भारत में श्रीयंत्र का प्रयोग ईसा से लगभग एक हजार साल पहले हुआ था, लेकिन इसका महत्व तब प्रकाश में आया, जब पाण्डवों ने अपना राज-पाट छिन जाने के बाद श्रीयंत्र की प्राण प्रतिष्ठा करके पूजा करना शुरू किया। श्रीयंत्र की पूजा के प्रभाव से उनका खोया हुआ वैभव, सम्मान और संपत्ति आदि वापस प्राप्त हो गए।
श्रीयंत्र को लक्ष्मी यंत्र भी कहते हैं। श्रीयंत्र में श्री का अर्थ लक्ष्मी से होता है। इसका बीजमंत्र भी श्री है। ब्रह्मांड पुराण के अनुसार जहां श्रीयंत्र स्थापित किया जाता है, वहां के साथ-साथ आसपास की जमीन, वृक्ष, पशु-पक्षी और वातावरण पर अनुकूल एवं सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, साथ ही वास्तु दोषों का निवारण भी होता रहता है। श्रीयंत्र की दुर्लभ ज्यामितीय संरचना के प्रभाव से मनुष्य की समस्त मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
श्रीयंत्र सोना, चांदी, तांबा और स्फटिक का हो सकता है। श्रीयंत्र का सकारात्मक प्रभाव मनुष्य पर इसकी विधि पूर्वक प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही पड़ता है। श्रीयंत्र की नियमित पूजा करते रहने से जीवन में मान-सम्मान, ऐश्वर्य, सौभाग्य, धन-संपदा, वैभव, संतान आदि की प्राप्ति होती है।
जिन लोगों की कुंडली में केमद्रुम योग, शकट योग, ऋण योग, काक योग या दरिद्र योग होता है, वे जीवन में कई तरह की समस्याओं से परेशान रहते हैं। ऐसे लोगों को अन्य ज्योतिषीय उपायों के साथ-साथ श्रीयंत्र की स्थापना करके नियमित पूजा करनी चाहिए। दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के समय श्रीयंत्र की स्थापना करके उसकी पूजा करना भी लाभकारी होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा।