सोमवार, 28 जून 2021

प्राकृतिक आपदाएं और ज्योतिष

 अति वर्षा, सूखा, भूकम्प, भूस्खलन, बाढ़, तूफ़ान, अकाल, दुर्भिक्ष आदि ऐसी प्राकृतिक आपदाएं हैं जो भयावह रूप में अपने साथ जन-धन की हानि लेकर आती हैं। यद्यपि इनपर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं होता फिर भी इनका पूर्व अनुमान लगने पर नुक्सान को कम करने के लिए बचाव के उपाय तो किये ही जा सकते हैं। इन आपदाओं में भूकंप सर्वाधिक क्षतिकारक है जिसे रोकने के लिए वैज्ञानिक निरंतर प्रयत्नशील हैं। अभी पिछले दिनों भारत सहित विश्व के अनेक देशों को भूकंप की मार झेलनी पड़ी थी। ज्योतिष शास्त्र में भी भूकंप के संबंध में अलग से साहित्य है जिसका अध्ययन मेदनीय ज्योतिष के अंतर्गत किया जाता है।

    वैदिक ज्योतिष के प्राचीन विद्वान मनीषियों ने अपने ग्रंथों में भूकंप के संबंध में अनेक महत्वपूर्ण सिद्धांतों का विवेचन किया है। इन ग्रंथों में हैं गर्ग संहिता, नारदीय संहिता और बृहत्संहिता। वैज्ञानिक शोध से यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा भचक्र परिक्रमा की अपनी स्वाभाविक स्थिति में जब शून्य अंश से एक सौ अस्सी अंश का कोण बनाते हैं तो पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति के दबाव में वृद्धि होने से पृथ्वी की स्वाभाविक परिभ्रमण गति परिवर्तित होने लगती है जिसे पृथ्वी की भीतरी सतह में मौजूद टेक्टॉनिक पर्तों की अपने स्थान से सरकने और अपार ऊर्जा उत्पन्न होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं जो भूकंप का कारण बनती हैं।

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सौरमंडल में स्थित नवग्रहों का नक्षत्रों के साथ गहरा संबंध होता है। प्रत्येक राशि में सवा दो नक्षत्र का मान निर्धारित है। वहीँ चंद्र ग्रह को समस्त सत्ताईस नक्षत्रों का राजा माना गया है। ग्रह और नक्षत्रों की स्थिति के सूक्ष्म विश्लेषण से भूकंप जैसी आपदाओं का पूर्व अनुमान लगाया जा सकता है।

   ज्योतिष के क्षेत्र में भूकंप के संबंध में किये गए अनुसंधानों के आधार पर यह स्वीकार किया गया है कि सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण भी भूकंप से किसी न किसी रूप में संबंध रखते हैं। जिन क्षेत्रों में ये ग्रहण देखे जाते हैं, वहां भूकंप आने की संभावनाएं अन्य स्थानों की अपेक्षा कहीं ज्यादा होती हैं।

    महर्षि गर्ग की संहिता में यह मत व्यक्त किया गया है कि हर माह अमावस्या तिथि को एवं इससे दो तिथि पहले अर्थात कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी व चतुर्दशी तथा दो तिथि बाद में अर्थात शुक्ल पक्ष की एकादशी एवं द्वादशी और पूर्णिमा तिथि को तथा इससे दो तिथि पहले अर्थात शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी व चतुर्दशी को एवं दो तिथि बाद में अर्थात कृष्ण पक्ष की एकादशी व द्वादशी तिथियों में भूकंप आने की संभावनाएं अधिक रहती हैं। इसी प्रकार शनि ग्रह तथा भूमध्य रेखा की दूरी की एक निश्चित डिग्री में ग्रहों की जो स्थिति होती है, वह भी भूकंप आने की संभावना को व्यक्त करती है।

   जब सूर्य ग्रह कर्क, तुला और मकर राशियों की कक्षाओं में प्रवेश करता है, क्रूर ग्रह प्रभावी रहते हैं या वृष एवं वृश्चिक राशियों में सभी ग्रह स्थित होते हैं अथवा चंद्र एवं बुध ग्रह एक ही नक्षत्र में आ जाते हैं अथवा चंद्रमा पीड़ित अवस्था में रहता है तब भी भूकंप का असर देखने को मिलता है। - प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा   

My article published in Daily Ujala, Agra on 21 June, 2021


 

