मंगलवार, 10 सितंबर 2024

शिक्षण संस्थानों के लिए भी हैं वास्तु नियम

   देखने में आता है कि कुछ स्कूल, कॉलेज या शिक्षण संस्थानों में योग्य विद्यार्थी प्रवेश पाने से वंचित रह जाते हैं, तो कुछ संस्थान ऐसे भी होते हैं जहां शिक्षा का स्तर बेहतर होने के बाद भी कक्षाओं में सीटें खाली नजर आती हैं। इसका कारण उस संस्थान का वास्तु नियमों के अनुसार निर्मित अथवा व्यवस्थित न होना भी हो सकता है। स्कूल, कॉलेज एवं शिक्षण संस्थानों के लिए भी वास्तु शास्त्र में कुछ नियम दिए गए हैं, जिनका अनुपालन करके उस संस्थान को बुलंदियों पर ले जाया जा सकता है। 

   शिक्षण संस्थान कोई भी हो, उसकी दिशा और विदिशा को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित व्यवस्थाएं की जा सकती हैं-

@ उत्तर-पूर्व कोण (ईशान) में क्लास रूम/हॉस्टल/स्पोर्ट्स ग्राउंड। 

@ पूर्व में क्लास रूम/ प्रशासनिक विभाग/लाइब्रेरी। 

@ दक्षिण-पूर्व कोण (आग्नेय) में कैंटीन/ मनोरंजन कक्ष। 

@ दक्षिण में वाइस प्रिंसिपल/वाइस चांसलर कक्ष। 

@ दक्षिण-पश्चिम कोण (नैरुत्य) में प्रिंसिपल/डायरेक्टर/चांसलर कक्ष। 

@ पश्चिम में क्लास रूम/ एक्जामिनेशन डिपार्टमेंट/प्रैक्टिकल लैब। 

@ उत्तर-पश्चिम कोण (वायव्य) में स्टाफ रूम/टॉयलेट। 

@ उत्तर दिशा में क्लास रूम/एकाउंट्स विभाग/हॉस्टल/लाइब्रेरी/स्पोर्ट्स ग्राउंड। 

@ ब्रह्म स्थान (मध्य) में खुली जगह/प्रेयर ग्राउंड। 

   इन सब के अलावा क्लास रूम वर्गाकार या आयताकार हों तथा ब्लैकबोर्ड उत्तर या पूर्व दिशा की दीवार पर बनवाएं जिससे कि पढ़ाई करते समय विद्यार्थियों का चेहरा उत्तर या पूर्व में हो।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

आत्महत्या की वजह भी हो सकती है वास्तु दोष

किसी भी भवन में होने वाले वास्तु दोष आर्थिक नुकसान, बीमारी, कैरियर में बाधा, व्यापार या व्यवसाय में घाटा, आकस्मिक दुर्घटना, मान सम्मान में कमी, परिवार के सदस्य का गलत रास्ते पर जाना जैसी बहुत सी समस्याओं की वजह हो सकते हैं। वहीं परिवार के किसी सदस्य द्वारा आत्महत्या करना भी वास्तु दोष की एक वजह हो सकता है। 

   वास्तु शास्त्र में ऐसे बहुत से दोषों का उल्लेख किया गया है, जिनके कारण परिवार के सदस्य मानसिक रूप से इतने त्रस्त हो जाते हैं कि वे आत्महत्या करने जैसा कदम उठाकर अपने पीछे परिवार को रोता बिलखता छोड़ जाते हैं। भवन में उत्तर-पूर्व कोण, दक्षिण-पूर्व कोण और दक्षिण-पश्चिम कोण दोषपूर्ण नहीं होने चाहिए, अन्यथा इन कोणों में बने कमरे में रहने वाले सदस्य मानसिक अवसाद, अशांति, तनाव, चिंता, उदासी, पागलपन आदि का शिकार हो सकते हैं। लगातार रहने वाले ये लक्षण जब उग्र रूप ले लेते हैं तो वह सदस्य आत्महत्या करने की कोशिश कर सकता है।

