शीत ऋतु के बाद अपने साथ सुहावना मौसम लेकर आने वाली वसंत ऋतु में माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि वसंतोत्सव या वसंत पंचमी के रूप में हर्षोल्लास से मनाई जाती है। वसंत के आगमन के साथ ही खेत-खलिहान और बाग-बगीचों में जैसे प्रकृति हरे परिधान पहनकर इठलाने लगती है। रंग-बिरंगे पुष्पों पर मंडराती विविध रंगों की तितलियां, आम के वृक्षों पर लगती बौर और सरसों के पीले फूलों से सजी धरती सम्मोहन एवं आकर्षण का पर्याय बन जाती है। जीवन में नए उमंग और उल्लास का संचार करने वाली वसंत ऋतु एक ऐसा मौसम है जो हमारे भीतर के यौवन को चिर बनाये रखता है।
देवी सरस्वती से जुड़ा पर्व
मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन ज्ञान, विद्या, संगीत, ललित कला एवं संस्कृति की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का अवतरण हुआ था। सृष्टि के रचियता बृह्मा जी की भार्या देवी सरस्वती को महादेवी भी कहा जाता है। सरस्वती को वेदमाता के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि चारों वेद, देवी के ही स्वरुप हैं। हंस, कमल, पुस्तक और वीणा धारण करते हुए सरस्वती योग और ध्यान विद्या की ज्ञाता हैं। ऋग्वेद के अनुसार सरस्वती, नदियों की अधिष्ठात्री देवी भी हैं जो गंगा और यमुना के साथ संगम करके त्रिवेणी का रूप धारण करती हैं। इसलिए त्रिवेणी में किया गया स्नान अक्षय पुण्य फल देने वाला और सभी पापों को हरने वाला माना गया है।
शुभता के लिए पूजन
वसंत पंचमी के दिन भगवान् विष्णु की पूजा का विधान है। इस दिन प्रातःकाल तेल का उबटन लगाकर स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके भगवान नारायण की पूजा की जाती है। इसके बाद पितृ तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। ऐसा करने से जीवन में आने वाले कष्ट और बीमारियों से छुटकारा मिलता है। इस दिन पारिवारिक सुख, शान्ति और प्रेम भाव बनाये रखने के लिए कामदेव और रति की पूजा भी की जाती है। पितरों तथा देवों की प्रसन्नता के लिए नए अनाज में घी एवं मीठा मिलाकर अग्नि को समर्पित करने की भी परम्परा है। भगवान विष्णु के साथ गणेश, शिव और सूर्य आदि का पूजन करने के बाद देवी सरस्वती का पूजन करने से समस्त देवी-देवताओं का शुभ आशीर्वाद प्राप्त होता है।
अक्षर ज्ञान का पर्व
पुराणों के अनुसार भगवान् श्री कृष्ण ने देवी सरस्वती को यह वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन जो भी मनुष्य भक्ति भाव से तुम्हारी आराधना करेगा, वह विद्यां और गुणवान बनकर संसार में ज्ञान का प्रकाश फैलाएगा। इसलिए वसंत पंचमी के दिन स्कूल-कॉलेजों में विद्यार्थी देवी सरस्वती की पूजा करते हैं। शिशुओं को अक्षर ज्ञान कराने की शुरुआत भी इसी दिन से की जाती है। ज्ञान और विद्या की कामना करने वालों को सदैव देवी सरस्वती का पूजन करना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार उन्हें ईशान कोण में अथवा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके अध्ययन करना चाहिए। अध्ययन की मेज पर देवी सरस्वती का चित्र या प्रतिमा रखना भी लाभकर होता है।
होलिकोत्सव की शुरुआत
वसंत पंचमी के दिन से ही होली का आरंभ हो जाता है। इस दिन ब्रज क्षेत्र में पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है और नए पीले या वासंती के रंग वस्त्र पहनकर नए उत्साह और उमंग के साथ हास-परिहास किया जाता है। यह उत्सव फाल्गुन मास की पूर्णिमा तक प्रतिदिन चलता है। इस दिन चौराहों पर होलिका दहन के लिए लकड़ी भी रखी जाती है।
तंत्र-मंत्र प्रयोग के लिए शुभ
तंत्र शास्त्र में वसंत ऋतु को महत्वपूर्ण माना गया है। उसके अनुसार वशीकरण, सम्मोहन और आकर्षण से संबंधित प्रयोग एवं हवन आदि वसंत ऋतु में करने से विशेष शुभ और फ़लदायी होते हैं। तंत्र-मंत्र तथा संगीत साधना भी वसंत ऋतु में करने से देवी सरस्वती की विशेष कृपा मिलती है। -प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष-वास्तु लेखक एवं सलाहकार, आगरा।
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