रविवार, 18 सितंबर 2022

स्वास्तिक का प्रयोग होता है शुभ

 प्राचीन काल से ही स्वास्तिक का प्रयोग मांगलिक चिह्न के रूप में किया जाता रहा है। यह गणेश जी के लिप्यात्मक स्वरूप के अलावा चारों दिशाओं का प्रतीक भी है। मकान के मुख्य द्वार के दोनों ओर शुद्ध घी व सिंदूर मिलाकर स्वास्तिक चिह्न बनाने से वहां नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है और परिवार में सुख-समृद्धि व शांति बनी रहती है।- वास्तु आचार्य एवं लेखक प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

व्यापार में आर्थिक लाभ के लिए करें ऐसा

 किसी भी दुकान, ऑफिस अथवा व्यापारिक स्थल में बैठते समय अपना मुख उत्तर पूर्व दिशा की तरफ रखना चाहिए। इसके साथ-साथ आलमारी, फर्नीचर, रिकॉर्ड, भारी सामान आदि हमेशा पश्चिम व दक्षिण दिशा में ही रखना चाहिए। ऐसा करने से आर्थिक लाभ की स्थिति बनती है और आश्चर्यजनक प्रगति देखने को मिलती है।- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

उत्तर पूर्व में फर्श रहे नीचा

 घर की उत्तर-पूर्व दिशा में बने फर्श का दक्षिण-पश्चिम में बने फर्श से कुछ ऊंचा होना वास्तु दोष है। इस दोष से बचने के लिए दक्षिण-पश्चिम के फर्श को ऊंचा कराएं अथवा पश्चिम दिशा के कोने में एक चबूतरा बनवाएं।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

दरवाजे पर मांगलिक चिह्न

 भवन के प्रवेश द्वार पर हल्दी और चावल के आटे की पीठी से हाथ को मांगलिक चिह्न के रूप में छापा जाता है। हाथ कर्म का प्रतीक है जबकि हाथ की चारों अंगुलियां व अंगूठा पंच तत्वों (जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी व आकाश) का द्योतक है। माना जाता है कि इससे घर में सुख, शांति, आरोग्य और आपसी सद्भाव बना रहता है।-प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

शनिवार, 17 सितंबर 2022

किराये के मकान में वास्तु

 किराये के मकान में वास्तु के अनुसार बदलाव करना संभव नहीं होता। इसलिए जहां तक संभव हो मंदिर ईशान कोण में, गैस चूल्हा आग्नेय कोण में, भारी सामान दक्षिण पश्चिम में और पलंग का सिरहाना दक्षिण या पश्चिम दिशा में रखना चाहिए। एक कमरे के मकान में भी यही व्यवस्था करने से बहुत सी समस्याओं का समाधान होता है।- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्याोतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

उत्तर पूर्व में रहे मुख

 किसी भी दुकान, ऑफिस अथवा व्यापारिक स्थल में बैठते समय अपना मुख उत्तर पूर्व दिशा की तरफ रखना चाहिए। इसके साथ-साथ आलमारी, फर्नीचर, रिकॉर्ड, भारी सामान आदि हमेशा पश्चिम व दक्षिण दिशा में ही रखना चाहिए। ऐसा करने से आर्थिक लाभ की स्थिति बनती है और आश्चर्यजनक प्रगति देखने को मिलती है।- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

दक्षिण पश्चिम में हो ऊंचा फर्श

 घर की उत्तर-पूर्व दिशा में बने फर्श का दक्षिण-पश्चिम में बने फर्श से कुछ ऊंचा होना वास्तु दोष है। इस दोष से बचने के लिए दक्षिण-पश्चिम के फर्श को ऊंचा कराएं अथवा पश्चिम दिशा के कोने में एक चबूतरा बनवाएं।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

जल का दान करना है शुभ

 वास्तु शास्त्र के अनुसार पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश को पंचतत्व माना गया है। इनमें से जल जीवन का अमृत है। जल का दान करना शुभ होता है। इसलिए जितना संभव हो, जल का दान करते रहें। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

बाथरूम व लैट्रीन के लिए दिशा

 वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के अंदर पूर्व या उत्तर दिशा में बाथरूम (केवल नहाने के लिए), लैट्रीन (शौचालय) पश्चिम या वायव्य कोण से हटकर उत्तर में या दक्षिण दिशा में बनवा सकते हैं। बाथरूम व लैट्रीन, दोनों एक साथ पश्चिमी वायव्य कोण व पूर्वी आग्नेय कोण में बनाए जा सकते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

