पुराणों के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को अपने लोक-परलोक को सुधारने के लिए दस प्रकार के पापों से बचना चाहिए। दस प्रकार के पाप तीन श्रेणियों में विभाजित किए गए हैं, जो इस प्रकार हैं:
तीन प्रकार के शारीरिक पाप: किसी की वस्तु को बिना मांगे ले लेना, किसी भी प्राणी के प्रति हिंसा करना और पराई स्त्री के साथ संबंध रखना।
तीन प्रकार के मानसिक पाप: दूसरे की धन-संपत्ति को हड़पने की सोचना, मन से किसी के अनिष्ट का चिंतन करना और झूठा मरण-भय दिखाना।
चार प्रकार के वाचिक पाप: किसी को कठोर वचन बोलना, झूठ बोलना, किसी की चुगली करना और अनाप-शनाप बातें बकना।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा
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