मनुष्य के जीवन से वास्तु शास्त्र का गहरा संबंध है। जिस भवन में मनुष्य रहता है, व्यवसाय या व्यापार करता है अथवा किसी अन्य रूप में भवन को काम में लाता है, वहां की वास्तु का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष शुभ या अशुभ प्रभाव देर-सवेर उस पर पड़ता है।
सब कुछ ठीक होने के बाद भी भवन में एक या अधिक वास्तु दोष होने पर जीवन में कुछ न कुछ ऐसा घटित होने लगता है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। देखने में आता है कि वास्तु दोष की वजह से परिवार में बिखराव, आपसी तालमेल की कमी, परिवार के लोगों में मनमुटाव व कलह, धनार्जन में बाधा, शारीरिक व मानसिक रोग, पड़ौसियों से विवाद, अकाल मृत्यु, घर के सदस्यों का गलत आचरण व आपराधिक कार्यों में लिप्तता, बिना वजह मान-सम्मान व प्रतिष्ठा में कमी, शत्रुओं में वृद्धि, व्यवसाय व व्यापार में नुकसान, बिजली के उपकरणों व मशीनों आदि में बार-बार खराबी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
वास्तु शास्त्र कोई अंधविश्वास या कल्पना पर आधारित विषय नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा मान्य विज्ञान है जो प्रकृति प्रदत्त पंच तत्वों, प्रभावशाली चुंबकीय क्षेत्र और आठ दिशाओं पर आधारित है तथा इसके नियमों के अनुरूप किया गया भवन निर्माण निश्चय ही वहां सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बनाए रखता है, जिससे जीवन में शुभता आने लगती है।
अगर किसी मनुष्य को लगता है कि उसके भवन में रहने, व्यापार या व्यवसाय करने के दौरान समस्याओं में वृद्धि हुई है या फिर उसका जीवन किसी भी अन्य रूप में प्रभावित हुआ है तो उसे किसी सुयोग्य व अनुभवी वास्तु सलाहकार से संपर्क करके भवन के वास्तु दोषों का पता लगा कर निराकरण कराना चाहिए जिससे कि भवन निर्माण का उसका उद्देश्य पूर्ण हो सके और सुखमय, सम्मानपूर्ण व सुव्यवस्थित जीवन जीने का उसका सपना साकार हो सके। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा।
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