अनाज रखने के लिए स्टोर की सही दिशा

 मकान में अगर अनाज या खाद्य पदार्थ रखने के लिए अलग से स्टोर बनाना हो तो, उत्तर-पश्चिम विदिशा (वायव्य कोण) शुभ होती है। इससे घर में अन्न आदि की कमी नहीं रहती। ऐसे स्टोर को कभी भी खाली नहीं छोड़ना चाहिए बल्कि स्टोर में थोड़ा बहुत अन्न या अन्य खाद्य पदार्थ अवश्य रखने चाहिए। ---- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

गलत दिशा में किचन हो तो करें उपाय

अगर किचन आग्नेय कोण के अलावा किसी दूसरी जगह है तो किचन में गैस या स्टोव आदि को आग्नेय कोण में रखें और रात में किचन की सफाई के बाद उत्तर दिशा की दीवार के पास तांबे के लोटे में पानी भरकर रखें। दूसरे दिन यानि सुबह उस पानी को पौधों में डाल दें। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा।

न हो गड्ढा या कुआं

 किसी भवन के नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम कोना), आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व कोना) और वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम कोना) की दिशा में गड्ढा या कुआं नहीं होना चाहिए। ऐसा होने से उस भवन में रहने वाले लोगों में आपसी कलह और अशांति बनी रहती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, वास्तु आचार्य एवं ज्योतिष-वास्तु लेखक, आगरा। 

शुक्रवार, 25 मार्च 2022

उपयोगी वास्तु टिप्स

 भवन के प्रवेश द्वार पर हल्दी और चावल के आटे की पीठी से हाथ को मांगलिक चिंह के रूप में छापा जाता है। हाथ कर्म का प्रतीक है जबकि हाथ की चारों अंगुलियां व अंगूठा पंच तत्वों (जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी व आकाश) का द्योतक है। माना जाता है कि इससे घर में सुख, शांति, आरोग्य और आपसी सद्भाव बना रहता है।-प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा। 

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

मांगलिक कार्यों के शुभारंभ के लिए है देव प्रबोधिनी एकादशी

 आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को चार माह के लिए भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन करते हैं। इस अवधि में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होते। चार माह बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जब भगवान विष्णु जागते हैं तो सभी मांगलिक कार्य पुनः आरंभ हो जाते हैं। इस एकादशी को देव प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी कहा जाता है। 

   माना जाता है कि देव प्रबोधिनी एकादशी को व्रत उपवास करके जो भी व्यक्ति भगवान विष्णु की विधि पूर्वक पूजा करते हैं, उनके जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और सर्व सुख प्राप्त होने लगते हैं। साथ ही मृत्यु होने पर विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। इस दिन फल, मिठाई, बेर, सिंगाड़ा, गन्ना, गुड़, खजूर आदि के दान का भी महत्व है। 

    तुलसी को विष्णु प्रिया कहा जाता है। इसलिए देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ करने का विधान है। मान्यता है कि जिन दंपत्ति के कोई संतान नहीं होती, अगर वे जीवन में एक बार तुलसी विवाह करें तो उन्हें कन्यादान का पुण्य लाभ मिलता है। पीपल के वृक्ष में विष्णु भगवान सहित अन्य देवताओं का वास माना गया है। इसलिए पीपल पर जल अर्पित करने और पीपल की परिक्रमा लगाने से भी शुभ फल मिलते हैं। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

रविवार, 24 अक्टूबर 2021

पंच तत्वों के संतुलन से आती है खुशहाली

 स्वस्थ, सुखी और समृद्ध रहने के लिए घर में प्राकृतिक रोशनी और शुद्ध वायु का प्रवेश करना आवश्यक है। इसके लिए वास्तु शास्त्र के अनुसार घर का निर्माण किए जाने की सलाह दी जाती है। माना जाता है कि जिन घरों के प्रत्येक कक्ष में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, उन घरों के लोग अधिक सुखी, संपन्न और स्वस्थ जीवन बिताते हैं। 

   वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी घर में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्वों का संतुलन होने के साथ-साथ प्राकृतिक रोशनी एवं वायु का आना भी जरूरी है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भी प्राकृतिक रोशनी और शुद्ध वायु वाले घरों में बीमारियां न के बराबर होती हैं। इसलिए घरों के निर्माण के समय वास्तु के नियमों का पालन करने में ही समझदारी है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

रविवार, 17 अक्टूबर 2021

अनमोल चिंतन

@ किसी का बुरा सोचने की बजाय अपनी सफलता के बारे में ही सोचना चाहिए और उस सफलता को पाने के लिए पूरे मनोयोग से प्रयास भी करना चाहिए।

@ जीवन में खुश रहने के लिए किसी के साथ की कोई आवश्यक नहीं है। बल्कि खुश रहने के लिए यही आवश्यक है कि हम स्वयं को परिपूर्ण मानें, अपनी आंतरिक शक्तियों पर विश्वास रखें और सदैव अपने को अच्छे कार्य में व्यस्त रखें। 

@ स्वस्थ रहने के लिए पौष्टिक आहार, नियमित योग व व्यायाम के साथ-साथ अपने मन को मजबूत बनाए रखना भी जरूरी है। तन और मन के कमजोर होने से ही शरीर में बीमारियां आती हैं। आत्मविश्वास मजबूत हो तो मनुष्य सभी तरह की शारीरिक और मानसिक बीमारियों से मुक्त रह सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

वास्तु के अनुसार करें नवरात्र में देवी पूजन

 जगतजननी माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना से जुड़ा महापर्व है नवरात्र। नवरात्र के नौ दिनों तक देवी मां के प्रति आस्था और अटल भक्ति का सैलाब देखने को मिलता है। घरों के अलावा मंदिरों में भी इन दिनों देवी भक्त विशेष पूजा पाठ, मंत्र जाप, रात्रि जागरण, भजन कीर्तन, साधना, आराधना आदि में लीन रहते हैं। नवरात्र के दिनों में वैसे तो देवी मां की आराधना के लिए दुर्गा सप्तशती में विस्तार से पूजा-पाठ का विधान हैं, लेकिन अगर देवी मां की उपासना के समय वास्तु के कुछ नियमों का पालन किया जाए तो पूजा का फल शीघ्र ही मिलने लगता है और देवी मां की कृपा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होने लगती हैं। वास्तु के यहां दिए गए नियम मां भगवती की पूजा में बहुत उपयोगी हैं:

00 वास्तु शास्त्र के अनुसार पूजा पाठ के लिए पूर्व, उत्तर एवं उत्तर-पूर्व दिशा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है इसलिए नवरात्र में देवी मां की तस्वीर और प्रतिमा को सदैव इन्हीं दिशाओं में एक लकड़ी की चौकी या ऊंचे आसन पर नया लाल कपड़ा बिछा कर स्थापित करना चाहिए। 

00 देवी पूजन के लिए पानी से भरे कलश और नारियल को पूजा स्थल की उत्तर-पूर्व दिशा यानि ईशान कोण में तथा दीपक, कपूर, हवन सामग्री, माचिस व धूप बत्ती को दक्षिण-पूर्व दिशा यानि आग्नेय कोण में ही रखना चाहिए। 

00 नवरात्र के दिनों में दुर्गा सप्तशती का विधि पूर्वक पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है। वास्तु के अनुसार यह पाठ करते समय साधक का चेहरा हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा की तरफ ही होना चाहिए। किसी भी दशा में दक्षिण दिशा की तरफ चेहरा करके पाठ नहीं करना चाहिए। 

00 नवरात्र के नौ दिनों में प्रतिदिन देवी मां के पूजन के समय हवन करने का भी विधान है। इसके अलावा कुछ लोग प्रतिदिन हवन न करके केवल नवरात्र के अंतिम दिन यानि नवमी तिथि को ही हवन करते हैं। जब भी हवन किया जाए, आग्नेय कोण में ही हवन कुंड बनाया जाए। हवन करने वाले व्यक्ति का चेहरा पूर्व दिशा में होना चाहिए। यदि हवन किसी आचार्य श्री द्वारा करवाया जा रहा है तो हवन के दौरान आचार्य का चेहरा उत्तर दिशा की तरफ रहना जरूरी है। 