बुधवार, 16 जून 2021

My published article

दिनांक 17 जून, 2021 (बृहस्पतिवार) को दैनिक 'अमर उजाला' में प्रकाशित मेरा आलेख: प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा।


 

आध्यात्मिक जीवन के लिए ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य

हमारे देश में प्राचीन काल से ही ब्रह्मचर्य का पालन करने पर जोर दिया गया है। ज्ञान की वैदिक पद्धति में तो विद्यार्थियों के लिए यह नियम सुनिश्चित किया गया था कि वे गुरुकुल में रहकर पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरु जी से ज्ञान और शिक्षा प्राप्त करें। जिससे कि उनका शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास हो सके। 
   आज के समय में गुरुकुल पद्धति से शिक्षा बहुत कम स्थानों पर ही देखने को मिलती है। वहां विद्यार्थी ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं या नहीं, यह भी सुनिश्चित नहीं होता। लेकिन यह सुनिश्चित है कि विद्यार्थियों में आध्यात्मिक ज्ञान और उन्नति के लिए ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरु जी के सानिध्य में शिक्षा प्राप्त करने से जीवन में आसानी से सफलता हासिल की जा सकती है, इस बात में किसी को भी कोई संदेह नहीं होना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

बंद न करें पूर्व दिशा को

 वास्तु शास्त्र में पूर्व दिशा को अग्नि तत्व वाली माना गया है। यह दिशा पितृ स्थान भी कहलाती है। इसलिए इस दिशा को हमेशा खुला व स्वच्छ रखना चाहिए। इस दिशा के बंद करने से शारीरिक व मानसिक रोग, मान-सम्मान को हानि, बनते कार्यों में रुकावट, पितृ दोष और कर्जा चढ़ने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

मंगलवार, 15 जून 2021

ज़मीन के ऊंची व नीची होने का प्रभाव

 वास्तु शास्त्र के अनुसार, पूर्व दिशा में ज़मीन का ऊंची होना पुत्र संतान के लिए घातक होता है। वहीं दक्षिण-पूर्व दिशा यानि आग्नेय कोण में ज़मीन के नीची होने से धन की बरबादी होती है। दक्षिण दिशा में ज़मीन के ऊंची होने से महिला सदस्यों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। दक्षिण-पश्चिम दिशा यानि नैऋत्य कोण में ऊंची ज़मीन धन-धान्य में वृद्धि करने वाली मानी गई है। वहीं पश्चिम दिशा में ऊंची ज़मीन पुत्र संतान प्राप्ति में शुभ फलदायी होती है। 

  उत्तर-पश्चिम दिशा यानि वायव्य कोण में ज़मीन के ऊंची होने से धन की हानि होती है। जबकि उत्तर-पूर्व दिशा यानि ईशान कोण में ऊंची ज़मीन घर-परिवार में कलह कराती है। सुख, समृद्धि और शांति के लिए यह आवश्यक है कि निर्माण कराते समय दिशा के अनुसार ज़मीन को ऊंची या नीची रखने पर अवश्य ध्यान दिया जाए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

मकान में लकड़ी का उपयोग

 मकान बनवाते समय उसमें नीम, आम, गूलर, पाकड़, बहेड़ा, सेहुड़, सहजन, कैथ, पीपल, ताड़, इमली, अगस्त, कांटेदार और जले हुए वृक्ष की लकड़ी का उपयोग नहीं करना चाहिए। समरांगण ग्रंथ में ऐसा करना निंदनीय माना गया है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

रविवार, 13 जून 2021

ज्योतिष के अठारह आचार्य

 सृष्टि के रचियता ब्रह्मा जी को ज्योतिष शास्त्र का प्रथम आचार्य माना जाता है। ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र वशिष्ठ को ज्योतिष ज्ञान दिया था। वहीं सूर्य द्वारा पवनसुत हनुमान जी को ज्योतिष सहित समस्त विद्याओं का ज्ञान दिए जाने का उल्लेख मिलता है। 

   ज्योतिष शास्त्र के अठारह प्रवर्तक हुए हैं, जो इस प्रकार हैं: सूर्य, ब्रह्मा, व्यास, वशिष्ठ, अत्रि, पराशर, कश्यप, नारद, गर्ग, मरीचि, मनु, अंगिरा, लोमश, पौलिश, च्यवन, यवन, भृगु और शौनक। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

