गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

रिश्तों को स्वेच्छा से निभाएं या पूर्ण विराम दें

रिश्तों को निभाने के दौरान क्या सही है और क्या गलत, ये अपनी-अपनी सोच पर निर्भर करता है। सबकी सोच एक जैसी हो ही नहीं सकती और न ही किसी की सोच को बदला जा सकता है।

   किसी भी रिश्ते को किस तरह से जिया जाए, ये बात सोच पर ही निर्भर करती है। एक छत के नीचे साथ-साथ रहते हुए भी रिश्तों में कोई लगाव या मिठास देखने को नहीं मिलती, वहीं कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जो कुछ ही समय में जीवन की दशा और दिशा, दोनों को बदल देते हैं। ऐसे रिश्तों में लगाव और मिठास का मिला जुला मिश्रण जीवन में खुशियों का अहसास कराता रहता है। 

   जब कोई रिश्ता जुड़ता है तो उसमें कोई न कोई तारतम्य तो होता ही है वरना रिश्तों की गहराई नहीं होती। किसी भी नए रिश्ते की शुरुआत में कोई अपेक्षा या लगाव नहीं होते, लेकिन जैसे-जैसे रिश्तों में गरमाहट आने लगती है, लगाव और अपेक्षाएं भी अपने आप जुड़ने लग जाती हैं। बस यहीं से रिश्तों का गणित गड़बड़ाने लग जाता है। जहां एक तरफ लगाव रिश्तों में मजबूती लाता है तो वहीं अपेक्षाएं रिश्तों को कमजोर बनाती हैं। ऐसी स्थिति में रिश्तों के निर्वहन में बहुत मुश्किल होने लगती है।

   जब कोई रिश्ता स्वत: ही जुड़ता है तो वह किसी भी दायरे को नहीं देखता, लेकिन आगे चलकर जब उस रिश्ते को दायरे से जोड़ दिया जाता है तो समस्याएं आना स्वाभाविक ही है। सच तो यही है कि कोई भी रिश्ता दायरे में बंधकर नहीं निभाया जा सकता और न ही कोई रिश्ता स्वार्थ, झूठ, धोखा या लालच की बुनियाद पर टिका रह पाता है। रिश्ते में आपसी स्नेह, प्रेम, समर्पण और सम्मान का होना जरूरी है।

   अगर रिश्तों के दौरान अपेक्षाओं का समावेश होने लगा है तो समझदारी इसी में है कि या तो उन रिश्तों को स्वेच्छा से अपेक्षाओं को पूरा करते हुए खुशी-खुशी जिया जाए या फिर हमेशा के लिए रिश्तों पर पूर्ण विराम लगा दिया जाए, क्योंकि आगे चलकर ऐसे रिश्तों से कोई भी खुशी हासिल होना संभव नहीं है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

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