शनिवार, 11 नवंबर 2023

वास्तु अनुरूप पूजन से प्रसन्न होते हैं श्री लक्ष्मी गणेश

धार्मिक मान्यता के अनुसार देवी महालक्ष्मी समस्त प्रकार की चल व अचल संपत्ति, सिद्धि एवं निधियों की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। वहीं भगवान गणेश को बुद्धि, शुभ लाभ एवं सिद्धिदायक के साथ-साथ अमंगल और सभी विघ्नों के नाशक देव के रूप में स्वीकार किया गया है। इसलिए ज्योति पर्व दीपावली पर ऋद्धि और सिद्धि प्राप्त करने के लिए भगवान गणेश और महालक्ष्मी जी की विधिवत पूजा-अर्चना करने का विधान है। 

   कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को दीपावली का पावन पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन घरों के साथ ही सभी औद्योगिक प्रतिष्ठानों, दुकानों और व्यावसायिक संस्थानों में शुभ मुहूर्त में लक्ष्मी गणेश जी की पूजा की जाती है। दीपावली के दिन पूजा करते समय अगर वास्तु शास्त्र के नियमों का पालन किया जाए तो पूजा निष्फल नहीं जाती और देवी-देवताओं का भरपूर आशीर्वाद मिलता है। दीपावली के दिन वास्तु अनुरूप पूजा के लिए यहां दी गई बातों का ध्यान रखना चाहिए : 
* पूजा स्थल सदैव पूर्व या उत्तर दिशा अथवा ईशान कोण में रखना चाहिए। जिससे कि पूजा करते समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा में रहे। दक्षिण दिशा में मुख करके कभी भी पूजन नहीं करना चाहिए। 
* पूजा स्थल को गंगा जल से पवित्र करते हुए हल्दी व आटे से चौक पूरना चाहिए। इसके बाद वहां चौकी या ऊंचे आसन पर नया लाल वस्त्र बिछाकर लक्ष्मी और गणेश की मूर्ति स्थापित करनी चाहिए। 
* पूजा स्थल पर ईशान कोण की तरफ शुद्ध जल से भरा कलश और मध्य में एक थाली में रुपये, चांदी के सिक्के, रोली, अक्षत, खील, बतासे, मिष्ठान आदि रखने चाहिए। जबकि धूपबत्ती और तेल के दीपक को दक्षिण दिशा की तरफ रखना चाहिए। शुद्ध घी का दीपक और जल से भरा शंख मध्य में रख सकते हैं। 
* दीपावली के दिन अपनी श्रद्धा के अनुसार मिट्टी के  11, 21, 31 या 51 दीपक शुद्ध सरसों के तेल में जलाकर घर या व्यापारिक स्थल पर सभी दिशाओं में रखने चाहिए। इसके अलावा शुद्ध घी का दीपक तुलसी जी के पौधे पर भी प्रज्ज्वलित करना चाहिए। 
* महालक्ष्मी और गणेश जी के पूजन में दूर्वा, कमल, चमेली, चंपा, गुलाब, बेला, गेंदा आदि के पुष्पों को ही लेना चाहिए। तुलसी, आक, मदार, मालती आदि के पुष्पों से महालक्ष्मी जी का पूजन निषिद्ध माना गया है। 
* शुभ मुहूर्त में लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा के समय आठों दिशाओं में आठों सिद्धियों की पूजा कुंकुम व अक्षत से करते हुए निम्न मंत्र जाप करने चाहिए। 
पूर्व दिशा के लिए : ऊँ अणिम्ने नम:
अग्निकोण के लिए : ऊँ माहम्ने नम:
दक्षिण दिशा के लिए : ऊँ गरिम्णे नम:
नैऋत्य कोण के लिए : ऊँ लघिम्ने नम:
पश्चिम दिशा के लिए : ऊँप्राप्त्ये नम:
वायव्य कोण के लिए : ऊँ प्राकाम्ये नम:
उत्तर दिशा के लिए : ऊँ ईशिताये नम:
ईशान कोण के लिए : ऊँ वाशितायै नम:
* महालक्ष्मी जी के पूजन के समय ही उनके आठ स्वरूपों की पूजा करते हुए उनके मंत्रों का उच्चारण भी पूर्व या उत्तर दिशा में मुख करते हुए कर सकते हैं। इन आठ स्वरूपों के नाम इस प्रकार हैं-आद्य लक्ष्मी, विद्या लक्ष्मी सौभाग्य लक्ष्मी, अमृत लक्ष्मी, काक लक्ष्मी, सत्य लक्ष्मी, भोग लक्ष्मी और योग लक्ष्मी। 
* दीपावली पर पूजन संपन्न होने के बाद एक लाल रंग के नए चौकोर वस्त्र या थैली में पांच हल्दी की गांठ, साबुत धनिया, पांच कमलगट्टा, अक्षत, दूर्वा और पांच सिक्के रखने चाहिए। इसके बाद इसे धन रखने वाली तिजोरी या आलमारी में रख देना चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि जिस तिजोरी या आलमारी में इस थैली को रखा जाए, वह पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ ही खुलनी चाहिए। 
---- वास्तु आचार्य प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

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