सोमवार, 27 सितंबर 2021

उपयोगी वास्तु टिप्स

## मकान की उत्तर-पूर्व विदिशा यानि ईशान कोण में किसी भी तरह का निर्माण या टॉयलेट का होना दांपत्य जीवन के लिए अशुभ होता है। यहां तक कि इस वजह से विवाह टूटने की नौबत आ जाती है। इसलिए इस कोण को सदैव खुला और स्वच्छ रखना आवश्यक है। 

## मकान के आग्नेय कोण यानि दक्षिण-पूर्व विदिशा में गर्भवती महिला को कभी नहीं सुलाना चाहिए अन्यथा उस महिला में अनिद्रा एवं गर्भपात होने का अंदेशा बना रहेगा। जगह की कमी हो तो आग्नेय कोण से हटकर दक्षिण की दीवार की तरफ सुला सकते हैं। 

## मकान की पूर्व में सीढ़ियों का होना भी शुभ नहीं होता। इस दोष के कारण आर्थिक नुकसान के साथ-साथ परिवार के सदस्यों में मानसिक तनाव होता है। सीढ़ियों के लिए और कहीं जगह न हो तो पूर्व दिशा की दीवार और सीढ़ियों के बीच कम से कम तीन इंच का गैप कर देना चाहिए। 

## मकान की दक्षिण-पश्चिम विदिशा यानि नैऋत्य कोण में मुख्य प्रवेश द्वार (मेन गेट) का होना वास्तु दोष है। ऐसा होने से अनावश्यक खर्चा होता है, साथ ही घर के मुखिया का मन भी घर में नहीं लगता। इस दोष से बचने के लिए मुख्य द्वार पर दहलीज बनवा कर उसके नीचे चांदी की पत्ती और नौ छोटे पिरामिड लगवा देने चाहिए। 

## बॉक्स वाले पलंग या बेड में केवल ओढ़ने व बिछाने वाले कपड़े ही रखने चाहिए। पलंग के बॉक्स के अंदर किसी भी तरह का कबाड़, पुराने कपड़े, बिजली के खराब उपकरण, टूटे बर्तन, रद्दी अखबार आदि रखने से परिवार में कलह व मानसिक रोग होने की संभावना बनी रहती है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा। 

शनिवार, 18 सितंबर 2021

श्राद्ध कर्म में पंचबली का महत्व

   पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का दूसरा नाम ही श्राद्ध है। धार्मिक एवं पौराणिक मान्यता है कि अमावस्या और पूर्णमासी के दिन पूर्ण श्रद्धा भाव के साथ पितरों के लिए श्राद्ध एवं तर्पण करने से पितृ प्रसन्न हो कर अपना शुभ आशीर्वाद देते हैं, लेकिन आश्विन मास में पड़ने वाले श्राद्ध के दिन पितृ पूजन के लिए विशेष महत्व रखते हैं। श्राद्ध के दिनों में पितरों की प्रसन्नता और कृपा पाने के लिए पिंड दान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन और श्रद्धा के अनुसार दक्षिणा देने आदि कार्य किए जाते हैं।

  भारतीय संस्कृति में पितरों को भगवान की तरह पूजनीय माना जाता है। पितरों को याद करके उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने के उद्देश्य से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक की अवधि श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष के रूप में मान्य की गई है। इस अवधि के दौरान प्रतिदिन तन व मन से सात्विक और पवित्र भावना बनाए रखते हुए दूध, काले तिल, कुशा एवं पुष्प मिश्रित जल से दक्षिण की तरफ मुख रखते हुए तर्पण करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से श्राद्ध पक्ष समाप्त होने पर पितर अपने परिजनों को आशीर्वाद देकर स्वर्ग लोक के लिए गमन करते हैं। 

   श्राद्ध पक्ष के दिनों में पड़ने वाली चतुर्थी तिथि के दिन होने वाले श्राद्ध में चतुर्थी व्रत रखने का विशेष महत्व होता है। चूंकि चतुर्थी तिथि का संबंध गणेश जी से माना गया है, इसलिए इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण करने के साथ-साथ गणेश जी की आराधना भी करनी चाहिए तथा गणेश जी व उनके वाहन मूषक को भोजन के अलावा मोदक का भोग भी लगाना चाहिए। इस तिथि को श्वेत गणपति को सफेद चंदन, श्वेत वस्त्र, लाल रंग के पुष्प, पीले रंग की माला, 21 मोदक, चार केले, पान, सुपारी, लौंग आदि अर्पित करते हुए गणेश जी की आरती करनी चाहिए। 

   श्राद्ध पक्ष के दिनों में गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देवताओं के लिए भोजन में से अंश निकाला जाता है। इन पांच अंशों का अर्पण पंच बलि कहलाता है। देखा जाए तो श्राद्ध पक्ष में पंच बलि पंच तत्वों के प्रति आभार व्यक्त करना है। क्योंकि कुत्ते को जल का, चींटी को अग्नि का, कौवा को वायु का, गाय को पृथ्वी का और देवता को आकाश का प्रतीक माना गया है। गाय में सभी पंच तत्व की उपस्थिति होने से श्राद्ध पक्ष में गौ सेवा को विशेष महत्व दिया गया है। इन दिनों पंच गव्य का प्रयोग करते रहने से पितृ दोष से भी मुक्ति मिल जाती है। 

    श्राद्ध पक्ष में श्रद्धा भाव के साथ जीव-जंतुओं को भी भोजन कराने से पितरों की कृपा से जीवन में सुख, शांति, धन, संपत्ति संतान, विद्या, ज्ञान आदि की प्राप्ति होती है और पितृ दोषों का निवारण होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट इलाहाबाद के महत्वपूर्ण आदेश

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