भक्ति योग से मिलते हैं भगवान

 भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भी मनुष्य पूर्ण श्रृद्धा भाव के साथ उनकी भक्ति करता है, उन्हें प्रेम से पुष्प, फल, तुलसी दल, जल, भोजन आदि अर्पित करने के बाद खुद ग्रहण करता है और संसार के हर प्राणि के अंदर मुझे महसूस करता है, वही मेरा सच्चा भक्त है। मृत्यु के बाद ऐसा भक्त आध्यात्मिक आकाश में मुझे प्राप्त करके बार-बार जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त हो जाता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

पढ़ाई के लिए भी हैं वास्तु नियम

 पढ़-लिख कर अच्छी नौकरी या अपना खुद का व्यवसाय करने का सपना हर व्यक्ति का होता है, जिसे पूरा करने के लिए वह जीवन भर प्रयास भी करता है। परन्तु कई बार पढ़ने का कमरा या पढ़ने की मेज गलत दिशा में होने के कारण अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता है। वास्तु शास्त्र में विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं में लगे व्यक्तियों के लिए कुछ ऐसे नियमों का उल्लेख मिलता है जिनका पालन करके वे उचित परिश्रम करके सही समय पर सही लाभ उठा सकते हैं।

  वास्तु नियमों के अनुसार बच्चों के पढ़ने का कमरा यानी अध्ययन कक्ष उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा में इस प्रकार होना चाहिए कि पढ़ाई करते समय चेहरा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रहे। शौचालय के पास पढ़ने का कमरा कभी नहीं होना चाहिए। पढ़ाई हेतु कमरे में पुस्तकों की रैक या आलमारी पूर्व या उत्तर दिशा में होनी चाहिए। 

   अगर जगह की कमी के कारण बेड रूम में पढ़ाई करनी हो तो पढ़ने वाली मेज, लाइब्रेरी और रैक पश्चिम या दक्षिण-पश्चिम दिशा यानि नैऋत्य में हो, लेकिन पढ़ते समय चेहरा पूर्व या उत्तर दिशा में ही हो। ड्रॉइंग रूम में पढ़ाई करने वालों को अपनी मेज, कुर्सी आदि ईशान, उत्तर या उत्तर वायव्य कोण में ही रखना आवश्यक है, जबकि रैक पश्चिम या दक्षिण दिशा में रखनी चाहिए। मेज पर टेबल लैंप हमेशा मेज के दक्षिण-पूर्व दिशा में ही रखना चाहिए।

  अनुभव से यह ज्ञात हुआ है कि प्रशासनिक सेवा, शिक्षा, रेलवे आदि सेवाओं की तैयारी करने वालों को पूर्व दिशा में ही अपने लिए पढ़ाई हेतु स्थान का चयन करना चाहिए। मेडिकल, क़ानून, टेक्नीकल, कंप्यूटर आदि क्षेत्रों से जुड़े लोगों को अपना पढ़ाई का कमरा दक्षिण दिशा में रखना चाहिए। एकाउंट, संगीत, गायन, बैंक, व्यापार प्रबंधन आदि की तैयारी करने वालो को अपनी पढ़ाई के लिए 

   उत्तर दिशा में व्यवस्था करनी चाहिए जबकि रिसर्च, साहित्य, इतिहास, दर्शन शास्त्र एवं दूसरे गंभीर विषयों की तैयारी करने वालों को पश्चिम दिशा में ही अपने लिए पढ़ाई का कमरा रखना चाहिए। वास्तु के अनुसार पढ़ाई का कमरा व्यवस्थित करने से मानसिक एकाग्रता में वृद्धि होती है तथा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता मिलती है।

   पढ़ाई करने वाले बच्चों और युवाओं को पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सोना चाहिए। पढ़ने की मेज पर उत्तर-पूर्व या ईशान कोण में भगवान गणेश, सरस्वती, हनुमान अथवा अपने ईष्ट देवी देवता का चित्र लगाना और पढ़ाई से पूर्व उन्हें करबद्ध प्रणाम करना शुभ होता है। पढ़ने के कमरे की दीवारों पर हल्का पीला, हल्का गुलाबी या हल्का हरा रंग हो तो बुद्धि, ज्ञान, स्फूर्ति और स्मरण शक्ति में वृद्धि होने लगती है।