   अनुभव में यह आया है कि जिन भवनों में उत्तर-पूर्व कोण हमेशा खुला, खाली व स्वच्छ रहता है, उत्तर पश्चिम क्षेत्र में हल्का वजनदार सामान रखा जाता है, दक्षिण पश्चिम क्षेत्र को ऊंचा व भारी रखा जाता है, ब्रह्म स्थान स्वच्छ व खाली रहता है और दक्षिण-पश्चिम एवं दक्षिण-पूर्व दिशा में किसी प्रकार का कोई गड्ढा, कुंआ या भूमिगत जल स्रोत नहीं होता, वहां रहने वाले लोग मानसिक रूप से अधिक स्वस्थ बने रहते हैं और कैसी भी परिस्थिति हो, आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाते।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा

सुखी मातृत्व के लिए वास्तु टिप्स

# नवयुगल के मध्य अच्छे संबंध, शांति, प्रेम और इच्छित संतान प्राप्ति के लिए भी वास्तु शास्त्र में कुछ नियम दिए गए हैं। सानंद जीवन व्यतीत करने के लिए नवविवाहित जोड़े को पश्चिम दिशा में बना बेडरूम देना चाहिए। 

 # गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला को कभी भी उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पूर्व में बने कमरे में नहीं सुलाना चाहिए।  साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उसके कमरे में अंधेरा न रहे तथा कमरे की दीवारों पर गहरा लाल, काला या कोई अन्य तड़क-भड़क वाला रंग न हो रहा हो। 

 # बच्चे के जन्म के बाद जच्चा और बच्चा, दोनों को पश्चिम दिशा में बने कमरे में सुलाना चाहिए। कमरे में शुद्ध हवा के लिए पूर्व या उत्तर दिशा में खिड़कियां हों। यदि कमरे में दक्षिण दिशा में खिड़कियां हों तो उन्हें बंद ही रखें या फिर सुबह कुछ समय के लिए ही खोलें। दोपहर और शाम के समय खिड़कियों को बंद ही रखें। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

महत्वपूर्ण वास्तु टिप्स

 @ दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में सोने से गृह स्वामी का वर्चस्व घर और व्यापार पर कायम रहता है। यह भी जरूरी है कि इस क्षेत्र में कोई खिड़की, दरवाजा या रोशनदान न हो।

@ एक दीवार से मिले हुए दो मकान भवन स्वामी के लिए कष्टदायी होते हैं। इसलिए हर मकान की अलग-अलग दीवार होना आवश्यक है। 

@ उत्तर दिशा में रखा गया भारी सामान बीमारियों का कारण हो सकता है। जगह की कमी होने से अगर उत्तर दिशा में सामान रखना मजबूरी हो तो दीवार से कम से कम छह इंच दूर हटाकर रख सकते हैं।

@ घर की सीढ़ियां टूटी-फूटी या असुविधाजनक नहीं होनी चाहिए अन्यथा परिवार में अशांति और कलह की संभावना बढ़ जाती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा

उपयोगी वास्तु टिप्स

## आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व कोना) का संबंध स्वास्थ्य से होता है। इसके दूषित होने से घर में बीमारियों का वास होता है। इस दिशा में पानी का कोई भी स्रोत नहीं रखना चाहिए। बीमारी से बचाव के लिए आग्नेय कोण में लाल रंग का बल्व जला सकते हैं।

## वास्तु शास्त्र के अनुसार भूखंड खरीदते समय सबसे अच्छी दिशा उत्तर-पूर्व मानी गई है, लेकिन भूखंड किसी भी दिशा में हो, यदि उस पर निर्माण कार्य वास्तु शास्त्र के आधार पर कराया जाए तो सभी दिशाएं लाभप्रद होती हैं।

## जिस कमरे में सीढ़ी शुरू या समाप्त होती है, वहां किसी भी रोगी को नहीं रखना चाहिए। वरना जल्दी फायदा नहीं होगा। 

## सोते समय पैर हमेशा ठोस दीवार की तरफ होने चाहिए। इससे प्राणिक ऊर्जा बढ़ने के साथ-साथ स्वास्थ्य भी ठीक बना रहता है। 

## सीढ़ियों के नीचे खाली जगह में शौचालय बनवाने से स्वास्थ्य समस्या और मंदिर व तिजोरी बनवाने से कई तरह की विपत्तियों का सामना करना पड़ सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार।

