्थापित किया जाता है, वहां के साथ-साथ आसपास की जमीन, वृक्ष, पशु-पक्षी और वातावरण पर अनुकूल एवं सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, साथ ही वास्तु दोषों का निवारण भी होता रहता है। श्रीयंत्र की दुर्लभ ज्यामितीय संरचना के प्रभाव से मनुष्य की समस्त मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। 

   श्रीयंत्र सोना, चांदी, तांबा और स्फटिक का हो सकता है। श्रीयंत्र का सकारात्मक प्रभाव मनुष्य पर इसकी विधि पूर्वक प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही पड़ता है। श्रीयंत्र की नियमित पूजा करते रहने से जीवन में मान-सम्मान, ऐश्वर्य, सौभाग्य, धन-संपदा, वैभव, संतान आदि की प्राप्ति होती है। 

  जिन लोगों की कुंडली में केमद्रुम योग,  शकट योग, ऋण योग,  काक योग या दरिद्र योग होता है, वे जीवन में कई तरह की समस्याओं से परेशान रहते हैं। ऐसे लोगों को अन्य ज्योतिषीय उपायों के साथ-साथ श्रीयंत्र की स्थापना करके नियमित पूजा करनी चाहिए। दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के समय श्रीयंत्र की स्थापना करके उसकी पूजा करना भी लाभकारी होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 


सोमवार, 26 जुलाई 2021

श्रावण मास में करें शिवोपासना

    भोले बाबा,भोले नाथ, शिवशंकर, त्रिपुरारी, कैलाशपति, महाकाल, महेश आदि नामों से पुकारे जाने वाले भगवान शिव की आराधना अन्य देवताओं की तुलना में बड़ी ही आसान मानी गई है। कहते हैं कि शिवलिंग पर पूर्ण भक्ति भाव से जल, बेलपत्र, धतूरा, आक पुष्प, चंदन आदि अर्पित करने से ही भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं और अपने समस्त भक्तों की मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं। यूं तो भगवान शिव की आराधना हर महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मासिक शिवरात्रि के रूप में की जाती है। लेकिन श्रावण मास और फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए विशेष महत्व रखती हैं। 

भक्ति भावना के लिए है शिवोपासना

   त्रिनेत्रधारी भगवान शिव तंत्र-मंत्र, संहार शक्ति और तमोगुण के देवता माने गए हैं। इसलिए श्रावण मास में प्रतिदिन भगवान शिव की भक्ति करना, शिव मंत्रों का जाप करना, महामृत्युंजय मंत्र को सिद्ध करना, ध्यान, भजन, कीर्तन आदि करना विशेष रूप से शुभ फलदायी माना गया है। श्रावण मास में पड़ने वाले सोमवार को शिवलिंग पर गंगा जल, शहद, दूध, घी, गन्ने का रस, दही, तेल आदि से मंत्रोच्चारण के साथ अभिषेक किया जा सकता है। लेकिन इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि शिवलिंग पर हल्दी केतकी, केवड़ा, जूही, कपास गाजर, अनार आदि कभी भी न चढ़ाएं। शास्त्रों में इन्हें निषिद्ध माना गया है। इसके अलावा पूरे श्रावण मास में भक्तों को बाह्य एवं आंतरिक पवित्रता बनाए रखते हुए क्रोध, अंहकार, गलत आचरण, हिंसा जैसे कृत्यों का भी त्याग करना चाहिए, तभी शिवोपासना का उचित फल मिलता है। 

श्रावण मास में ऐसे करें शिव आराधना

 श्रावण मास क सोमवार को भगवान शिव के मंदिर में जाकर शिवलिंग पर तांबे के बर्तन से शुद्ध व स्वच्छ जल, गंगाजल, गाय का कच्चा दूध, गन्ने का रस, शहद, शुद्ध घी, दही, सफेद चंदन, बेल पत्र, शमी पत्र, बेर, धतूरा, भांग, आक या कनेर के पुष्प, कपूर, धूप, दीप, पांच तरह के फल, पांच तरह की मिठाई, पंच मेवा, इत्र, रोली, मौली आदि अर्पित करते हुए 'ऊं नम: शिवाय' का उद्घोष करना चाहिए। श्रावण मास में पवित्र नदियों से गंगा जल भरकर कांवड़ यात्रा करके जल को शिवलिंग पर अर्पित करने की परंपरा है, लेकिन कोरोना संक्रमण के मद्देनजर भक्तों को अपने घर के नजदीक के किसी भी शिव मंदिर में शिवलिंग पर गंगा जल मिश्रित स्वच्छ जल अर्पित करके शिव जी की आराधना करनी चाहिए। शिवलिंग पर शमी पत्र भी चढ़ा सकते हैं। शमी पत्र चढ़ाते समय 'अमंगलानां च शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च। दु:खप्रनाशिनीं धन्यां प्रपद्येतं शमीं शुभाम्।। ' का जाप अवश्य करना चाहिए। 