00 देवी मां की पूजा आराधना में मंत्र जाप का भी अपना खासा महत्व है। वास्तु के अनुसार मंत्र जाप के समय भी साधक का चेहरा पूर्व या उत्तर दिशा में ही रहना चाहिए। जाप के लिए स्फटिक, रुदाक्ष या लाल चंदन की माला का उपयोग किया जाता है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि महिलाओं को रुद्राक्ष की माला का उपयोग मंत्र जाप में नहीं करना चाहिए। 

00 वास्तु शास्त्र के अनुसार दिशाओं की कुल संख्या दस होती है। दसों दिशाओं के अधिपति भी अलग अलग होते हैं। किसी भी पूजा पाठ के समय अन्य देवी-देवताओं के साथ-साथ इन सभी दिशाओं के अधिपतियों का आह्वान किया जाता है। इसलिए नवरात्र के दिनों में भी देवी मां को प्रसन्न करने एवं उनकी विशेष कृपा पाने के लिए मुख्य दीपक के अलावा पूजा स्थल और हवन कुंड के पास अथवा चारों तरफ वर्गाकार में समान दूरी रखते हुए नौ दीपक और एक दीपक इस वर्ग के बीचों बीच अवश्य ही प्रज्ज्वलित करने चाहिए। 

00 नवरात्र के दिनों में पूजा पाठ और व्रत उपवास के दौरान परिवार के सदस्यों को लहसुन, प्याज, लाल मिर्च, हींग, राई, मेथी, अंडा, मांसाहार, शराब, तंबाकू, नशीले पदार्थ आदि के सेवन से परहेज करना आवश्यक है। इन दिनों शुद्ध सात्विक भोजन ही करना शुभ होता है। व्रताहार में आलू, अरबी, सिंघाड़ा, कूटू, मूंगफली, मखाने, खरबूजा के बीज, फल, चाय, कॉफी, छाछ आदि का सेवन किया जा सकता है। वास्तु शास्त्र में भी पूजा पाठ के दौरान पवित्रता और सात्विकता को स्वीकार किया गया है। 

00 नवरात्र के अंतिम दिन देवी मां की पूजन के पश्चात श्रद्धानुसार कन्या व लांगुरों को बैठाकर भोजन कराने और उन्हें धन, वस्त्र, फल या कोई वस्तु देने की परंपरा है। कन्या लांगुरों की संख्या नौ, ग्यारह, इक्कीस, इकत्तीस यानि विषम में होनी चाहिए। उनकी थाली में उतना ही भोजन परोसा जाए जितना वो खा सकें। यदि घर के लिए भोजन दे रहे हैं तो यह अवश्य देखें कि वे भोजन को इधर उधर न फैंक देें। भोजन की बर्बादी से देवी अन्नपूर्णा का अपमान होता है। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 



सोमवार, 27 सितंबर 2021

उपयोगी वास्तु टिप्स

## मकान की उत्तर-पूर्व विदिशा यानि ईशान कोण में किसी भी तरह का निर्माण या टॉयलेट का होना दांपत्य जीवन के लिए अशुभ होता है। यहां तक कि इस वजह से विवाह टूटने की नौबत आ जाती है। इसलिए इस कोण को सदैव खुला और स्वच्छ रखना आवश्यक है। 

## मकान के आग्नेय कोण यानि दक्षिण-पूर्व विदिशा में गर्भवती महिला को कभी नहीं सुलाना चाहिए अन्यथा उस महिला में अनिद्रा एवं गर्भपात होने का अंदेशा बना रहेगा। जगह की कमी हो तो आग्नेय कोण से हटकर दक्षिण की दीवार की तरफ सुला सकते हैं। 

## मकान की पूर्व में सीढ़ियों का होना भी शुभ नहीं होता। इस दोष के कारण आर्थिक नुकसान के साथ-साथ परिवार के सदस्यों में मानसिक तनाव होता है। सीढ़ियों के लिए और कहीं जगह न हो तो पूर्व दिशा की दीवार और सीढ़ियों के बीच कम से कम तीन इंच का गैप कर देना चाहिए। 

## मकान की दक्षिण-पश्चिम विदिशा यानि नैऋत्य कोण में मुख्य प्रवेश द्वार (मेन गेट) का होना वास्तु दोष है। ऐसा होने से अनावश्यक खर्चा होता है, साथ ही घर के मुखिया का मन भी घर में नहीं लगता। इस दोष से बचने के लिए मुख्य द्वार पर दहलीज बनवा कर उसके नीचे चांदी की पत्ती और नौ छोटे पिरामिड लगवा देने चाहिए। 