उपयोगी ज्योतिष टिप्स

 @ जन्म कुंडली में जब केंद्र में बृहस्पति ग्रह, उच्च के हों अथवा अपनी राशि में बैठे हों तो यह स्थिति हंस योग कहलाती है। कर्क राशि में बृहस्पति उच्च के और धनु व मीन राशि में बृहस्पति स्व राशि के माने जाते हैं। जिन लोगों की कुंडली में हंस योग होता है वे सदैव सम्मानित होते हैं और उनके कार्य की प्रशंसा भी होती है।

@ ज्योतिष के अनुसार पुष्य नक्षत्र के स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। बृहस्पतिवार और रविवार को पुष्य नक्षत्र होना अत्यंत शुभ माना जाता है। इन दोनों दिनों में कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। वहीं सोमवार, मंगलवार, बुधवार और शनिवार को पुष्य नक्षत्र का होना मध्यम फलदायी होता है। इन दिनों में भी शुभ कार्य किए जा सकते हैं।

@ शुक्रवार के दिन पुष्य नक्षत्र के होने से उत्पात नामक योग बनता है। इसलिए जब तक उत्पात योग रहे, तब तक कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा

वास्तु के अनुसार बनाएं सीढियां

  मनुष्य के लिए रहने का भवन अथवा कमरा एक ऐसा मज़बूत सुरक्षा कवच होता है, जिसमें रहते हुए वह स्वयं को निश्चिन्त और सुरक्षित महसूस करता है। वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार बने भवन अथवा कमरे में मनुष्य अपने जीवन में प्राप्त सुख-सुविधाओं का बिना किसी व्यवधान के उपभोग कर सकता है। 

* भवन निर्माण के दौरान भवन में अन्य निर्माण के साथ-साथ छत पर जाने के लिए सीढ़ियाँ भी बनवाई जाती हैं। वास्तु नियमों के अनुसार सीढ़ियाँ भवन के नैऋत्य कोण अर्थात दक्षिण-पश्चिम दिशा में ही दक्षिण से पश्चिम की ओर जाती हुईं बनवानी चाहिए। 

* सीढ़ियाँ हमेशा दाहिनी ओर ही होनी चाहिए। बायीं ओर सीढ़ियाँ बनवाना शुभ नहीं होता है। स्थान के अभाव में सीढ़ियाँ पश्चिम या उत्तर दिशा में भी बनवाई जा सकती हैं। 

* सीढ़ियाँ बनवाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि सीढ़ियों में पगतियों की संख्या सदैव विषम अर्थात पांच, सात, नौ, ग्यारह, सत्रह ही हों। 

* अगर सीढ़ियाँ घुमावदार हैं तो उनमें रेलिंग अवश्य लगवाएं। सीढ़ियों को कभी भी चिकना और त्रिकोण आकार में नहीं बनवाएं तथा सीढ़ियों के मध्य का अंतर नौ इंच से अधिक भी न रखें। 

* इस बात का भी ध्यान रखें कि भवन के मुख्य द्वार के सामने सीढ़ियाँ नहीं दिखाई देनी चाहिए। 

* वास्तु शास्त्र के अनुसार सीढ़ियों के नीचे पूजा स्थल, शयन कक्ष, बैठक अथवा शौचालय नहीं बनवाना चाहिए। भवन निर्माण के समय यदि जगह कम पड़ रही हो तो ऐसी स्थिति में सीढ़ियों के नीचे स्नानघर या स्टोर रूम बनवाने पर कोई रोक नहीं है।

* सीढ़ियों में अँधेरा रहना शुभ नहीं माना गया है, इसलिए सीढ़ियों में प्रकाश की समुचित व्यवस्था होनी आवश्यक है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा।

