आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को चार माह के लिए भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन करते हैं। इस अवधि में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होते। चार माह बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जब भगवान विष्णु जागते हैं तो सभी मांगलिक कार्य पुनः आरंभ हो जाते हैं। इस एकादशी को देव प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी कहा जाता है।
माना जाता है कि देव प्रबोधिनी एकादशी को व्रत उपवास करके जो भी व्यक्ति भगवान विष्णु की विधि पूर्वक पूजा करते हैं, उनके जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और सर्व सुख प्राप्त होने लगते हैं। साथ ही मृत्यु होने पर विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। इस दिन फल, मिठाई, बेर, सिंगाड़ा, गन्ना, गुड़, खजूर आदि के दान का भी महत्व है।
तुलसी को विष्णु प्रिया कहा जाता है। इसलिए देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ करने का विधान है। मान्यता है कि जिन दंपत्ति के कोई संतान नहीं होती, अगर वे जीवन में एक बार तुलसी विवाह करें तो उन्हें कन्यादान का पुण्य लाभ मिलता है। पीपल के वृक्ष में विष्णु भगवान सहित अन्य देवताओं का वास माना गया है। इसलिए पीपल पर जल अर्पित करने और पीपल की परिक्रमा लगाने से भी शुभ फल मिलते हैं। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।
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