शिवोपासना से मिलते हैं अनंत लाभ

  श्रावण मास में पूर्ण श्रृद्धाभाव बनाए रखते हुए भगवान शिव की आराधना करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, मानसिक शांति मिलती है, दांपत्य जीवन में परेशानी, गंभीर बीमारी, दुर्घटना और कालसर्प योग से मुक्ति मिलती है। इस मास में प्रत्येक सोमवार को महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस मंत्र के जाप से जीवन में सुख-शांति, बुद्धि, विद्या, सम्मान, धन, संतान आदि की प्राप्ति होती है। जिस कन्या के विवाह किसी भी कारण से देरी हो रही हो या अड़चन आ रही हो, उसे सोमवार के दिन शिव परिवार की आराधना करनी चाहिए और माता पार्वती पर सुहाग सामग्री चढ़ाते हुए शीघ्र विवाह के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। वहीं जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प योग है तो उन्हें श्रावण मास के किसी भी सोमवार को एक जोड़ी तांबे का सर्प और एक जोड़ी चांदी का सर्प एक साथ गंगा या यमुना नदी के बहते हुए जल में प्रवाहित करना चाहिए। अगर पास में नदी न हो तो इन्हें शिवलिंग पर चढ़ाकर जलाभिषेक करते हुए भगवान शिव से कष्टों से मुक्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

बुधवार, 21 जुलाई 2021

अनबूझ मुहूर्त

पूनम की पड़वा भली अर अमावस की बीज। 

अणु बूझ्या मुहरत भला कै तैरस के तीज।। 

      राजस्थान के एक कवि द्वारा रचित इस दोहे में किसी भी कार्य को करने के लिए अनबूझ (अनसूझ) मुहूर्त के बारे में बताया गया है। जिसके अनुसार पूर्णमासी के बाद आने वाली प्रतिपदा तिथि (पड़वा), त्रयोदशी तिथि (तेरस) एवं तृतीया तिथि (तीज) और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की द्वितिया तिथि (दौज) अनबूझ मुहूर्त होती हैं। इन तिथियों में किसी भी काम को करने के लिए मुहूर्त नहीं देखा जाता है और काम में भी सफलता मिलती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

वास्तु के अनुसार लगाएं पौधे

   वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार यदि घर के अन्दर और आसपास पेड़-पोधे लगाये जाएं तो उसके शुभ परिणाम मिलते हैं। घर की पूर्व दिशा में पीपल, दक्षिण दिशा में पलाश, पश्चिम दिशा में वट और उत्तर दिशा में उदुम्बर के पेड़ कभी नहीं लगाने चाहिए अन्यथा गृह स्वामी को सदैव समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। पश्चिम दिशा में लगाया गया पीपल का पेड़ धन-धान्य की प्राप्ति कराता है।

    नैऋत्य कोण और आग्नेय कोण में उद्यान और बगीचा नहीं लगाना चाहिए। घर के अन्दर बने बगीचे में नीलिमा एवं हरिद्रा लिए हुए पौधे लगाने से धन व संतान की हानि होने की आशंका बनी रहती है। इसी प्रकार घर के पास फलदार, कांटेदार और दूधवाले पौधे भी नहीं लगाने चाहिए।

    घर के अन्दर बेर, केला, अनार, अरण्डी तथा कांटेदार पेड़ लगाने से उस घर की संतानों का विकास बाधित होने के साथ-साथ गृह स्वामी को शत्रुभय बना रहता है तथा आर्थिक तंगी भी बनी रहती है। जिस पौधे में फल,दूध और कांटे तीनों ही मौजूद हों, उसे भूलकर भी घर के अन्दर नहीं लगाना चाहिए अन्यथा घर के सदस्यों को मृृत्युु का भय बना रहता है।-प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