वास्तु दोष : कारण और निवारण

   किसी आवासीय या व्यावसायिक भवन में वास्तु दोष होना कई तरह की समस्याओं का कारण होता है, जिनका आसानी से पता लगाया जा सकता है। वास्तु दोष की जानकारी होने पर उसके निवारण के लिए उपाय भी संभव है। यहां हम कुछ ऐसे वास्तु दोषों का उल्लेख कर रहे हैं जो सामान्य रूप से जीवन में देखे अथवा अनुभव किये जाते हैं।

@@ भवन में रहने वाले लोगों का मन अशांत रहता हो अथवा उनमें नास्तिकता की भावना बढ़ रही हो तो वहां उत्तर-पूर्व यानी ईशान दिशा दोषपूर्ण हो सकती है। निवारण के लिए इस दिशा को खाली और साफ़ रखना चाहिए तथा इस दिशा में सरस्वती यंत्र सिद्ध करके स्थापित कर देना चाहिए।

@@ भवन में आए दिन आग लगने की घटनाएं हों अथवा अकारण ही वहां के सदस्यों में क्लेश या वाद-विवाद होता हो तो दक्षिण-पूर्व यानी आग्नेय दिशा दोषपूर्ण हो सकती है। उपाय के लिए इस दिशा में वास्तु दोष निवारण यंत्र सिद्ध करके शुक्ल पक्ष के मंगलवार को स्थापित कर देना चाहिए। इस दिशा में कभी भी पानी का कोई स्रोत न रखें। एक साथ पानी और अग्नि को भी इस दिशा में नहीं रखना चाहिए।

@@  परिवार के सदस्यों में यदि आलस्य और नींद न आने की समस्या दिखाई दे रही हो तो, आय से अधिक खरचा हो तथा प्रयासों के बावजूद आय के स्थाई साधन न बन पा रहे हों तो इसका कारण उत्तर दिशा का दक्षिण दिशा से अधिक ऊंचा होना अथवा अन्य दोष होना हो सकता है। निवारणार्थ उत्तर दिशा को साफ़ रखें और श्री यंत्र को सिद्ध करके स्थापित करें वहीँ, सदैव दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने की आदत डालें।

@@ बनते हुए कामों में रुकावट आना तथा टोना-टोटका या बुरी आत्माओं का असर बने रहना भवन के ब्रह्म स्थल के भारी एवं दोषपूर्ण होने की वजह हो सकता है। इसलिए भवन के इस अत्यंत महत्वपूर्ण भाग को हमेशा खाली, साफ़ एवं खुला रखना ही श्रेष्ठ उपाय है। ब्रह्म स्थल में तुलसी जी को रखना और नियमित रूप से जल चढ़ाकर दीपक जलाना भी वास्तु दोष के  निवारण का  आसान तरीका है।

@@ अगर भवन में अक्सर चोरी की घटनाएं होती हैं तो इसका कारण दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य दिशा का खुला या नीचा होना माना जाता है। इस दोष के निवारण के लिए इस दिशा को बंद रखते हुए सिद्ध किया हुआ राहु यंत्र स्थापित करने से सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

सोमवार, 9 सितंबर 2024

वास्तु के अनुसार देव पूजा के लिए स्थान

जीवन में सुख, शांति, संपन्नता और रोगों से छुटकारा पाने के लिए हम सभी अपने-अपने तरीके से पूजा-पाठ, जप, तप, मंत्र जप, यज्ञ, दान आदि द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करके उनकी कृपा पाने की कोशिश करते हैं, परंतु कई बार निरंतर प्रयासों के बाद भी अपेक्षित लाभ नहीं मिलता, तब जीवन में निराशा और नकारात्मकता हावी होने लगती है तथा ईश्वर भक्ति से मन विचलित होने लगता है। इसका कारण देव पूजा स्थल का उचित दिशा में वास्तु के अनुरूप न होना भी हो सकता है।

