# वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी भवन की उत्तर-पूर्व दिशा ( ईशान कोण) गुरु ग्रह को प्रभावित करने वाली मानी गयी है. इस दिशा के स्वामी भगवान शिव तथा तत्व जल यानि पानी है. # यह दिशा किसी भी वास्तु के लिए सबसे अधिक महत्व रखती है और बद्धि, विवेक, साहस, धैर्य, सेहत, पुत्र, सम्पन्नता एवं सम्पत्ति प्रदान करती है. इसीलिए इस दिशा को नीचा, खुला, साफ-सुथरा व पवित्र बनाए रखने पर बल दिया जाता है.
# ईशान कोण में मंदिर या पूजा स्थल बनाना श्रेष्ठ रहता है, लेकिन ध्यान यह रखना चाहिए कि मंदिर में केवल देवी-देवता ही स्थापित किए जाएं, किसी भी गुरु, साधु-महात्मा या मृत परिजनों की तस्वीर या मूर्ति को मंदिर में नहीं रखना चाहिए.
# यह दिशा भूमिगत जल स्रोत जैसे हैण्डपंप, समर, अण्डरग्राउण्ड वाटर टैंक, बारामदा, बालकनी आदि बनवाने के लिए भी उत्तम है.
# यहां टॉयलेट, स्टोर, कबाड़घर, ओवरहेड वाटर टैंक, सैप्टिक टैंक, सीढ़ी आदि बने होना वास्तु दोष है, जिससे कई मानसिक, शारीरिक व आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. --प्रमोद कुमार अग्रवाल, वास्तु आचार्य एवं ज्योतिष-वास्तु लेखक, आगरा।
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