मंगलवार, 20 जुलाई 2021

श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता का छठा अध्याय ध्यान योग से संबंधित है। इस अध्याय में कुल 47 श्लोक दिए गए हैं, जिसमें बताया गया है कि मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए अष्टांगयोग करना चाहिए तथा अपने ध्यान को परमात्मा पर केंद्रित करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य समाधि अवस्था को प्राप्त होता है। 

   भगवान कहते हैं कि कर्म फल के प्रति अनासक्त भाव से कर्म करने वाले मनुष्य ही योगी और सन्यासी हैं। मन पर विजय प्राप्त करने वाला, समस्त जीवों को समान दृष्टि से देखने वाला, आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने वाला, विधि पूर्वक योगाभ्यास करने वाला, उचित आहार-विहार व दैनिक कार्य कलापों में नियमित रहने वाला मनुष्य ध्यान योगी कहलाता है। 

   भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि योगाभ्यास के द्वारा मनुष्य अपने मन और समस्त भौतिक मानसिक क्रियाओं से पूर्ण रूप से संयमित हो जाता है। इसे सिद्धि या समाधि अवस्था कहते हैं। ध्यान योग में लगने वाले मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह अपने शरीर, मन व आत्मा को परमात्मा में लगाए, समान मत वाले लोगों के साथ एकांत में रहे, सावधानी पूर्वक सभी इच्छाओं का अंत करे, विश्वास के साथ बुद्धि द्वारा योग करे और मन की चंचलता व अस्थिरता को हटाकर भगवान के चरणों में समर्पित हो जाए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता का पांचवा अध्याय कर्म योग से संबंधित है, जिसमें कृष्णभावनाभावित कर्म की विवेचना की गई है। इस अध्याय में दिए गए 29 श्लोकों के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण ने भगवान को समर्पित कर्मों को ज्ञान से श्रेष्ठ बताया है। भगवान कहते हैं कि मनुष्य कर्म फल का त्याग करते हुए जब कर्मों में तल्लीन रहता है तो वह शांति, सहिष्णुता, आनंद, आध्यात्मिक दृष्टि और विरक्ति प्राप्त करता है। 

   भगवान श्री कृष्ण का कहना है कि मनुष्य को सदैव अपने धर्म के अनुसार कर्म करने चाहिए और यदि वह भक्ति युक्त कर्म करता रहे तो सबसे उत्तम है। अपनी इंद्रियों व मन को वश में करके भक्ति भाव के साथ कर्म करने वाले मनुष्य ही विशुद्ध आत्मा हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन में जो भी कर्म करे, यह मानकर करे कि वास्तव में उन कर्मों को करने में उसकी कोई भूमिका नहीं है। 

   भगवान की शुद्ध भक्ति और ज्ञान से परिपूर्ण मनुष्य समस्त जीवों को समान भाव से देखता है, हर्ष, व्याकुलता, इंद्रिय सुख, संशय, क्रोध, भौतिक इच्छा,भय आदि से मुक्त रहता है। भगवान श्री कृष्ण ने इस अध्याय के माध्यम से मनुष्य को निर्देशित किया है कि वह कृष्णभावनाभक्ति कर्म, तत्पदार्थ ज्ञान और समतामूलक भावना के द्वारा जीवन में पूर्ण शांति प्राप्त कर सकता है।--प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

सोमवार, 19 जुलाई 2021

कर्मों के अनुसार दंड देते हैं शनि देव

 ज्योतिष में शनि ग्रह को दण्डनायक माना गया है। शनि ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जो संसार के सभी प्राणियों को भेदभाव किए बिना उनके कर्मों के अनुसार दण्ड देता है। यह धारणा कि शनि हमेशा बुरा ही करते हैं, गलत है। सच्चाई यह है कि पूर्व जन्म में अच्छे कर्म करने वाले मनुष्यों की जन्मकुंडली में अपनी स्वयं की राशि या उच्च राशि में बैठ कर शनि उन्हें सभी तरह के लाभ देते हैं। मकर व कुंभ राशि, शनि ग्रह की अपनी राशि हैं। शनि, तुला राशि में उच्च के और मेष राशि में नीच के माने जाते हैं। 