     कहा ये जाता है कि ईश्वर सर्वत्र विद्यमान हैं, लेकिन वास्तु शास्त्र में देव पूजा के लिए अलग-अलग दिशाओं को महत्व दिया गया है। वहीँ धार्मिक कार्यों के निष्पादन में सदैव पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना ही उचित माना गया है। वास्तु नियमों के अनुसार अगर हम देव पूजा स्थल के उद्देश्य से दिशाओं पर चर्चा करें तो पूर्व दिशा में सूर्योदय होने से यह दिशा सूर्य देव तथा सूर्यवंशी प्रभु श्री राम की पूजा के लिए उत्तम है। इस दिशा में श्री राम दरबार का चित्र लगाकर पूजा की जा सकती है। पश्चिम दिशा का संबंध बृहस्पति यानि गुरु से होता है, इसलिए यहां अपने आराध्य एवं आध्यात्मिक, धार्मिक अथवा शैक्षिक गुरु की पूजा का स्थल बनाया जा सकता है।

   उत्तर दिशा को कुबेर की दिशा कहा गया है। अतः इस दिशा में धन की देवी महालक्ष्मी और बुद्धि प्रदाता श्री गणेश जी का पूजा स्थल शुभ फलदायी होता है। उत्तर दिशा के महत्व को देखते हुए ही धन वृद्धि के लिए धन रखने वाली अलमारी या तिजोरी का मुख उत्तर दिशा में ही खुलने को उचित माना जाता है। दक्षिण दिशा में महाकाली या पवन पुत्र हनुमान जी की पूजा के लिए स्थल बनाया जा सकता है। माना जाता है कि दक्षिणमुखी हनुमान जी की आराधना करने से सभी प्रकार के रोग, समस्याओं और कष्टों से छुटकारा मिलने लगता है।

    उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण को घर या व्यापारिक स्थल पर मंदिर या पूजा स्थल बनाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान माना जाता है। यह दिशा भगवान शिव और पंच देवोँ की पूजा के लिए श्रेष्ठ है। कुलदेवी की पूजा के लिए उत्तर-पश्चिम दिशा अर्थात वायव्य कोण निर्धारित किया गया है। यहां अपने कुल की देवी की स्थापना करके उनकी पूजा-अर्चना की जा सकती है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

रंगों का असर और स्वास्थ्य

 जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में सात रंगों का समन्वय होता है, उसी तरह मनुष्य के शरीर में भी सात रंगों की किरणें निश्चित अनुपात में रहती हैं। सौर मंडल में मौजूद विभिन्न ग्रहों से उत्सर्जित होने वाली अंतरिक्ष की चुंबकीय अल्ट्राकॉस्मिक किरणों के प्रभाव से यदि किसी रंग की किरणों की सक्रियता असंतुलित हो जाती है तो शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते हैं। 


   प्राकृतिक चिकित्सा के अंतर्गत सौर मंडल में मौजूद ग्रहों से निकलने वाली किरणों के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए रोगों के उपचार पर बल दिया गया है। इसके लिए रोग की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग रंग की कांच की बोतलों में तीन चौथाई भाग तक जल भरकर व सूर्य की रौशनी में रखकर सूर्य-तापित जल तैयार कर रोगी को पिलाया जाता है। 


    शरीर में जिस ग्रह की कॉस्मिक रश्मियों की कमी हो, उस ग्रह से संबंधित रत्न की भस्म या जल के रूप में औषधि तैयार कर रोगी को दी जाती है। इसके अलावा रोगी की कुंडली के विश्लेषण के बाद उचित रत्न धारण कराने से भी रोग निवारण में मदद मिलती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा।

उपयोगी वास्तु टिप्स (8)

 @ वास्तु शास्त्र के अनुसार घरों में उत्तर, पूर्व और उत्तर-पूर्व दिशाओं में घास या छोटे पौधे लगाए जा सकते हैं। जलीय व ठंडक देने वाले पौधे दक्षिण व दक्षिण-पूर्व दिशा में लगा सकते हैं। जबकि बड़े वृक्षों के लिए दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा श्रेष्ठ मानी गई है।

@ घरों में काम न आने वाले सामान को कबाड़ घर में रखा जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार कबाड़ घर हमेशा दक्षिण-पश्चिम विदिशा (नैऋत्य कोण) में या उसके नज़दीक ही बनाना चाहिए। उत्तर व पूर्व दिशा, ईशान कोण या आग्नेय कोण में भूल कर भी कबाड़ नहीं रखना चाहिए। कबाड़ घर में सोना, पूजा घर बनाना और दीवारों पर देवी-देवता की तस्वीर लगाना दोषपूर्ण होता है।

