वास्तु शास्त्र के अनुसार उत्तर दिशा के देवता धन प्रदान करने वाले कुबेर हैं, जबकि ईशान कोण (उत्तर-पूर्व विदिशा) के देवता बुद्धि प्रदाता ब्रहस्पति हैं। बुद्धि और धन के बल पर ही कोई भी कार्य, चाहे वह खुद का व्यापार हो या व्यवसाय अथवा किसी दूसरे के लिए किया जाने वाला शारीरिक व मानसिक श्रम, आसानी से सफलता पूर्वक संपन्न किया जा सकता है।
किसी भी वास्तु में रहने, व्यापार या व्यवसाय करने के दौरान अपेक्षित लाभ प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि उस वास्तु में उत्तर और पूर्व दिशाओं का विशेष ध्यान रखा जाए, जिससे कि वहां ब्रहस्पति और कुबेर देवताओं की कृपा सदैव बनी रहे। इसीलिए वास्तु नियमों में उत्तर व पूर्व दिशाओं को खाली, खुला, नीचा, स्वच्छ और वास्तु दोष से मुक्त रखा जाना अनिवार्य बताया गया है।
उत्तर और पूर्व दिशाओं में किसी भी तरह के भारी निर्माण, शौचालय, कबाड़ घर, किचन, सैप्टिक टैंक, सीढ़ियां, ओवरहेड पानी की टंकी, विशालकाय पेड़ का होना वास्तु दोष का कारण बनता है। जिसकी वजह से शारीरिक व मानसिक रोग, मांगलिक कार्यों में रुकावट, कर्ज में वृद्धि, घन की कमी, पितृ दोष आदि समस्याएं आने लगती हैं। इसलिए उत्तर-पूर्व दिशाओं को दोष मुक्त बनाए रखकर भी बेहतर जीवन का आनंद लिया जा सकता है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा।
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