मनुष्य के लिए रहने का भवन अथवा कमरा एक ऐसा मज़बूत सुरक्षा कवच होता है, जिसमें रहते हुए वह स्वयं को निश्चिन्त और सुरक्षित महसूस करता है। वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार बने भवन अथवा कमरे में मनुष्य अपने जीवन में प्राप्त सुख-सुविधाओं का बिना किसी व्यवधान के उपभोग कर सकता है।
* भवन निर्माण के दौरान भवन में अन्य निर्माण के साथ-साथ छत पर जाने के लिए सीढ़ियाँ भी बनवाई जाती हैं। वास्तु नियमों के अनुसार सीढ़ियाँ भवन के नैऋत्य कोण अर्थात दक्षिण-पश्चिम दिशा में ही दक्षिण से पश्चिम की ओर जाती हुईं बनवानी चाहिए।
* सीढ़ियाँ हमेशा दाहिनी ओर ही होनी चाहिए। बायीं ओर सीढ़ियाँ बनवाना शुभ नहीं होता है। स्थान के अभाव में सीढ़ियाँ पश्चिम या उत्तर दिशा में भी बनवाई जा सकती हैं।
* सीढ़ियाँ बनवाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि सीढ़ियों में पगतियों की संख्या सदैव विषम अर्थात पांच, सात, नौ, ग्यारह, सत्रह ही हों।
* अगर सीढ़ियाँ घुमावदार हैं तो उनमें रेलिंग अवश्य लगवाएं। सीढ़ियों को कभी भी चिकना और त्रिकोण आकार में नहीं बनवाएं तथा सीढ़ियों के मध्य का अंतर नौ इंच से अधिक भी न रखें।
* इस बात का भी ध्यान रखें कि भवन के मुख्य द्वार के सामने सीढ़ियाँ नहीं दिखाई देनी चाहिए।
* वास्तु शास्त्र के अनुसार सीढ़ियों के नीचे पूजा स्थल, शयन कक्ष, बैठक अथवा शौचालय नहीं बनवाना चाहिए। भवन निर्माण के समय यदि जगह कम पड़ रही हो तो ऐसी स्थिति में सीढ़ियों के नीचे स्नानघर या स्टोर रूम बनवाने पर कोई रोक नहीं है।
* सीढ़ियों में अँधेरा रहना शुभ नहीं माना गया है, इसलिए सीढ़ियों में प्रकाश की समुचित व्यवस्था होनी आवश्यक है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा।
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