@ किसी भी भवन में दक्षिण दिशा की तुलना में उत्तर दिशा में अधिक खाली जगह छोड़नी चाहिए। इसी तरह पश्चिम दिशा की अपेक्षा पूर्व दिशा में भी अधिक खाली जगह छोड़नी चाहिए। इसके विपरीत होने पर वास्तु दोष होता है और इससे जीवन में समस्याएं और कष्ट का सामना करना पड़ता है।-प्रमोद कुमार अग्रवाल, लेखक एवं सलाहकार, आगरा

उपयोगी वास्तु टिप्स (7)

##  छत पर रखी जाने वाली पानी की टंकी को दक्षिण-पश्चिम या पश्चिम क्षेत्र में एक प्लेटफार्म बनाकर ही रखना चाहिए और इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि टंकी का पानी ओवरफ्लो या लीक न हो। अन्यथा आर्थिक नुकसान की संभावना बनी रहेगी।

## किचन में गैस दक्षिण-पूर्व विदिशा यानि आग्नेय कोण में हो। साथ ही भोजन बनाते समय महिला का मुख पूर्व दिशा में रहे। दक्षिण दिशा में मुख करके भोजन बनाने से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

## जिन लोगों की जन्म कुंडली में राहु अशुभ फल दे रहा हो, उन्हें आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व विदिशा) में बनी किचन में बैठ कर भोजन करना चाहिए।

## मकान की उत्तर-पूर्व विदिशा (ईशान कोण) में पति-पत्नी को नहीं सोना चाहिए। वास्तु के अनुसार यह स्थिति दोनों में से किसी की बीमारी का कारण बन सकती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

उपयोगी वास्तु टिप्स (6)

 @ घर में वाहन की पार्किंग या पशुओं को बांधने के लिए उत्तर-पश्चिम कोण या विदिशा सही मानी गई है। कभी भी  उत्तर-पूर्व दिशा में पार्किंग नहीं रखनी चाहिए।

@ वास्तु शास्त्र के अनुसार नए घर में प्रवेश करने से पहले वास्तु पूजन आवश्यक है। वास्तु पूजा करवाए बिना नए घर में प्रवेश करने से अनेक रोग व कष्टों का सामना करना पड़ सकता है।

@ किचन में दक्षिण-पश्चिम दिशा में खाना पकाने के लिए गैस का चूल्हा, स्टोव, अंगीठी, ओवन, इलेक्ट्रिक चूल्हा आदि का होना वास्तु दोष है। इसके कारण घर में रहने वाली महिलाओं का स्वास्थ्य खराब होने की संभावना बनी रहती है। यदि ऐसा है तो किचन में चूल्हा आदि को दक्षिण-पूर्व दिशा (आग्नेय कोण) की तरफ शिफ्ट कर देना चाहिए।--प्रमोद कुमार अग्रवाल, वास्तु आचार्य एवं लेखक, आगरा। 

उपयोगी वास्तु टिप्स (5)

 # वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन के मुख्य द्वार पर जुड़वां मछलियों का चित्र बनाने या फिर जुडवां मछलियां लटकाने से परिवार में सुख व समृद्धि बनी रहती है।

# घर की उत्तर-पूर्व दिशा को महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिशा में भूमिगत जल स्रोत, बरामदा, पूजा घर, मंदिर, पोर्टिको, खुली जगह, बेसमेंट, बालकनी आदि बनवा सकते हैं। लेकिन इस दिशा में कोई भी भारी निर्माण, लैट्रिन, दीवार, सीढ़ी आदि के होने से धन, स्वास्थ्य व संतान संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

# घर के किसी भी कमरे में युद्ध के फोटो, इंद्रजाल के समान काल्पनिक फोटो, राक्षस, पहाड़ व जंगल के फोटो, नग्न या रोते हुए बच्चे, महिला व पुरुष के फोटो, हिंसक व जंगली जानवरों के फोटो अथवा गरीबी या भयानक स्थिति को दर्शाने वाले फोटो कभी भी नहीं लगाने चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, वास्तु आचार्य एवं लेखक,आगरा।

