अति वर्षा, सूखा, भूकम्प, भूस्खलन, बाढ़, तूफ़ान, अकाल, दुर्भिक्ष आदि ऐसी प्राकृतिक आपदाएं हैं जो भयावह रूप में अपने साथ जन-धन की हानि लेकर आती हैं। यद्यपि इनपर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं होता फिर भी इनका पूर्व अनुमान लगने पर नुक्सान को कम करने के लिए बचाव के उपाय तो किये ही जा सकते हैं। इन आपदाओं में भूकंप सर्वाधिक क्षतिकारक है जिसे रोकने के लिए वैज्ञानिक निरंतर प्रयत्नशील हैं। अभी पिछले दिनों भारत सहित विश्व के अनेक देशों को भूकंप की मार झेलनी पड़ी थी। ज्योतिष शास्त्र में भी भूकंप के संबंध में अलग से साहित्य है जिसका अध्ययन मेदनीय ज्योतिष के अंतर्गत किया जाता है।
वैदिक ज्योतिष के प्राचीन विद्वान मनीषियों ने अपने ग्रंथों में भूकंप के संबंध में अनेक महत्वपूर्ण सिद्धांतों का विवेचन किया है। इन ग्रंथों में हैं गर्ग संहिता, नारदीय संहिता और बृहत्संहिता। वैज्ञानिक शोध से यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा भचक्र परिक्रमा की अपनी स्वाभाविक स्थिति में जब शून्य अंश से एक सौ अस्सी अंश का कोण बनाते हैं तो पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति के दबाव में वृद्धि होने से पृथ्वी की स्वाभाविक परिभ्रमण गति परिवर्तित होने लगती है जिसे पृथ्वी की भीतरी सतह में मौजूद टेक्टॉनिक पर्तों की अपने स्थान से सरकने और अपार ऊर्जा उत्पन्न होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं जो भूकंप का कारण बनती हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सौरमंडल में स्थित नवग्रहों का नक्षत्रों के साथ गहरा संबंध होता है। प्रत्येक राशि में सवा दो नक्षत्र का मान निर्धारित है। वहीँ चंद्र ग्रह को समस्त सत्ताईस नक्षत्रों का राजा माना गया है। ग्रह और नक्षत्रों की स्थिति के सूक्ष्म विश्लेषण से भूकंप जैसी आपदाओं का पूर्व अनुमान लगाया जा सकता है।
ज्योतिष के क्षेत्र में भूकंप के संबंध में किये गए अनुसंधानों के आधार पर यह स्वीकार किया गया है कि सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण भी भूकंप से किसी न किसी रूप में संबंध रखते हैं। जिन क्षेत्रों में ये ग्रहण देखे जाते हैं, वहां भूकंप आने की संभावनाएं अन्य स्थानों की अपेक्षा कहीं ज्यादा होती हैं।
महर्षि गर्ग की संहिता में यह मत व्यक्त किया गया है कि हर माह अमावस्या तिथि को एवं इससे दो तिथि पहले अर्थात कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी व चतुर्दशी तथा दो तिथि बाद में अर्थात शुक्ल पक्ष की एकादशी एवं द्वादशी और पूर्णिमा तिथि को तथा इससे दो तिथि पहले अर्थात शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी व चतुर्दशी को एवं दो तिथि बाद में अर्थात कृष्ण पक्ष की एकादशी व द्वादशी तिथियों में भूकंप आने की संभावनाएं अधिक रहती हैं। इसी प्रकार शनि ग्रह तथा भूमध्य रेखा की दूरी की एक निश्चित डिग्री में ग्रहों की जो स्थिति होती है, वह भी भूकंप आने की संभावना को व्यक्त करती है।
जब सूर्य ग्रह कर्क, तुला और मकर राशियों की कक्षाओं में प्रवेश करता है, क्रूर ग्रह प्रभावी रहते हैं या वृष एवं वृश्चिक राशियों में सभी ग्रह स्थित होते हैं अथवा चंद्र एवं बुध ग्रह एक ही नक्षत्र में आ जाते हैं अथवा चंद्रमा पीड़ित अवस्था में रहता है तब भी भूकंप का असर देखने को मिलता है। - प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

