जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में सात रंगों का समन्वय होता है, उसी तरह मनुष्य के शरीर में भी सात रंगों की किरणें निश्चित अनुपात में रहती हैं। सौर मंडल में मौजूद विभिन्न ग्रहों से उत्सर्जित होने वाली अंतरिक्ष की चुंबकीय अल्ट्राकॉस्मिक किरणों के प्रभाव से यदि किसी रंग की किरणों की सक्रियता असंतुलित हो जाती है तो शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा के अंतर्गत सौर मंडल में मौजूद ग्रहों से निकलने वाली किरणों के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए रोगों के उपचार पर बल दिया गया है। इसके लिए रोग की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग रंग की कांच की बोतलों में तीन चौथाई भाग तक जल भरकर व सूर्य की रौशनी में रखकर सूर्य-तापित जल तैयार कर रोगी को पिलाया जाता है।
शरीर में जिस ग्रह की कॉस्मिक रश्मियों की कमी हो, उस ग्रह से संबंधित रत्न की भस्म या जल के रूप में औषधि तैयार कर रोगी को दी जाती है। इसके अलावा रोगी की कुंडली के विश्लेषण के बाद उचित रत्न धारण कराने से भी रोग निवारण में मदद मिलती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।
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