   जिस कमरे या स्थान को पढ़ाई के लिए प्रयोग किया जाता हो वहां कभी भी शराब, मांसाहार, धूम्रपान अथवा नशीले पदार्थों का सेवन या कोई दूसरा गलत कार्य नहीं करना चाहिए अन्यथा बुद्धि भ्रष्ट होने लगती है। पढ़ाई करते समय मन एकाग्र रहे, इसके लिए कमरे में गुलाब या चंदन की धूपबत्ती या अगरबत्ती जलाना अच्छा रहता है। पढ़ने वाली मेज को दीवार से सटाकर रखना वास्तु दोष माना गया है। सोने के बिस्तर पर बैठकर या लेटकर पढ़ाई करना भी उचित नहीं है। पढ़ने वाली मेज पर ग्लोब या तांबे का पिरामिड रखने से भी पढ़ने में मन लगता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। - प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

सेहत के लिए प्राणायाम

   समस्त प्राणियों के शरीर में फेफड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनकी मदद से वे सांस लेने और छोड़ने का काम करते हैं। यह प्रक्रिया स्वत: ही होती रहती है। मेडिकल साइंस के अनुसार फेफड़ों में स्पंज के समान लगभग सात करोड़ तीस लाख कोष्ठ होते हैं।

   सांस लेने और छोड़ने की सामान्य गति के दौरान इनमें से केवल दो करोड़ कोष्ठ ही सक्रिय रहते हैं। शेष कोष्ठों का श्वसन क्रिया में कोई योगदान नहीं होता। कोष्ठों की इस निष्क्रियता के कारण खांसी, तपेदिक, अस्थमा, सांस लेने के दौरान परेशानी होने लगती है। 

   फेफड़ों के समस्त कोष्ठों की सक्रियता के लिए प्राणायाम की आवश्यकता होती है। नियमित रूप से प्राणायाम करने के दौरान फेफड़ों में वायु का प्रवाह और उत्सर्जन सुचारू रूप से होने लगता है, फेफड़ों की कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती तथा शरीर में ऑक्सीजन के स्तर में वृद्धि होने से शरीर के अंदर से धीरे-धीरे बीमारियां बाहर होकर तन और मन सेहतमंद होने लगते हैं। इसलिए अपनी क्षमता के अनुसार प्राणायाम अवश्य करना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

बुधवार, 9 जून 2021

स्वास्थ्य के लिए रंगों की महत्ता

  जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में सात रंगों का समन्वय होता है, उसी तरह मनुष्य के शरीर में भी सात रंगों की किरणें निश्चित अनुपात में रहती हैं। सौर मंडल में मौजूद विभिन्न ग्रहों से उत्सर्जित होने वाली अंतरिक्ष की चुंबकीय अल्ट्राकॉस्मिक किरणों के प्रभाव से यदि किसी रंग की किरणों की सक्रियता असंतुलित हो जाती है तो शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते हैं। 

   प्राकृतिक चिकित्सा के अंतर्गत सौर मंडल में मौजूद ग्रहों से निकलने वाली किरणों के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए रोगों के उपचार पर बल दिया गया है। इसके लिए रोग की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग रंग की कांच की बोतलों में तीन चौथाई भाग तक जल भरकर व सूर्य की रौशनी में रखकर सूर्य-तापित जल तैयार कर रोगी को पिलाया जाता है। 

   शरीर में जिस ग्रह की कॉस्मिक रश्मियों की कमी हो, उस ग्रह से संबंधित रत्न की भस्म या जल के रूप में औषधि तैयार कर रोगी को दी जाती है। इसके अलावा रोगी की कुंडली के विश्लेषण के बाद उचित रत्न धारण कराने से भी रोग निवारण में मदद मिलती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

दिव्य दृष्टि पाने के लिए आराधना

  अगर सच्ची श्रृद्धा, विश्वास, पवित्रता और विधि विधान से भगवान गणेश, भगवान शंकर, भगवान विष्णु, देवी महाकाली, देवी महालक्ष्मी, देवी सरस्वती और सूर्य देव की निरंतर आराधना एवं साधना की जाए तो साधक दिव्य दृष्टि प्राप्त कर सकता है। 

   दिव्य दृष्टि प्राप्त साधक किसी व्यक्ति के बारे में कुंडली या हस्तरेखा देखे बिना भी सही-सही फलकथन कर सकता है। इस बात का प्रमाण हैं दिव्य दृष्टि प्राप्त ज्योतिषाचार्य नारद, वसिष्ठ, वेदव्यास, अगस्त्य मुनि और गर्ग, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे जातक के बारे में बिना कुछ देखे सटीक फलकथन कर दिया करते थे।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट इलाहाबाद के महत्वपूर्ण आदेश

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