   यदि किसी भी कारण से मनुष्य के जीवन में शनि के अशुभ प्रभाव की वजह से कष्ट, रोग, धन की कमी, गलत मार्ग पर जाना, आकस्मिक दुर्घटना आदि समस्याएं आ रही हैं तो समाधान के लिए प्रतिदिन हनुमान जी की उपासना, सूर्य देव की उपासना, शनि चालीसा व शनि अष्टक का पाठ करना चाहिए। संभव हो तो योग्य ज्योतिषविद् से सलाह लेकर काले घोड़े के नाल या नाव की पुरानी कील की अंगूठी अथवा नीलम या जमुनिया रत्न धारण करना चाहिए। 

    शनि ग्रह से पीड़ित मनुष्यों को शराब, नशीली वस्तुओं, मांसाहारी भोजन से परहेज करना आवश्यक है। इसके अलावा जिन मनुष्यों पर शनि की साढ़े साती चल रही है,उन्हें भी इनसे बचना चाहिए, अपने घरेलू व कार्यस्थल पर काम करने वाले नौकरों या मजदूरों के साथ कभी भी बुरा व्यवहार नहीं करना चाहिए और न ही उनकी बेईमानी से उनका वेतन, मजदूरी, जमीन-जायदाद आदि हड़पनी चाहिए।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

वास्तु के अनुसार रखें भगवान का पूजन-स्थल

   जीवन में सुख, शांति, संपन्नता और रोगों से छुटकारा पाने के लिए हम सभी अपने-अपने तरीके से पूजा-पाठ, जप, तप, मंत्र जप, यज्ञ, दान आदि द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करके उनकी कृपा पाने की कोशिश करते हैं, परंतु कई बार निरंतर प्रयासों के बाद भी अपेक्षित लाभ नहीं मिलता, तब जीवन में निराशा और नकारात्मकता हावी होने लगती है तथा ईश्वर भक्ति से मन विचलित होने लगता है। इसका कारण भगवान के पूजा स्थल का उचित दिशा में अर्थात वास्तु के अनुरूप न होना भी हो सकता है।

     कहा ये जाता है कि ईश्वर सर्वत्र विद्यमान हैं, लेकिन वास्तु शास्त्र में भगवान की पूजा के लिए अलग-अलग दिशाओं को महत्व दिया गया है। वहीं धार्मिक कार्यों के निष्पादन में सदैव पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना ही उचित माना गया है। वास्तु नियमों के अनुसार अगर हम भगवान के पूजा स्थल के उद्देश्य से दिशाओं पर चर्चा करें तो पूर्व दिशा में सूर्योदय होने से यह दिशा सूर्य देव तथा सूर्यवंशी प्रभु श्री राम की पूजा के लिए उत्तम है। इस दिशा में श्री राम दरबार का चित्र लगाकर पूजा की जा सकती है। पश्चिम दिशा का संबंध बृहस्पति यानि गुरु से होता है, इसलिए यहां अपने आराध्य एवं आध्यात्मिक, धार्मिक अथवा शैक्षिक गुरु की पूजा का स्थल बनाया जा सकता है।

   उत्तर दिशा को कुबेर की दिशा कहा गया है। इस दिशा में धन की देवी महालक्ष्मी और बुद्धि प्रदाता श्री गणेश जी का पूजा स्थल शुभ फलदायी होता है। उत्तर दिशा के महत्व को देखते हुए ही धन वृद्धि के लिए धन रखने वाली अलमारी या तिजोरी का मुख उत्तर दिशा में ही खुलने को उचित माना जाता है। दक्षिण दिशा में महाकाली या पवन पुत्र हनुमान जी की पूजा के लिए स्थल बनाया जा सकता है। माना जाता है कि दक्षिणमुखी हनुमान जी की आराधना करने से सभी प्रकार के रोग, समस्याओं और कष्टों से छुटकारा मिलने लगता है।

    उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण को घर या व्यापारिक स्थल पर मंदिर या पूजा स्थल बनाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान माना जाता है। यह दिशा भगवान शिव और पंच देवों की पूजा के लिए श्रेष्ठ है। कुलदेवी की पूजा के लिए उत्तर-पश्चिम दिशा अर्थात वायव्य कोण निर्धारित किया गया है। यहां अपने कुल की देवी की स्थापना करके उनकी पूजा-अर्चना की जा सकती है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