उपयोगी वास्तु टिप्स (4)

 @ भवन के प्रवेश द्वार पर हल्दी और चावल के आटे की पीठी से हाथ को मांगलिक चिंह के रूप में छापा जाता है। हाथ कर्म का प्रतीक है जबकि हाथ की चारों अंगुलियां व अंगूठा पंच तत्वों (जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी व आकाश) का द्योतक है। माना जाता है कि इससे घर में सुख, शांति, आरोग्य और आपसी सद्भाव बना रहता है। 

@ किसी भी जमीन में पूर्व और उत्तर दिशाओं में ढलान का होना उत्तम माना जाता है। दक्षिण व पश्चिम दिशा की तरफ जमीन में ढलान होने से रोग, धन का अपव्यय, अशांति व कलह होने की संभावना बनी रहती है।

@ प्राचीन काल से ही स्वास्तिक का प्रयोग मांगलिक चिह्न के रूप में किया जाता रहा है। यह गणेश जी के लिप्यात्मक स्वरूप के अलावा चारों दिशाओं का प्रतीक भी है। मकान के मुख्य द्वार के दोनों ओर शुद्ध घी व सिंदूर मिलाकर स्वास्तिक चिह्न बनाने से वहां नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है और परिवार में सुख-समृद्धि व शांति बनी रहती है।-वास्तु आचार्य एवं लेखक प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।

उपयोगी वास्तु टिप्स (3)

# भवन की दक्षिण-पश्चिम दिशा में बना हुआ शयन कक्ष भवन स्वामी के लिए शुभ रहता है। जबकि पश्चिम दिशा में बना हुआ शयन कक्ष टूरिंग का काम करने वाले भवन स्वामी के लिए अच्छा माना जाता है।

# किसी भी दुकान, ऑफिस अथवा व्यापारिक स्थल में बैठते समय अपना मुख उत्तर पूर्व दिशा की तरफ रखना चाहिए। इसके साथ-साथ आलमारी, फर्नीचर, रिकॉर्ड, भारी सामान आदि हमेशा पश्चिम व दक्षिण दिशा में ही रखना चाहिए। ऐसा करने से आर्थिक लाभ की स्थिति बनती है और आश्चर्यजनक प्रगति देखने को मिलती है।

# किराये के मकान में वास्तु के अनुसार बदलाव करना संभव नहीं होता। इसलिए जहां तक संभव हो मंदिर ईशान कोण में, गैस चूल्हा आग्नेय कोण में, भारी सामान दक्षिण पश्चिम में और पलंग का सिरहाना दक्षिण या पश्चिम दिशा में रखना चाहिए। एक कमरे के मकान में भी यही व्यवस्था करने से बहुत सी समस्याओं का समाधान होता है।- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्याोतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

उपयोगी वास्तु टिप्स (2)

 # वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के अंदर पूर्व या उत्तर दिशा में बाथरूम (केवल नहाने के लिए), लैट्रीन (शौचालय) पश्चिम या वायव्य कोण से हटकर उत्तर में या दक्षिण दिशा में बनवा सकते हैं। बाथरूम व लैट्रीन, दोनों एक साथ पश्चिमी वायव्य कोण व पूर्वी आग्नेय कोण में बनाए जा सकते हैं।

# वास्तु शास्त्र के अनुसार पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश को पंचतत्व माना गया है। इनमें से जल जीवन का अमृत है। जल का दान करना शुभ होता है। इसलिए जितना संभव हो, जल का दान करते रहें।

# घर की उत्तर-पूर्व दिशा में बने फर्श का दक्षिण-पश्चिम में बने फर्श से कुछ ऊंचा होना वास्तु दोष है। इस दोष से बचने के लिए दक्षिण-पश्चिम के फर्श को ऊंचा कराएं अथवा पश्चिम दिशा के कोने में एक चबूतरा बनवाएं।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा।

उपयोगी वास्तु टिप्स (1)

