जगतजननी माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना से जुड़ा महापर्व है नवरात्र। नवरात्र के नौ दिनों तक देवी मां के प्रति आस्था और अटल भक्ति का सैलाब देखने को मिलता है। घरों के अलावा मंदिरों में भी इन दिनों देवी भक्त विशेष पूजा पाठ, मंत्र जाप, रात्रि जागरण, भजन कीर्तन, साधना, आराधना आदि में लीन रहते हैं। नवरात्र के दिनों में वैसे तो देवी मां की आराधना के लिए दुर्गा सप्तशती में विस्तार से पूजा-पाठ का विधान हैं, लेकिन अगर देवी मां की उपासना के समय वास्तु के कुछ नियमों का पालन किया जाए तो पूजा का फल शीघ्र ही मिलने लगता है और देवी मां की कृपा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होने लगती हैं। वास्तु के यहां दिए गए नियम मां भगवती की पूजा में बहुत उपयोगी हैं:
00 वास्तु शास्त्र के अनुसार पूजा पाठ के लिए पूर्व, उत्तर एवं उत्तर-पूर्व दिशा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है इसलिए नवरात्र में देवी मां की तस्वीर और प्रतिमा को सदैव इन्हीं दिशाओं में एक लकड़ी की चौकी या ऊंचे आसन पर नया लाल कपड़ा बिछा कर स्थापित करना चाहिए।
00 देवी पूजन के लिए पानी से भरे कलश और नारियल को पूजा स्थल की उत्तर-पूर्व दिशा यानि ईशान कोण में तथा दीपक, कपूर, हवन सामग्री, माचिस व धूप बत्ती को दक्षिण-पूर्व दिशा यानि आग्नेय कोण में ही रखना चाहिए।
00 नवरात्र के दिनों में दुर्गा सप्तशती का विधि पूर्वक पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है। वास्तु के अनुसार यह पाठ करते समय साधक का चेहरा हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा की तरफ ही होना चाहिए। किसी भी दशा में दक्षिण दिशा की तरफ चेहरा करके पाठ नहीं करना चाहिए।
00 नवरात्र के नौ दिनों में प्रतिदिन देवी मां के पूजन के समय हवन करने का भी विधान है। इसके अलावा कुछ लोग प्रतिदिन हवन न करके केवल नवरात्र के अंतिम दिन यानि नवमी तिथि को ही हवन करते हैं। जब भी हवन किया जाए, आग्नेय कोण में ही हवन कुंड बनाया जाए। हवन करने वाले व्यक्ति का चेहरा पूर्व दिशा में होना चाहिए। यदि हवन किसी आचार्य श्री द्वारा करवाया जा रहा है तो हवन के दौरान आचार्य का चेहरा उत्तर दिशा की तरफ रहना जरूरी है।
00 देवी मां की पूजा आराधना में मंत्र जाप का भी अपना खासा महत्व है। वास्तु के अनुसार मंत्र जाप के समय भी साधक का चेहरा पूर्व या उत्तर दिशा में ही रहना चाहिए। जाप के लिए स्फटिक, रुदाक्ष या लाल चंदन की माला का उपयोग किया जाता है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि महिलाओं को रुद्राक्ष की माला का उपयोग मंत्र जाप में नहीं करना चाहिए।
00 वास्तु शास्त्र के अनुसार दिशाओं की कुल संख्या दस होती है। दसों दिशाओं के अधिपति भी अलग अलग होते हैं। किसी भी पूजा पाठ के समय अन्य देवी-देवताओं के साथ-साथ इन सभी दिशाओं के अधिपतियों का आह्वान किया जाता है। इसलिए नवरात्र के दिनों में भी देवी मां को प्रसन्न करने एवं उनकी विशेष कृपा पाने के लिए मुख्य दीपक के अलावा पूजा स्थल और हवन कुंड के पास अथवा चारों तरफ वर्गाकार में समान दूरी रखते हुए नौ दीपक और एक दीपक इस वर्ग के बीचों बीच अवश्य ही प्रज्ज्वलित करने चाहिए।
00 नवरात्र के दिनों में पूजा पाठ और व्रत उपवास के दौरान परिवार के सदस्यों को लहसुन, प्याज, लाल मिर्च, हींग, राई, मेथी, अंडा, मांसाहार, शराब, तंबाकू, नशीले पदार्थ आदि के सेवन से परहेज करना आवश्यक है। इन दिनों शुद्ध सात्विक भोजन ही करना शुभ होता है। व्रताहार में आलू, अरबी, सिंघाड़ा, कूटू, मूंगफली, मखाने, खरबूजा के बीज, फल, चाय, कॉफी, छाछ आदि का सेवन किया जा सकता है। वास्तु शास्त्र में भी पूजा पाठ के दौरान पवित्रता और सात्विकता को स्वीकार किया गया है।
00 नवरात्र के अंतिम दिन देवी मां की पूजन के पश्चात श्रद्धानुसार कन्या व लांगुरों को बैठाकर भोजन कराने और उन्हें धन, वस्त्र, फल या कोई वस्तु देने की परंपरा है। कन्या लांगुरों की संख्या नौ, ग्यारह, इक्कीस, इकत्तीस यानि विषम में होनी चाहिए। उनकी थाली में उतना ही भोजन परोसा जाए जितना वो खा सकें। यदि घर के लिए भोजन दे रहे हैं तो यह अवश्य देखें कि वे भोजन को इधर उधर न फैंक देें। भोजन की बर्बादी से देवी अन्नपूर्णा का अपमान होता है। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।