रविवार, 18 जुलाई 2021

श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय में मनुष्य को दिव्य ज्ञान का बोध कराया गया है। इस अध्याय में कुल 42 श्लोक हैं। इनके माध्यम से कहा गया है कि आत्मा व भगवान से संबंधित दिव्य ज्ञान होने से मनुष्य की अंतश्चेतना शुद्ध हो जाती है। जिसके प्रभाव से भगवान की भक्ति करते हुए अंत काल में मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। 

   भगवान श्री कृष्ण ने इस अध्याय में स्पष्ट रूप से कहा है कि वे अजन्मा, अविनाशी व समस्त जीवों के स्वामी हैं। धर्म की हानि होने से जब अधर्म का बोलबाला होने लगता है, तब वे अवतार लेकर दुष्टों का नाश करके पुनः धर्म की स्थापना करते हैं। आसक्ति, भय एवं क्रोध का परित्याग करके उनकी (श्री कृष्ण) शरण में आने वाले मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्कर से छुटकारा मिल जाता है। 

   संसार के भौतिक बंधन से मुक्त होने के लिए भगवान कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को सात्विक, राजसिक व तामसिक प्रकृति के गुणों के प्रति अनासक्त भाव से भगवान के दिव्य ज्ञान में लीन होकर कर्म करने चाहिए। यदि मनुष्य के ह्रदय में अज्ञानता की वजह से किसी प्रकार का कोई संशय रहता है तो उसे दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण के सिद्धांत रुपी ज्ञान यज्ञ का सहारा लेना चाहिए।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

शनिवार, 17 जुलाई 2021

श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग से संबंधित है। इस अध्याय में कहा गया है कि इस भौतिक संसार में प्रत्येक मनुष्य को कोई न कोई कर्म करना ही पड़ता है, जिससे वह संसार के बंधनों में बंध जाता है। मनुष्य के ये कर्म सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक प्रकृति के हो सकते हैं। लेकिन, अगर मनुष्य निष्काम भावना के साथ भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करे तो निश्चित ही वह कर्म करने के बंधन से मुक्त होकर आत्मा और परमात्मा के दिव्य ज्ञान को प्राप्त करने के योग्य हो जाता है। 

   श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में कुल 43 श्लोक दिए गए हैं। इन श्लोकों का सार यही है कि मनुष्य अपने-अपने वर्ण (क्षत्रिय, वैश्य, ब्राह्मण व शूद्र) के अनुसार कर्म फल में आसक्त हुए बिना भगवान विष्णु के निमित्त कर्म करे, लाभ की इच्छा कदापि न करे, आलस्य व स्वामित्व की भावना का त्याग करे और हमेशा दूसरे मनुष्यों को सही रास्ते पर लाने के लिए अनासक्त होकर अपने कर्म पथ पर दृढ़ निश्चय के साथ चलता रहे। 

   इसी अध्याय में भगवान कृष्ण कहते हैं कि कर्मेंद्रियों से मन, मन से बुद्धि और बुद्धि से आत्मा श्रेष्ठ है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी समस्त इंद्रियों और इच्छाओं को ज्ञान के द्वारा वश में करे, जिससे कि काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का दमन हो सके। भगवान ये भी कहते हैं कि मनुष्य स्वयं को भगवान का सेवक समझे, अपने भीतर आध्यात्मिक ज्ञान व शक्ति का विकास करे, पाप कर्मों से दूर रहकर सद्कर्म करते हुए भगवान की भक्ति व सेवा में तल्लीन रहे। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 


श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का सार

 श्रीमद्भगवद्गीता का दूसरा अध्याय गीता के सार के रूप में जाना जाता है। इस अध्याय में दिए गए 72 श्लोकों में आत्मा व परमात्मा, मुक्त मनुष्य के लक्षण, बुद्धि योग और विषय भोग से मुक्त होने के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है। इस अध्याय को सांख्य योग भी कहा जाता है। इसमें भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को ह्रदय की कमजोरी, मोह, शोक आदि को त्याग कर अपने धर्म के अनुसार योग में स्थित होकर अपनी समस्त इंद्रियों को वश में करते हुए निष्काम कर्म करते रहना चाहिए। 

    भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि इस संसार में कोई भी अमर नहीं है। जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है। मृत्यु के बाद कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म भी निश्चित है। मनुष्य का शरीर नाशवान है, लेकिन उसके शरीर में रहने वाली आत्मा अविनाशी, अजन्मा, शाश्वत, अव्यय, अकल्पनीय, अखंडित, अपरिवर्तनीय, अवध्य, अविकारी, स्थिर, सर्वव्यापी, एक समान रहने वाली आदि अद्भुत रूप वाली है। शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। 

   श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने यह भी कहा है कि जिस मनुष्य के अंदर इंद्रिय तृप्ति की कामना न हो, दैहिक, दैविक व भौतिक तापों में मन अविचलित रहे, दुख, सुख व कष्ट आने पर कोई असर न हो, आसक्ति, क्रोध, भय व घृणा की भावना न हो, मन और इच्छाओं पर पूरा नियंत्रण हो तथा पूर्ण ज्ञान व चेतना में दृढ़ स्थिरता हो, वही मनुष्य वास्तव में सांसारिक विषयों से मुक्त माना जाता है। सच्चे ह्रदय से भगवान के शरणागत होकर मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति, ज्ञान और मुक्ति का अधिकारी हो सकता है। - प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय का सार

  भगवान श्री कृष्ण जी के मुखारविंद से अर्जुन को दिए गए उपदेश रुपी ज्ञान का अनुपम भंडार है श्रीमद्भगवद्गीता। मनुष्यों को भौतिक संसार के मायाजाल से निकाल कर भगवान के प्रति समर्पित होने का संदेश देने वाली इस अद्भुत कृति में कुल अठारह अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय अपने आप में विशिष्ट ज्ञान को समेटे हुए है। भक्तिभाव के साथ श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन करने से मनुष्य की समस्त जिज्ञासाओं व चिंताओं का सहज ही समाधान हो जाता है और वह सात्विक जीवन जीते हुए अंत में विष्णु लोक को गमन करता है। 

  श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय के अंतर्गत कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल में सैन्य निरीक्षण की चर्चा की गई है। इस अध्याय में कुल 46 श्लोक हैं। इसमें शक्तिशाली अर्जुन युद्ध भूमि में सामने खड़ी विपक्षी सेना में अपने नाते-रिश्तेदार, गुरुजनों एवं मित्रों को देख कर व्यथित हो जाता है और शोक व मोह के वशीभूत होकर भगवान श्री कृष्ण से युद्ध न करने की बात कहता है। इसलिए यह अध्याय अर्जुन विषाद योग के नाम से भी जाना जाता है। 

    श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य को शोक और मोह से छुटकारा पाने के लिए भगवान की शरण लेनी चाहिए। क्योंकि वे ही मनुष्य को सही रास्ता दिखा सकते हैं और मन के विषाद को दूर कर सकते हैं। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण को ह्रषीकेश, अच्युत, कृष्ण, गोविंद, मधुसूदन, जनार्दन और प्रजापालक नामों से पुकारा गया है। वहीं अर्जुन को पार्थ और कुंती पुत्र कहा गया है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

   

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

अशुभ केतु ग्रह से होने वाले रोग और निदान

 ज्योतिष में केतु ग्रह को भी छाया ग्रह माना गया है। केतु ग्रह के अशुभ प्रभाव के कारण मनुष्य में खून की कमी, कैंसर, निमोनिया, बवासीर, पित्त, मूत्र व त्वचा रोग, अस्थमा, छूत के रोग, हैजा, जलने या चोट लगने का भय जोडों में दर्द आदि समस्याएं देखने को मिलती हैं। 

  केतु ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचाव के लिए मनुष्य को 'ऊं कें केतवे नम:' और 'ऊं ह्रीं ऐं केतवे नम:' मंत्र का जप करना शुभ माना जाता है। केतु ग्रह को प्रसन्न करने लिए श्रीगणेश स्तवराज का पाठ करना भी शुभ प्रभावकारी हो सकता है। - प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ राहु से होने वाले रोग और निदान

 राहु ग्रह को छाया ग्रह माना जाता है। राहु के अशुभ प्रभाव के कारण मनुष्य में मस्तिष्क, त्वचा व ह्रदय रोग, कब्ज, अतिसार, भूत-प्रेत बाधा, कैंसर, गठिया, वायु विकार, कुष्ठ रोग, प्रोस्टेट ग्रंथि वृद्धि, रीढ़ की हड्डी से संबंधित चोट व रोग होने की संभावना रहती है। 