 # किसी भवन के नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम कोना), आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व कोना) और वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम कोना) की दिशा में गड्ढा या कुआं नहीं होना चाहिए। ऐसा होने से उस भवन में रहने वाले लोगों में आपसी कलह और अशांति बनी रहती है।

# अगर किचन आग्नेय कोण के अलावा किसी दूसरी जगह है तो किचन में गैस या स्टोव आदि को आग्नेय कोण में रखें और रात में किचन की सफाई के बाद उत्तर दिशा की दीवार के पास तांबे के लोटे में पानी भरकर रखें। दूसरे दिन यानि सुबह उस पानी को पौधों में डाल दें। 

# मकान में अगर अनाज या खाद्य पदार्थ रखने के लिए अलग से स्टोर बनाना हो तो, उत्तर-पश्चिम विदिशा (वायव्य कोण) शुभ होती है। इससे घर में अन्न आदि की कमी नहीं रहती। ऐसे स्टोर को कभी भी खाली नहीं छोड़ना चाहिए बल्कि स्टोर में थोड़ा बहुत अन्न या अन्य खाद्य पदार्थ अवश्य रखने चाहिए। ---- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा

वास्तु और स्वास्थ्य

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी वास्तु के नियम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जिस वास्तु में किचन, टॉयलेट, मास्टर बेडरूम और सीढ़ियों की स्थिति वास्तु नियमों के विपरीत होती है, ईशान कोण दोषपूर्ण होता है एवं उत्तर व पूर्व दिशा की तुलना में दक्षिण दिशा अधिक नीची होती है, वहां रहने वाले लोगों का स्वास्थ्य किसी न किसी रूप में प्रभावित होता है। 

   शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए यह आवश्यक है कि वास्तु दोषमुक्त हो। अगर जगह की कमी के कारण या किसी अन्य कारण से वास्तु दोष बना हुआ है तो किसी योग्य एवं अनुभवी वास्तु विशेषज्ञ से संपर्क करके वास्तु दोषों का निवारण करा लेना चाहिए। क्योंकि लंबे समय तक दोषपूर्ण वास्तु में रहने से आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बढ़ने की संभावना बनी रहती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, वास्तु आचार्य, आगरा।

गुरुवार, 5 सितंबर 2024

बारिश के मौसम में त्वचा पर संक्रमण का खतरा

बारिश के मौसम में वायरल बुखार के साथ ही त्वचा रोग के मरीजों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हो गई है। इनमें ज्यादातर को त्वचा में दाने, लाली, खुजली और जलन की समस्या है। त्वचा संक्रमण का इलाज नहीं कराने पर रोग गंभीर रूप ले सकता है। 

    एसएन मेडिकल कॉलेज के त्वचा रोग विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर यतेंद्र चाहर ने बताया कि त्वचा में संक्रमण का कारण मौसम में नमी का होना है। नमी की वजह से कपड़ों पर फंगस और जीवाणु पनप रहे हैं। इससे बचने के लिए कपड़ों को सीधी धूप में सुखाना चाहिए। धूप नहीं निकल रही हो तो कपड़ों पर प्रेस करके सुखाने के बाद ही पहनना चाहिए। तंग कपड़े पहनकर न रहें। 
   डॉक्टर चाहर ने बताया कि बारिश के मौसम में त्वचा रोगों से बचने के लिए कभी भी गीले कपड़े व जूते नहीं पहनें। गीले कपड़े बदलकर तुरंत सूती कपड़े पहनकर बैठें। अपने कपड़े, हेयरब्रश, मौजे व जूते आदि किसी से भी शेयर नहीं करें। बालों को धोने के बाद अच्छे से सूखने के बाद ही बांधकर। नहाते समय अपने नाखूनों और नाखूनों के नीचे के हिस्से को अच्छी तरह साफ करें। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल (न्यूज़लाइन ब्यूरो)

मालगाड़ियों से बढ़ रही है आगरा के व्यापार की रफ्तार

   आगरा (प्रमोद कुमार अग्रवाल)। मालगाड़ियों की तेज गति और संख्या में बढ़ोत्तरी होने से आगरा मंडल के व्यापार की रफ्तार को पंख लग रहे हैं। पिछ...