## बॉक्स वाले पलंग या बेड में केवल ओढ़ने व बिछाने वाले कपड़े ही रखने चाहिए। पलंग के बॉक्स के अंदर किसी भी तरह का कबाड़, पुराने कपड़े, बिजली के खराब उपकरण, टूटे बर्तन, रद्दी अखबार आदि रखने से परिवार में कलह व मानसिक रोग होने की संभावना बनी रहती है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

शनिवार, 18 सितंबर 2021

श्राद्ध कर्म में पंचबली का महत्व

   पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का दूसरा नाम ही श्राद्ध है। धार्मिक एवं पौराणिक मान्यता है कि अमावस्या और पूर्णमासी के दिन पूर्ण श्रद्धा भाव के साथ पितरों के लिए श्राद्ध एवं तर्पण करने से पितृ प्रसन्न हो कर अपना शुभ आशीर्वाद देते हैं, लेकिन आश्विन मास में पड़ने वाले श्राद्ध के दिन पितृ पूजन के लिए विशेष महत्व रखते हैं। श्राद्ध के दिनों में पितरों की प्रसन्नता और कृपा पाने के लिए पिंड दान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन और श्रद्धा के अनुसार दक्षिणा देने आदि कार्य किए जाते हैं।

  भारतीय संस्कृति में पितरों को भगवान की तरह पूजनीय माना जाता है। पितरों को याद करके उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने के उद्देश्य से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक की अवधि श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष के रूप में मान्य की गई है। इस अवधि के दौरान प्रतिदिन तन व मन से सात्विक और पवित्र भावना बनाए रखते हुए दूध, काले तिल, कुशा एवं पुष्प मिश्रित जल से दक्षिण की तरफ मुख रखते हुए तर्पण करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से श्राद्ध पक्ष समाप्त होने पर पितर अपने परिजनों को आशीर्वाद देकर स्वर्ग लोक के लिए गमन करते हैं। 

   श्राद्ध पक्ष के दिनों में पड़ने वाली चतुर्थी तिथि के दिन होने वाले श्राद्ध में चतुर्थी व्रत रखने का विशेष महत्व होता है। चूंकि चतुर्थी तिथि का संबंध गणेश जी से माना गया है, इसलिए इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण करने के साथ-साथ गणेश जी की आराधना भी करनी चाहिए तथा गणेश जी व उनके वाहन मूषक को भोजन के अलावा मोदक का भोग भी लगाना चाहिए। इस तिथि को श्वेत गणपति को सफेद चंदन, श्वेत वस्त्र, लाल रंग के पुष्प, पीले रंग की माला, 21 मोदक, चार केले, पान, सुपारी, लौंग आदि अर्पित करते हुए गणेश जी की आरती करनी चाहिए। 

   श्राद्ध पक्ष के दिनों में गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देवताओं के लिए भोजन में से अंश निकाला जाता है। इन पांच अंशों का अर्पण पंच बलि कहलाता है। देखा जाए तो श्राद्ध पक्ष में पंच बलि पंच तत्वों के प्रति आभार व्यक्त करना है। क्योंकि कुत्ते को जल का, चींटी को अग्नि का, कौवा को वायु का, गाय को पृथ्वी का और देवता को आकाश का प्रतीक माना गया है। गाय में सभी पंच तत्व की उपस्थिति होने से श्राद्ध पक्ष में गौ सेवा को विशेष महत्व दिया गया है। इन दिनों पंच गव्य का प्रयोग करते रहने से पितृ दोष से भी मुक्ति मिल जाती है। 

    श्राद्ध पक्ष में श्रद्धा भाव के साथ जीव-जंतुओं को भी भोजन कराने से पितरों की कृपा से जीवन में सुख, शांति, धन, संपत्ति संतान, विद्या, ज्ञान आदि की प्राप्ति होती है और पितृ दोषों का निवारण होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

पर्सन इंचार्ज के तौर पर एक ही अस्पताल को मिलेगा लाइसेंस

आगरा (प्रमोद कुमार अग्रवाल)। स्वास्थ्य विभाग द्वारा अब पर्सन इंचार्ज के तौर पर एक ही अस्पताल को लाइसेंस दिए जाने का निर्णय लिया गया है। एक स...