  राहु ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए मनुष्य को पूर्ण श्रृद्धा भाव के साथ नियम से 'ऊं रां राहवे नम:', 'ऊं ह्रीं राहवे नम:', ऊं भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:' मंत्रों का जप करना चाहिए। नीले रंग के धागे में चंदन की लकड़ी का मोती या टुकड़ा गले में धारण करने से भी लाभ मिलता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ शनि से होने वाले रोग और निदान

 शनि ग्रह को कर्मों का दंडाधिकारी माना गया है। शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव से मनुष्य में पैरालाइसिस, मिर्गी, हाथ, पैर व शरीर में कंपन, गठिया, कमर दर्द, कैंसर, वातोदर, पेट दर्द व पेट में कीड़े, टीबी, शरीर में सूजन, कुष्ठ रोग, त्वचा में फोड़ा, फुंसी व घाव, विष बाधा, मानसिक या स्नायु संबंधी रोग हो सकते हैं। 

  शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए 'ऊं ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चराय नमः' या 'ऊं शं शनिश्चराये नमः' मंत्र के साथ सूर्य देव के मंत्र 'ऊं ह्रीं घृणि: सूर्य आदित्य श्रीं' मंत्र का जप व ध्यान करना चाहिए। मिर्गी के रोगी को सूर्य की होरा में जायफल में सूराख करके लाल डोरा डालकर गले में पहनाने से लाभ मिलता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ शुक्र ग्रह से होने वाले रोग और निदान

 शुक्र ग्रह के नीच राशि में होने, शत्रु राशि या शत्रु ग्रह से युति होने पर मनुष्य डायबिटीज, नेत्र रोग, हिस्टीरिया, कुंठित बुद्धि, गुप्त रोग, गर्भाशय के रोग, नपुंसकता, नासूर, नकसीर, मूत्र रोग, दांतों में दर्द, टिटनेस, प्रदर रोग आदि से पीड़ित हो सकता है। 

   शुक्र ग्रह जनित रोगों से बचाव के लिए शुक्ल पक्ष के शुक्रवार से आरंभ करते हुए 'ऊं ह्रीं श्रीं शुक्राय नम:' अथवा 'ऊं द्रां द्रीं द्रौं शुक्राय नम:' मंत्र का जप प्रतिदिन करना चाहिए। साथ ही स्नान करते समय पानी में केसर या जायफल डाल लेना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ बृहस्पति ग्रह से होने वाले रोग और निदान

 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बृहस्पति ग्रह के शत्रु राशि में होने या शत्रु ग्रहों से युति करने अथवा मंगल या शनि ग्रह से दृष्ट होने पर गला, कान, सांस व यकृत संबंधी रोग, कफ, अतिसार, बवासीर, कंठमाला, अनिद्रा, पैरालाइसिस, आमवात, गठिया आदि रोग हो सकते हैं। 

     बृहस्पति ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचाव के लिए भगवान विष्णु की पूजा करना, तुलसी जी पर दीपक प्रज्ज्वलित करना, गाय को बृहस्पतिवार के दिन गुड़ व चने की भीगी दाल खिलाना और 'ऊं बृं बृहस्पतये नम:' या 'ऊं ऐं क्लीं बृहस्पतये नम:'मंत्र का जप प्रतिदिन करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

अशुभ बुध ग्रह से होने वाले रोग एवं निदान

  बुध ग्रह जब अशुभ होता है तो मनुष्य में ब्लडप्रेशर, अस्थमा, वात रोग, चक्कर आना, सिर दर्द, जी मिचलाना, नपुंसकता, कमजोरी, नासिका रोग, वमन होना, उन्माद, मिर्गी, अजीर्ण, आमाशय के रोग, ह्रदय गति रुकना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। 

  बुध के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए भगवान गणेश जी की आराधना करने के साथ-साथ 'ऊं बुं बुधाय नम:', 'ऊं ऐं श्रीं श्रीं बुधाय नम:' या 'ऊं ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:' मंत्र का जप प्रतिदिन करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

पर्सन इंचार्ज के तौर पर एक ही अस्पताल को मिलेगा लाइसेंस

आगरा (प्रमोद कुमार अग्रवाल)। स्वास्थ्य विभाग द्वारा अब पर्सन इंचार्ज के तौर पर एक ही अस्पताल को लाइसेंस दिए जाने का निर्णय लिया गया है। एक स...